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जिले में बढ़ रहा गुलदारों का कुनबा
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कालागढ़ क्षेत्र में जंगल में खड़ा गुलदार।
- फोटो : BIJNOR
जिले में बढ़ रहा गुलदार का कुनबा
बिजनौर। वनों से निकलकर खेतों में आए गुलदारों का कुनबा जिले में बढ़ने लगा है। गुलदार को देखे जाने व उनके हमलों के आधार पर गुलदार की जिले में आबादी करीब ढाई गुना तक बढ़ने के कयास लगाए जा रहे हैं। गुलदार की संख्या बढ़ने से वन अधिकारी भी गदगद हैं। वन विभाग के अधिकारी अब गुलदार की गिनती करने की योजना बना रहे हैं।
अमानगढ़ टाइगर रिजर्व, कार्बेट टाइगर रिजर्व, साहूवाला आरक्षित वन क्षेत्र, नजीबाबाद वन प्रभाग से वनों से बड़ी संख्या में गुलदार गन्ने के खेतों में अपना आसरा बना रहे हैं। गुलदारों का कुनबा जिले में पहले से ज्यादा बढ़ गया है। करीब चार साल पहले हुई गणना में जिले में 100 गुलदार मिले थे। अब गुलदारों की संख्या करीब 250 होने के कयास लगाए जा रहे हैं। हालांकि अभी इनकी गणना करके इसकी कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। वन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक पहले खेतों में गुलदार देखे जाने का महीने में इक्का दुक्का मामला सामने आता था। अब हर महीने ऐसे चार से पांच मामले देखने को मिल रहे हैं। ऐसा तभी हो सकता है जब गुलदारों का कुनबा पहले से काफी बढ़ गया हो। वनों के मुकाबले खेतों में गुलदार को रहने के लिए बेहतर हालात मिल रहे हैं। सर्दियों में गन्ने के खेत में पत्ती से गुलदार को अच्छी खासी गर्मी भी मिलती है। अफजलगढ़ क्षेत्र के अलावा हीमपुर, झालू, हल्दौर क्षेत्र के गांवों में गुलदार आए दिन अपनी घुसपैठ कर रहे हैं। गांवों में गुलदार कुत्ते, सूकर, गाय, भैंस आदि को अपना निवाला बना रहे हैं। गन्ने के खेत गुलदारों का बसेरा बन गए हैं। गुलदार अपने शावकों को भी गन्ने के खेत में ही जन्म दे रहे हैं। बच्चों व खुद का पेट भरने के लिए गांवों के आसपास आसानी से शिकार भी मिल रहे हैं।
जंगल में ही है गुलदार: डीएफओ
डीएफओ डा.एम सेम्मारन के मुताबिक गुलदार बाघ के डर से जंगलों के आसपास अपना ठिकाना बनाते हैं। जंगल भी गुलदार का ही घर है। गुलदार देखे जाने की घटनाएं बढ़ने से ऐसा लगता है कि गुलदार की संख्या पहले से काफी बढ़ गई है।
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बाघ के डर से छोड़ा वन
जिले में पहले गुलदार अमानगढ़ क्षेत्र में रहते थे। धीरे-धीरे अमानगढ़ क्षेत्र व बाकी क्षेत्र में बाघ की आवक बढ़ती गई। गुलदार बाघ से बहुत डरता है। इस वजह से गुलदार ने धीरे-धीरे अमानगढ़ रेंज से बाहर निकलना शुरू किया और खेतों का रुख किया। अब गन्ने के खेत गुलदार का ठिकाना है।
तो बच्चों को छोड़ देती है मां
गुलदार स्वभाव से बेहद शर्मीला जीव होता है। यह इंसानों से दूर ही रहता है। प्रणय के समय ये खेतों को अपना आशियाना बनाते हैं। नर व मादा गुलदार अलग-अलग रहते हैं। अगर इंसान गुलदार के बच्चों को उठा ले तो बच्चों में इंसानी गंध आने के कारण मादा गुलदार बच्चों को छोड़ देती है।
गांवों के पास जीने का संघर्ष नहीं
जंगल में जीने के लिए संघर्ष करना होता है। लेकिन जंगलों के किनारे आसानी से भोजन मिल जाता है। गुलदार जंगली जानवरों के अलावा रात में किसानों के पशुओं व कुत्तों को अपना निवाला बनाते हैं। आसान भोजन की तलाश उन्हें गांवों में खींच लाती है।
ऐसा होता है गुलदार
गुलदार हल्के भूरे रंग का होता है। उस पर हल्के काले धब्बे होते हैं। गुलदार अधिकतम 58 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ता है। यह एक बार में छह मीटर तक की छलांग मार सकता है। इसका वजन 50 से 90 किलोग्राम तक होता है। मादा गुलदार और नर गुलदार अलग-अलग रहते हैं।
