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नहीं मिला बसेरा, घरों से दूर हुई गौरैया की चहचहाहट

Fri, 20 Mar 2020 12:30 AM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Fri, 20 Mar 2020 12:30 AM IST
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Sparrow not found, sparrow's tirade away from homes
बिजनौर में दाने की तलाश में बैठी गौरैया। - फोटो : BIJNOR
नहीं मिला बसेरा, घरों से दूर हुई गौरैया की चहचहाहट
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बिजनौर। स्वच्छ और स्वस्थ वातावरण का प्रतीक गौरैया की चहचहाहट अब घरों के आसपास सुनाई नहीं देती। खुद में सिमटते परिवारों में गौरैया के लिए कोई जगह नहीं है। केवल नदियों के तराई में घास के मैदानों को ही गौरैया अपना बसेरा बना रही है। गौरैया को फिर से शहरों में वापस लाना है तो इनके आवास के लिए व्यवस्था करनी होगी।
कभी गौरैया की चहचहाहट से घर गूंजते रहते थे। जिस मकान में गौरैया अपना घोंसला बनाती थी, उसकी कई पीढ़ियां उसी घोंसले में काट देती थी। मकान के झरोखे, कच्चे मकानों की छत में लगी कड़ियों में घोंसला बनाकर रहती थीं। सूरज की किरणें निकलने से पहले ही इनकी चहचहाहट घरों में गूंजने लगती थी। जैसे जैसे शहरीकरण बढ़ा, वैसे ही गौरैया के लिए जगह खत्म होती गई। पर्यावरण बचाने वाली गौरैया को पेड़ों का सहारा था, लेकिन पेड़ भी कम होते गए। रही सही कसर मोबाइल टावरों के रेडिएशन ने पूरी कर दी। जिस कारण गौरैया के जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। अब कभी कभार ही गौरैया घरों के आंगन में नजर आती है। हालांकि रामगंगा और बाकी नदियों के किनारे घास के मैदानों को गौरैया ने अपना बसेरा बना रखा है। कुछ सामाजिक संगठन गौरैया को फिर से घरों में लाने के लिए लकड़ी के बने घोंसले लगा रहे हैं।
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जुड़ी हैं किवदंती
गौरैया से अनेक किवदंती भी जुड़ी हैं। माना जाता है कि मरने वालों की आत्मा की गौरैया वाहक होती है। गौरैया को मारना अपशगुन माना जाता है। बिना किसी हमले के केवल मनुष्य के परिवेश में परिवर्तन होने से गौरैया कम होती जा रही हैं।
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जीव और पक्षी प्रकृति का उपहार : सेम्मारान
डीएफओ डाक्टर एम सेम्मारन के मुताबिक घरों में एक दो झरोखा तो पक्षियों के लिए छोड़ना चाहिए। जीव-जंतु और पक्षी प्रकृति का उपहार हैं। सभी अपने घरों में घोंसला भी रखें और चिड़ियों के लिए छत पर पानी और दाने की व्यवस्था करें।
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