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गंगा में तलाशा जाएगा घड़ियालों का इतिहास
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बिजनौर में गंगा किनारे बैठा घड़ियाल
- फोटो : BIJNOR
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गंगा में तलाशा जाएगा घड़ियालों का इतिहास
रजनीश त्यागी
बिजनौर। घड़ियालों के बेहतर पुनर्वास के लिए घड़ियालों का इतिहास खंगाला जा रहा है। इतिहास के पन्नों में झांका तो बिजनौर और मेरठ दोनों के जिला गजेटियर में गंगा में अच्छी तादात में घड़ियाल होने का जिक्र मिल गया। अब डब्ल्यूडब्ल्यूएफ गंगा से घड़ियालों के विलुप्त होने के कारणों की तलाश में जुट गया है, ताकि पुनर्वास के लिए अब तक गंगा में छोड़े गए घड़ियालों को सुरक्षित किया जा सके। अब तक गंगा में घड़ियाल प्रजन्न केंद्र कुकरैल से लाकर करीब 800 छोटे घड़ियाल छोड़े जा चुके हैं।
गंगा में डब्ल्यूडब्ल्यूएफ ने करीब 13 साल पहले घड़ियालों के पुनर्वास के लिए प्रोजेक्ट शुरू किया था। इस प्रोजेक्ट के तहत तब से अब तक गंगा में 800 छोटे घड़ियाल छोड़े जा चुके हैं। सभी घड़ियाल मकदूमपुर गंगा क्षेत्र में छोड़े गए, क्योंकि लंबी रिसर्च के बाद इस क्षेत्र को घड़ियालों के लिए सबसे बेहतर माना गया था। इस समय भीमगोड़ा से लेकर कानपुर तक घड़ियाल पहुंच चुके हैं। 2008 में छोड़े गए घड़ियाल अब प्रजन्न लायक हो चुके हैं। अब गंगा में घड़ियाल के पुनर्वास में परेशानी न आए, इसके लिए गंगा में घड़ियालों के विलुप्त होने के कारण भी तलाशे जा रहे हैं। इसके अलावा गंगा में घड़ियाल थे या नहीं, इसकी जांच के लिए बिजनौर और मेरठ के गजेटियर की मदद ली जा रही है। डब्ल्यूडब्ल्यूएफ को गजेटियर में गंगा में घड़ियाल के होने का जिक्र मिला है। अब घड़ियाल कब गायब हुए और क्यों हुए, इन सवालों के जबाव मिलने बाकी हैं।
गंगा से व्यापार शुरू होने के साथ घड़ियाल का अंत शुरू
ब्रिटिश शासन काल में ही गंगा में नावों से व्यापार शुरू हो गया था। पर्यावरण विशेषज्ञ जोएल लायल कहते हैं कि उस समय गंगा में काफी वयस्क घड़ियाल होते थे। इस कारण छोटी नाव से व्यापार करने वाले व्यापारी इनसे डरने लगे। यहां पर कहा जाता है कि घड़ियालों के शिकार के लिए शिकारी तैनात किए गए थे। एक के बाद एक गंगा से घड़ियाल मारे गए। वहीं इसके अलावा ऐसे समय भी कई बार आए, जब गंगा का जलस्तर काफी हद तक घटा। इस दौरान घड़ियालों के अंड़े तक नष्ट किए गए। इन कारणों को गंगा से घड़ियालों की विलुप्ति का सबसे बड़ा कारण माना गया।
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डब्ल्यूडब्ल्यूएफ ने गंगा को दिलाए वाहन
डब्लूडब्लूएफ के वरिष्ठ परियोजना अधिकारी संजीव यादव ने बताया कि शास्त्रों में घड़ियाल को गंगा का वाहन भी कहा गया है। घड़ियालों के विलुप्ति के बाद अरसे तक गंगा बिना वाहन ही प्रवाहित होती रही। डब्ल्यूडब्ल्यूएफ ने 2008 में घड़ियाल प्रोजेक्ट शुरू कर गंगा को दोबारा वाहन दिला दिए। अब केवल नई पीढ़ी के गंगा में प्रजन्न के अंडे देने का इंतजार किया जा रहा है।
