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बैंक प्रबंधक वर्ष 1986 से रख रहे हैं अलविदा जुमे का रोजा
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रोजे ने कराया भूख, प्यास और गरीबों से हमदर्दी का अहसास
नजीबाबाद। सभी धर्म इंसानियत और प्यार मोहब्बत का पैगाम देते हैं। करीब साढ़े तीन दशक से रमजान माह में अलविदा जुमे का रोजा रखते आ रहे बैंक प्रबंधक संतोष कुमार ने यह बात कही।
रमजान के महीने में रखे जाने वाले रोजे जरूरतमंदों की जरूरतों का अहसास कराते हैं। प्यास और भूख क्या होती है इसका भी अहसास रोजा रखने से ही होता है। यह बात भारतीय स्टेट बैंक नजीबाबाद की मुख्य शाखा के वरिष्ठ प्रबंधक संतोष कुमार ने कही। संतोष कुमार करीब साढ़े तीन दशक से हर रमजान में अलविदा जुमे का रोजा रखते हैं। आज अलविदा जुमा है। बैंक प्रबंधक संतोष कुमार आज भी रोजा रखा है।
वर्ष 1986 से लगातार अलविदा जुमे का रोजा रखते आ रहे संतोष कुमार का कहना है कि एसबीआई में अमरोहा से नौकरी शुरू करने के साथ उनके जिगरी दोस्त मकसूद और मसरूर दोनों भाई काफी समय तक अमरोहा में उनके साथ रहे। दोनों भाई रोजा रखते थे। तभी से उन्होंने अलविदा जुमे का रोजा शुरू किया। रोजा रखने के दौरान उनमें गरीबों के प्रति हमदर्दी का जज्बा पैदा हुआ। भूख क्या होती है और प्यास क्या होती है इसका अहसास हुआ। रोजा ही इंसानियत का जज्बा पैदा करता है। बैंक प्रबंधक संतोष कुमार कहते हैं कि सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोरों की मदद कोरोना संक्रमण काल में बेहद जरूरी है।
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नजीबाबाद। सभी धर्म इंसानियत और प्यार मोहब्बत का पैगाम देते हैं। करीब साढ़े तीन दशक से रमजान माह में अलविदा जुमे का रोजा रखते आ रहे बैंक प्रबंधक संतोष कुमार ने यह बात कही।
रमजान के महीने में रखे जाने वाले रोजे जरूरतमंदों की जरूरतों का अहसास कराते हैं। प्यास और भूख क्या होती है इसका भी अहसास रोजा रखने से ही होता है। यह बात भारतीय स्टेट बैंक नजीबाबाद की मुख्य शाखा के वरिष्ठ प्रबंधक संतोष कुमार ने कही। संतोष कुमार करीब साढ़े तीन दशक से हर रमजान में अलविदा जुमे का रोजा रखते हैं। आज अलविदा जुमा है। बैंक प्रबंधक संतोष कुमार आज भी रोजा रखा है।
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वर्ष 1986 से लगातार अलविदा जुमे का रोजा रखते आ रहे संतोष कुमार का कहना है कि एसबीआई में अमरोहा से नौकरी शुरू करने के साथ उनके जिगरी दोस्त मकसूद और मसरूर दोनों भाई काफी समय तक अमरोहा में उनके साथ रहे। दोनों भाई रोजा रखते थे। तभी से उन्होंने अलविदा जुमे का रोजा शुरू किया। रोजा रखने के दौरान उनमें गरीबों के प्रति हमदर्दी का जज्बा पैदा हुआ। भूख क्या होती है और प्यास क्या होती है इसका अहसास हुआ। रोजा ही इंसानियत का जज्बा पैदा करता है। बैंक प्रबंधक संतोष कुमार कहते हैं कि सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोरों की मदद कोरोना संक्रमण काल में बेहद जरूरी है।
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