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बिजनौर। वनों से निकलकर खेतों में आए गुलदारों का कुनबा जिले में बढ़ने लगा है। गुलदार को देखे जाने व उनके हमलों के आधार पर गुलदार की जिले में आबादी करीब ढाई गुना तक बढ़ने के कयास लगाए जा रहे हैं। गुलदार की संख्या बढ़ने से वन अधिकारी भी गदगद हैं। वन विभाग के अधिकारी अब गुलदार की गिनती करने की योजना बना रहे हैं।
अमानगढ़ टाइगर रिजर्व, कार्बेट टाइगर रिजर्व, साहूवाला आरक्षित वन क्षेत्र, नजीबाबाद वन प्रभाग से वनों से बड़ी संख्या में गुलदार गन्ने के खेतों में अपना आसरा बना रहे हैं। गुलदारों का कुनबा जिले में पहले से ज्यादा बढ़ गया है। करीब चार साल पहले हुई गणना में जिले में 100 गुलदार मिले थे। अब गुलदारों की संख्या करीब 250 होने के कयास लगाए जा रहे हैं। हालांकि अभी इनकी गणना करके इसकी कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है। वन विभाग के अधिकारियों के मुताबिक पहले खेतों में गुलदार देखे जाने का महीने में इक्का दुक्का मामला सामने आता था। अब हर महीने ऐसे चार से पांच मामले देखने को मिल रहे हैं। ऐसा तभी हो सकता है जब गुलदारों का कुनबा पहले से काफी बढ़ गया हो। वनों के मुकाबले खेतों में गुलदार को रहने के लिए बेहतर हालात मिल रहे हैं। सर्दियों में गन्ने के खेत में पत्ती से गुलदार को अच्छी खासी गर्मी भी मिलती है। अफजलगढ़ क्षेत्र के अलावा हीमपुर, झालू, हल्दौर क्षेत्र के गांवों में गुलदार आए दिन अपनी घुसपैठ कर रहे हैं। गांवों में गुलदार कुत्ते, सूकर, गाय, भैंस आदि को अपना निवाला बना रहे हैं। गन्ने के खेत गुलदारों का बसेरा बन गए हैं। गुलदार अपने शावकों को भी गन्ने के खेत में ही जन्म दे रहे हैं। बच्चों व खुद का पेट भरने के लिए गांवों के आसपास आसानी से शिकार भी मिल रहे हैं।
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जंगल में ही है गुलदार: डीएफओ
डीएफओ डा.एम सेम्मारन के मुताबिक गुलदार बाघ के डर से जंगलों के आसपास अपना ठिकाना बनाते हैं। जंगल भी गुलदार का ही घर है। गुलदार देखे जाने की घटनाएं बढ़ने से ऐसा लगता है कि गुलदार की संख्या पहले से काफी बढ़ गई है।
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बाघ के डर से छोड़ा वन
जिले में पहले गुलदार अमानगढ़ क्षेत्र में रहते थे। धीरे-धीरे अमानगढ़ क्षेत्र व बाकी क्षेत्र में बाघ की आवक बढ़ती गई। गुलदार बाघ से बहुत डरता है। इस वजह से गुलदार ने धीरे-धीरे अमानगढ़ रेंज से बाहर निकलना शुरू किया और खेतों का रुख किया। अब गन्ने के खेत गुलदार का ठिकाना है।
तो बच्चों को छोड़ देती है मां
गुलदार स्वभाव से बेहद शर्मीला जीव होता है। यह इंसानों से दूर ही रहता है। प्रणय के समय ये खेतों को अपना आशियाना बनाते हैं। नर व मादा गुलदार अलग-अलग रहते हैं। अगर इंसान गुलदार के बच्चों को उठा ले तो बच्चों में इंसानी गंध आने के कारण मादा गुलदार बच्चों को छोड़ देती है।
गांवों के पास जीने का संघर्ष नहीं
जंगल में जीने के लिए संघर्ष करना होता है। लेकिन जंगलों के किनारे आसानी से भोजन मिल जाता है। गुलदार जंगली जानवरों के अलावा रात में किसानों के पशुओं व कुत्तों को अपना निवाला बनाते हैं। आसान भोजन की तलाश उन्हें गांवों में खींच लाती है।
ऐसा होता है गुलदार
गुलदार हल्के भूरे रंग का होता है। उस पर हल्के काले धब्बे होते हैं। गुलदार अधिकतम 58 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ता है। यह एक बार में छह मीटर तक की छलांग मार सकता है। इसका वजन 50 से 90 किलोग्राम तक होता है। मादा गुलदार और नर गुलदार अलग-अलग रहते हैं।