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वनों में इंसानी लापरवाही पड़ रही भारी
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वनों में इंसानी लापरवाही पड़ रही भारी
बिजनौर। वनों को इंसानी लापरवाही और कुदरती घटनाएं सुलगा रही हैं। जंगल में अवैध तरीके से लकड़ी काटने वाले कभी सुलगती बीड़ी फेंककर आग लगा देते हैं तो कभी बांस के पेड़ों में हवा के चलने से आपस में ही घर्षण होने पर आग लग जाती है। साहूवाला रेंज में आग पर 24 घंटे बाद काबू पाया जा सका।
जिले में वन संपदा की भरमार है। अमानगढ़ टाइगर रिजर्व उत्तराखंड के टाइगर रिजर्व से सटा हुआ है, इसके अलावा कई अन्य रेंज में भी वन क्षेत्र है। वन क्षेत्र में अगर एक बार आग लग जाए तो उसे बुझाने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ती है। अफजलगढ़ में पिछले सप्ताह आग लग गई थी, लेकिन शुरूआत में ही सजगता से आग पर काबू पा लिया गया। साहूवाला रेंज के हरेवली क्षेत्र में भी आग लग गई। आग से एक किलोमीटर के दायरे में सैकड़ों बीघा जमीन में खड़े छोटे पेड़ व झाड़ी जल गए। आग से जले ये हजारों वनस्पति अब पनप नहीं पाएंगे। इसके अलावा काफी छोटे जीव भी जले होंगे।
वन विभाग के अफसरों ने आग पर किसी तरह काबू पाया है। वनों में आग लगने का कारण कभी सामान्य होता है तो कभी इंसानी। वनों में इंसानों का दखल रहता ही है। वनों में लकड़ी काटने वाले सुलगती बीड़ी जंगल में फेंक देते हैं। इसके अलावा कुछ लोग मधुमक्खियों को छत्ते से भगाने के लिए भी आग लगा देते हैं जो दूर तक फैल जाती है। तेज हवा चलने पर बांस के पेड़ों में आपस में घर्षण होता है, जिससे चिंगारी निकलती हैं। आजकल के मौसम में जंगल में सूखे पत्तों का ढेर लगा रहता है। इनमें आग एकदम सुलगती चली जाती है।
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ऐसे बुझाई जाती है जंगल की आग
आग बुझाने के तीन तरीके होते हैं। आग की शुरूआत में उसे झाड़ी आदि से छेतरकर बुझाने की कोशिश होती है। बड़े क्षेत्र में आग फैलने पर आगे के एरिया में सूखे पत्ते व पेड़ हटाकर आग बुझाई जाती है। इसके अलावा आग के रास्ते में आगे कहीं थोड़ी आग लगाकर बुझाई जाती है। पीछे से आई आग राख में आगे नहीं बढ़ती है और बुझ जाती है। कालागढ़ में कुछ दिन पहले आग पर ऐसे ही काबू पाया गया था। डीएफओ नजीबाबाद मनोज शुक्ला के अनुसार वनों में जरा सी लापरवाही से बड़े अग्निकांड हो जाते हैं। इसके बारे में लोगों को समय-समय पर जागरूक किया जाता है।
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बिजनौर। वनों को इंसानी लापरवाही और कुदरती घटनाएं सुलगा रही हैं। जंगल में अवैध तरीके से लकड़ी काटने वाले कभी सुलगती बीड़ी फेंककर आग लगा देते हैं तो कभी बांस के पेड़ों में हवा के चलने से आपस में ही घर्षण होने पर आग लग जाती है। साहूवाला रेंज में आग पर 24 घंटे बाद काबू पाया जा सका।
जिले में वन संपदा की भरमार है। अमानगढ़ टाइगर रिजर्व उत्तराखंड के टाइगर रिजर्व से सटा हुआ है, इसके अलावा कई अन्य रेंज में भी वन क्षेत्र है। वन क्षेत्र में अगर एक बार आग लग जाए तो उसे बुझाने के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ती है। अफजलगढ़ में पिछले सप्ताह आग लग गई थी, लेकिन शुरूआत में ही सजगता से आग पर काबू पा लिया गया। साहूवाला रेंज के हरेवली क्षेत्र में भी आग लग गई। आग से एक किलोमीटर के दायरे में सैकड़ों बीघा जमीन में खड़े छोटे पेड़ व झाड़ी जल गए। आग से जले ये हजारों वनस्पति अब पनप नहीं पाएंगे। इसके अलावा काफी छोटे जीव भी जले होंगे।
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वन विभाग के अफसरों ने आग पर किसी तरह काबू पाया है। वनों में आग लगने का कारण कभी सामान्य होता है तो कभी इंसानी। वनों में इंसानों का दखल रहता ही है। वनों में लकड़ी काटने वाले सुलगती बीड़ी जंगल में फेंक देते हैं। इसके अलावा कुछ लोग मधुमक्खियों को छत्ते से भगाने के लिए भी आग लगा देते हैं जो दूर तक फैल जाती है। तेज हवा चलने पर बांस के पेड़ों में आपस में घर्षण होता है, जिससे चिंगारी निकलती हैं। आजकल के मौसम में जंगल में सूखे पत्तों का ढेर लगा रहता है। इनमें आग एकदम सुलगती चली जाती है।
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ऐसे बुझाई जाती है जंगल की आग
आग बुझाने के तीन तरीके होते हैं। आग की शुरूआत में उसे झाड़ी आदि से छेतरकर बुझाने की कोशिश होती है। बड़े क्षेत्र में आग फैलने पर आगे के एरिया में सूखे पत्ते व पेड़ हटाकर आग बुझाई जाती है। इसके अलावा आग के रास्ते में आगे कहीं थोड़ी आग लगाकर बुझाई जाती है। पीछे से आई आग राख में आगे नहीं बढ़ती है और बुझ जाती है। कालागढ़ में कुछ दिन पहले आग पर ऐसे ही काबू पाया गया था। डीएफओ नजीबाबाद मनोज शुक्ला के अनुसार वनों में जरा सी लापरवाही से बड़े अग्निकांड हो जाते हैं। इसके बारे में लोगों को समय-समय पर जागरूक किया जाता है।