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भारत छोड़ो आंदोलन ने जिले में पकड़ी थी रफ्तार

Sat, 14 Aug 2021 11:06 PM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Sat, 14 Aug 2021 11:06 PM IST
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Quit India movement had picked up pace in the district
शहीद रिक्खी सिंह। - फोटो : BIJNOR
भारत छोड़ो आंदोलन ने जिले में पकड़ी थी रफ्तार
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बिजनौर। महात्मा गांधी द्वारा किये गए अंग्रेजों भारत छोड़ो और करो या मरो के आह्वान के कारण अंग्रेज सरकार ने 9 अगस्त 1942 को गांधी जी तथा देश के शीर्ष नेताओं को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था। इससे देश भर में भारी आक्रोश व्याप्त हो गया और जगह-जगह प्रदर्शन, सत्याग्रह तथा सरकारी इमारतों में तोड़फोड़ शुरू हो गई थी। क्रांतिकारी सरकारी भवनों पर तिरंगा लगाने लगे। 9 अगस्त को जनपद बिजनौर में 100 शीर्ष नेताओं को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया, फिर भी दूसरी पंक्ति और गिरफ्तारी से बचे क्रांतिकारियों ने धामपुर ,चांदपुर, बिजनौर और नजीबाबाद में 14 अगस्त तक अंग्रेजी शासन के खिलाफ जबरदस्त प्रदर्शन और तोड़फोड़ की।

इसी क्रम में नूरपुर क्षेत्र के सेनानियों ने 16 अगस्त 1942 को नूरपुर थाने पर तिरंगा लगाने का निर्णय लिया। पूर्व निर्धारित समय पर सेनानियों के जत्थे नूरपुर पहुंचने लगे। इस कार्यक्रम की भनक पुलिस को लग गयी थी। उसने थाने पर चौकसी बढ़ा दी तथा कुछ स्थानीय लोगों की सहायता से घेराबंदी कर दी। पुलिस ने सेनानियों को रोकने के लिए कुछ सड़कों पर बैरिकेडिंग भी लगाई थी। नूरपुर-चांदपुर तिराहे पर फीना के सेनानियों पर लाठीचार्ज हुआ पर सेनानी रुके नहीं बल्कि इधर-उधर से होते हुए थाने पर पहुंच गए। लगभग 12000 लोग थाने पर जुट गए। गोहावर, असकरीपुर, फीना, ताजपुर, गोपालपुर, मुस्सेपुर ,मोल्हावाला गांवों से बड़ी संख्या में सेनानी आए थे। क्रांतिकारियों में भारी आक्रोश और देशभक्ति की प्रबल भावना बहती हुई देखकर पुलिस ने अलर्ट की पोजीशन ले ली तथा बंदूकों का मुंह क्रांतिकारियों की तरफ कर दिया। चारों तरफ से ‘तिरंगा लगाओ, तिरंगा लगाओ’ की आवाज आने लगी। सबसे पहले ग्राम गुनियाखेड़ी के परवीन सिंह तिरंगा लेकर आगे बढ़े। यह देख पुलिस ने तत्काल उन पर गोलियों की बौछार कर दी। चंद कदम चलने के बाद परवीन सिंह नीचे गिर पड़े और बेसुध हो गए। तिरंगा उन्होंने थामें रखा। कार्य अभी अधूरा था। अब जो भी आगे बढ़ता उसकी मौत सुनिश्चित थी। इन परिस्थितियों में कोई परमवीर ही आगे बढ़ सकता था। असगरीपुर के रिक्खी सिंह ने तिरंगे की शान और क्रांतिकारियों के वचन की लाज रखने के लिए अपने प्राणों की आहुति देने का निर्णय लिया। वे फुर्ती से आगे बढ़े और उन्होंने परवीन सिंह के हाथ से तिरंगा निकालकर वहां पड़े मिट्टी के ढेर में गाड़ दिया। उनको आगे बढ़ता देख पुलिस ने उन पर भी गोलियां चलाईं, जिससे तिरंगा लगाने के बाद वे भी अचेत होकर गिर पड़े थे। तिरंगा लग गया, तिरंगा लग गया का जयघोष हुआ। जिसे सुनकर पीछे खड़े क्रांतिकारी अपने घरों को वापस लौटने लगे जो कुछ बचे उन्हें तितर-बितर करने के लिए पुलिस ने हवा में गोलियां चलाईं और लाठीचार्ज शुरू कर दिया। पुलिस ने परवीन सिंह के पार्थिव शरीर को चोरी-छिपे जला दिया तथा रिक्खी सिंह को गिरफ्तार कर बिजनौर जेल भेज दिया। जहां समुचित इलाज के अभाव में उनकी भी मृत्यु हो गई। यह घटना नूरपुर थाना केस के नाम से जानी जाती है। जिस स्थान पर यह घटना हुई थी वहां दोनों शहीदों की याद में शहीद स्मारक बनवाया गया है। प्रतिवर्ष 16 अगस्त को शहीद स्थल पर श्रद्धांजलि कार्यक्रम तथा शहीद मेले का आयोजन किया जाता है। जनपद के परिषदीय विद्यालयों में इस दिन अवकाश भी रखा जाता है। पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई शहीद स्मारक पर श्रद्धांजलि अर्पित कर चुके हैं। यह मुरादाबाद मंडल में बड़े विद्रोह की घटना थी।

शहीद परवीन सिंह।

शहीद परवीन सिंह।- फोटो : BIJNOR

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