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जोगीरम्पुरी दरगाह: जहां सजदे में झुकते हैं सिर, बस जाता हैं तंबुओ का शहर, रात-दिन चलती हैं मजलिसें

Wed, 22 May 2024 11:11 AM IST
मेरठ ब्यूरो एजाज अहमद, संवाद न्यूज एजेंसी, बिजनौर
एजाज अहमद, संवाद न्यूज एजेंसी, बिजनौर Published by: मेरठ ब्यूरो Updated Wed, 22 May 2024 11:11 AM IST
सार

बिजनौर में हर वर्ष जोगीरम्पुरी दरगाह पर सालाना मजलिसें आयोजित की जाती हैं। कहा जाता है कि यह वह पाकीजा जगह है जहां हजरत अली घुड़सवारी दस्ते के साथ पहुंचे थे।

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Jogirampuri Dargah...where heads bow in prostration
नजीबाबाद-जोगीरम्पुरी दरगाह। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

नजीबाबाद के अहमदपुर सादात उर्फ जोगीरम्पुरी मुसलिम शिया समाज की अकीदत की वह पाकीजा जगह है, जहां हजरत अली घुड़सवारी दस्ते के साथ पहुंचे थे। इसी अकीदे से हर साल जोगीरम्पुरी दरगाह पर सालाना मजलिसें आयोजित की जाती हैं और मौला अली की बारगाह में नजराना-ए-अकीदत पेश किया जाता है।

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जोगीरम्पुरी शिया समाज के अकीदत की स्थली कैसे बनी, इसके बारे में अनुयायियों का मानना है कि मुगल बादशाह शाहजहां के दरबार में अलाउद्दीन बुखारी दीवान थे। उनके इंतकाल के बाद उनके साहबजादे सैय्यद राजू को दीवान मुकर्रर किया गया। सैय्यद राजू को आलमगीर से खतरा था तो वह जोगीरम्पुरी आ गए और या अली अदरिकनी वजीफा करते और मौला अली से अपनी हिफाजत के लिए रात-दिन दुआएं मांगते।

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देर से आंख खुलने पर सैय्यद राजू को एक दिन घर की मचान में ही छिपना पड़ा। संयोग से उसी दिन एक घुड़सवारी दस्ता जंगल में आ पहुंचा। दस्ते का नेतृत्व कर रहे नौजवान के चेहरे पर तेज और हाथे में अलम था। बाकी घुड़सवार नकाबपोश थे। जंगल से घास लेकर लौट रहे एक नाबीना ब्राह्मण से नौजवान ने सैय्यद राजू की बाबत जानकारी ली। नौजवान ने कहा कि सैय्यद राजू के अलावा किसी को भी इस बात की भनक नहीं होनी चाहिए कि कौन आया है।

नाबीना ने फरमाया कि मेरी आंखों में रोशनी नहीं है, मैं जल्द इस काम को कैसे अंजाम दे सकता हूं। दस्ते के मुखिया का हुक्म हुआ कि वह अपनी आखें बंद कर खोले। नाबीना के आंखें खोलते ही उसकी दुनिया ही बदल गई। आंखों में रोशनी पाकर उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। वह भागता हुआ वह सैय्यद राजू के पास पहुंचा और कहा कि जिन्हें आप रात-दिन याद करते हैं, वह घुड़सवार दस्ते के साथ आपसे मिलने आए हैं।

सैय्यद राजू जब वहां पहुंचे तो दस्ता नदारद था। घोड़ों की टापों एवं मुंह के झाग के निशान मौजूद थे। सैय्यद राजू की उनसे मुलाकात नहीं हो पाई, लेकिन उन्होंने मायूसी के बावजूद निशानों को महसूस कर लिया।

एक दिन उन्हें ख्वाब में हुक्म हुआ कि दरगाह की तामीर कराई जाए। दरगाह तामीर कराने के दौरान पानी की कमी महसूस की गई। एक शख्स ने दरगाह स्थल के नजदीक गूलर के पेड़ की एक शाख से पानी टपकते देखा।

कहते हैं, पानी गिरने से जमीन नम हुई। वहां पानी का एक करिश्माई चश्मा फूटा, जिससे पूरी दरगाह तामीर हुई। आज भी इस चश्मे की अहमियत बरकरार है। यकीन किया जाता है कि इसका पानी पीने से चर्म रोग, पेट की बीमारियां और ऊपरी हवाओं से निजात मिलती है। जोगीरम्पुरी में हर साल चार दिनी मातमी मजलिसें मुनक्किद होती हैं

मातमी मजलिसों में रात दिन वाकयात-ए-करबला के साथ हजरत इमाम हुसैन एवं उनके लश्कर को क्रूर बादशाह यजीद द्वारा दी गई। दिल दहलाने वाली यातनाओं का उलमा जिक्र फरमाते हैं, तो शिया साहेबान फफककर रोने एवं सीनाजनी के लिए मजबूर हो जाते हैं। जोगीरम्पुरी दरगाह शिया समाज ही नहीं, विभिन्न धर्मों के अनुयायियों की अकीदत की स्थली बन चुकी है।

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23 मई से शुरू होंगी मातमी मजलिस
दरगाह परिसर के शमशुल हसन हाल में 23 मई को फजिर की नमाज के बाद से मातमी मजलिसों और मौला अली की दरगाह पर नजराना-ए-अकीदत पेश करने का सिलसिला शुरू होगा। शिया विद्वान रात दिन मजलिसों को खिताब करेंगे। 26 मई तक यह सिलसिला जारी रहेगा।

अंजुमन बरामद करेंगी मातमी जुलूस
मजलिसों के दौरान एक दर्जन से अधिक अंजुमन मातमी जुलूस बरामद करेंगी। नोहा ख्वानी और मर्सिया ख्वानी के साथ अंजुमने अनेक मंजर सजाएंगी।

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