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रजनीश त्यागी
बिजनौर। घड़ियालों के बेहतर पुनर्वास के लिए घड़ियालों का इतिहास खंगाला जा रहा है। इतिहास के पन्नों में झांका तो बिजनौर और मेरठ दोनों के जिला गजेटियर में गंगा में अच्छी तादात में घड़ियाल होने का जिक्र मिल गया। अब डब्ल्यूडब्ल्यूएफ गंगा से घड़ियालों के विलुप्त होने के कारणों की तलाश में जुट गया है, ताकि पुनर्वास के लिए अब तक गंगा में छोड़े गए घड़ियालों को सुरक्षित किया जा सके। अब तक गंगा में घड़ियाल प्रजन्न केंद्र कुकरैल से लाकर करीब 800 छोटे घड़ियाल छोड़े जा चुके हैं।
गंगा में डब्ल्यूडब्ल्यूएफ ने करीब 13 साल पहले घड़ियालों के पुनर्वास के लिए प्रोजेक्ट शुरू किया था। इस प्रोजेक्ट के तहत तब से अब तक गंगा में 800 छोटे घड़ियाल छोड़े जा चुके हैं। सभी घड़ियाल मकदूमपुर गंगा क्षेत्र में छोड़े गए, क्योंकि लंबी रिसर्च के बाद इस क्षेत्र को घड़ियालों के लिए सबसे बेहतर माना गया था। इस समय भीमगोड़ा से लेकर कानपुर तक घड़ियाल पहुंच चुके हैं। 2008 में छोड़े गए घड़ियाल अब प्रजन्न लायक हो चुके हैं। अब गंगा में घड़ियाल के पुनर्वास में परेशानी न आए, इसके लिए गंगा में घड़ियालों के विलुप्त होने के कारण भी तलाशे जा रहे हैं। इसके अलावा गंगा में घड़ियाल थे या नहीं, इसकी जांच के लिए बिजनौर और मेरठ के गजेटियर की मदद ली जा रही है। डब्ल्यूडब्ल्यूएफ को गजेटियर में गंगा में घड़ियाल के होने का जिक्र मिला है। अब घड़ियाल कब गायब हुए और क्यों हुए, इन सवालों के जबाव मिलने बाकी हैं।
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गंगा से व्यापार शुरू होने के साथ घड़ियाल का अंत शुरू
ब्रिटिश शासन काल में ही गंगा में नावों से व्यापार शुरू हो गया था। पर्यावरण विशेषज्ञ जोएल लायल कहते हैं कि उस समय गंगा में काफी वयस्क घड़ियाल होते थे। इस कारण छोटी नाव से व्यापार करने वाले व्यापारी इनसे डरने लगे। यहां पर कहा जाता है कि घड़ियालों के शिकार के लिए शिकारी तैनात किए गए थे। एक के बाद एक गंगा से घड़ियाल मारे गए। वहीं इसके अलावा ऐसे समय भी कई बार आए, जब गंगा का जलस्तर काफी हद तक घटा। इस दौरान घड़ियालों के अंड़े तक नष्ट किए गए। इन कारणों को गंगा से घड़ियालों की विलुप्ति का सबसे बड़ा कारण माना गया।
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डब्ल्यूडब्ल्यूएफ ने गंगा को दिलाए वाहन
डब्लूडब्लूएफ के वरिष्ठ परियोजना अधिकारी संजीव यादव ने बताया कि शास्त्रों में घड़ियाल को गंगा का वाहन भी कहा गया है। घड़ियालों के विलुप्ति के बाद अरसे तक गंगा बिना वाहन ही प्रवाहित होती रही। डब्ल्यूडब्ल्यूएफ ने 2008 में घड़ियाल प्रोजेक्ट शुरू कर गंगा को दोबारा वाहन दिला दिए। अब केवल नई पीढ़ी के गंगा में प्रजन्न के अंडे देने का इंतजार किया जा रहा है।