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सियासी दंगल में आमने सामने हैं गुरु और चेला
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सियासी दंगल में आमने-सामने हैं गुरु और शिष्य
बिजनौर। जिले की आठों विधानसभा पर घमासान मचा हुआ है, लेकिन एक सीट ऐसी भी है जिसमें गुरु-शिष्य सियासी दंगल में कूदे हुए हैं। गुरु अपना राजनीतिक अस्तित्व बचाए रखने के लिए जूझ रहे हैं, तो वहीं शिष्य कभी गुरु का मजबूत गढ़ रही विधानसभा में अपना वजूद खड़ा करने की जद्दोजहद में लगा हुआ है।
पार्टी में अपनी मजबूत पकड़ के लिए पहचाने जाने वाले नेताजी ने अपने एक शिष्य को राजनीति का ककहरा पढ़ाया। यहां तक की पार्टी में भी पहचान दिलाने का काम किया। उधर, राजनीति के सभी दांव-पेच सीखने के बाद शिष्य ने गुरु को पटकनी टिकट हासिल करके ही दे दी। चर्चा है कि शिष्य ने पार्टी हाईकमान को यह विश्वास दिला दिया कि अब गुरु नेताजी क्षेत्र में मजबूत नहीं रहे, जिसे चलते गुरु को टिकट नहीं मिला और शिष्य उन्हीं के गढ़ में मैदान में उतर गए। हालांकि बाद में गुरु भी दूसरी पार्टी से टिकट हासिल करने में कामयाब रहे। यह शायद वह दांव था जोशिष्य को नहीं सिखाया था। अब गुरु-शिष्य दोनों आमने-सामने हैं। हालांकि उस सीट पर चुनाव त्रिकोणीय माना जा रहा है। यह तो नतीजे ही बताएंगे कि गुरु अपनी राजनीतिक साख को बचाए रखने में कामयाब रहेंगे या शिष्य का वजूद गुरु से बड़ा हो जाएगा या फिर गुरु-शिष्य की इस लड़ाई में तीसरा बाजी मार जाएगा।
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बिजनौर। जिले की आठों विधानसभा पर घमासान मचा हुआ है, लेकिन एक सीट ऐसी भी है जिसमें गुरु-शिष्य सियासी दंगल में कूदे हुए हैं। गुरु अपना राजनीतिक अस्तित्व बचाए रखने के लिए जूझ रहे हैं, तो वहीं शिष्य कभी गुरु का मजबूत गढ़ रही विधानसभा में अपना वजूद खड़ा करने की जद्दोजहद में लगा हुआ है।
पार्टी में अपनी मजबूत पकड़ के लिए पहचाने जाने वाले नेताजी ने अपने एक शिष्य को राजनीति का ककहरा पढ़ाया। यहां तक की पार्टी में भी पहचान दिलाने का काम किया। उधर, राजनीति के सभी दांव-पेच सीखने के बाद शिष्य ने गुरु को पटकनी टिकट हासिल करके ही दे दी। चर्चा है कि शिष्य ने पार्टी हाईकमान को यह विश्वास दिला दिया कि अब गुरु नेताजी क्षेत्र में मजबूत नहीं रहे, जिसे चलते गुरु को टिकट नहीं मिला और शिष्य उन्हीं के गढ़ में मैदान में उतर गए। हालांकि बाद में गुरु भी दूसरी पार्टी से टिकट हासिल करने में कामयाब रहे। यह शायद वह दांव था जोशिष्य को नहीं सिखाया था। अब गुरु-शिष्य दोनों आमने-सामने हैं। हालांकि उस सीट पर चुनाव त्रिकोणीय माना जा रहा है। यह तो नतीजे ही बताएंगे कि गुरु अपनी राजनीतिक साख को बचाए रखने में कामयाब रहेंगे या शिष्य का वजूद गुरु से बड़ा हो जाएगा या फिर गुरु-शिष्य की इस लड़ाई में तीसरा बाजी मार जाएगा।
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