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Bijnor News: श्रद्धा का अद्भुत केंद्र है महंत पानप दास समाधि स्थल

Thu, 29 Feb 2024 11:44 PM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Thu, 29 Feb 2024 11:44 PM IST
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Mahant Panap Das Samadhi Sthal is a wonderful center of devotion.
धामपुर। महंत पानपदास महाराज की समाधि स्थल पर हर वर्ष फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की सप्तमी में लगने वाला वार्षिक मेला श्रद्धालुओं की आस्था का मुख्य केंद्र है।
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उप महंत बजरंग दास, बुद्वदास, नारायण दास ने बताया कि धामपुर में महंत पानपदास जी महाराज की गद्दी का इतिहास करीब 400 साल पुराना है। महंत पानपदास एक चमत्कारी सच्चे संत थे। माना जाता है कि उनका जन्म राजस्थान के तिजोरी गांव में हुआ था। वह अविवाहित थे। साल 1720 में धामपुर में भ्रमण करने आए थे । उन्हें राज मिस्त्री का शौक था। जब वह यहां आए तो धामपुर में एक सेठ का महल तैयार हो रहा था। उन्होंने इस महल निर्माण में राजमिस्त्री का काम किया। उनके बढि़या काम को देख अन्य कारीगर घृणा करने लगे। कारीगरों ने खुद दीवार को तिरछा कर सेठ से महंत पानप दास की शिकायत कर दी। सेठ ने दीवार को तिरछी देख महंत को डांटा। तभी महंत ने तिरछी दीवार पर हाथ घूमा उसे सीधा कर दिया। महंत पानपदास की चमत्कारी को देख सेठ ने उस महल को तैयार कर उन्हें ही भेंट कर दिया। इसी महल में महंत पानप दास की गद्दी विराजमान है।
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बैलों की जोड़ी नवाब के महल में मिली

महंत के पास बैलों की एक खूबसूरत जोड़ी थी। नजीबाबाद के नवाब नजीबुद्दोला को बैलों खूबसूरत जोड़ी का पता लगा तो उन्होंने अपने नौकरों को महंत से बैलों की जोड़ी लाने का हुक्म दिया। आश्चर्य की बात है कि नवाब के लोग बैलों की जोड़ी लेने के लिए धामपुर नहीं आ सके। इस दौरान बैलों की जोड़ी नवाब को उनके महल में मिल गई, जिसे देख वह हैरान रह गए।
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साल 1774 में ली थी समाधि

बताते हैं महंत पानपदास की मृत्यु नहीं हुई, बल्कि उन्होंने साल 1774 में धामपुर में समाधि ली थी। इसी समाधि स्थल पर हर वर्ष मेले का आयोजन होता है। इस बार उनकी 251 वीं पुण्यतिथि है।
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