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वनों में गश्त के दौरान देखने को मिले रोमांचक दृश्य
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कालागढ़ वनों में शिकार करता बाघ।
- फोटो : DHAMPUR
वनों में गश्त के दौरान देखने को मिले रोमांचक दृश्य
कालागढ़। दिवाली पर वन्यजीवों की सुरक्षा को लेकर सघन गश्त के दौरान वन्यजीवों के रोमांचक व दुर्लभ दृश्य देखने को मिले। इस दौरान वनों में सभी कुछ सामान्य रहने पर वन विभाग के अधिकारियों ने राहत की सांस ली।
दिवाली पर उल्लू व बाघ के नाखूनों, मूंछ के बालों को तंत्र क्रिया में इस्तेमाल को लेकर वन विभाग चौकस रहा। वनों में अलर्ट जारी कर विभागीय कर्मियों की छुट्टियां तक रद्द की गई। वनों में रात दिन सशस्त्र व लंबी दूरी की गश्त की गई। कालागढ़ के उप प्रभागीय वनाधिकारी कुंदन सिंह खाती ने बताया कि जब सभी दिवाली पर्व को मनाने में लगे थे, ऐसे में वनकर्मी व अधिकारी वनों में वन्यजीवों की सुरक्षा में लगे रहे। वनों में वन्यजीवों के रोमांचक व दुर्लभ दृश्य देखने को मिले। कहीं हाथी के झुंड, कहीं चीतल तो कहीं बाघ अपने शिकार को लेकर जाता मिला। वनों में सभी कुछ सामान्य रहा। वनों में बाहरी स्थानों से किसी को प्रवेश नही मिला। सबसे अधिक खतरा तांत्रिकों से उल्लू पक्षी को होता है। दिवाली पर रात्रि में तंत्र क्रिया में इस पक्षी के अंग व बाघ के नाखून तथा मूंछ के बाल प्रयोग किए जा सकते थे। वहीं बावरिया जाति के लोग भी अक्सर बाघ के शिकार को लेकर सक्रिय हो जाते हैं।
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कालागढ़। दिवाली पर वन्यजीवों की सुरक्षा को लेकर सघन गश्त के दौरान वन्यजीवों के रोमांचक व दुर्लभ दृश्य देखने को मिले। इस दौरान वनों में सभी कुछ सामान्य रहने पर वन विभाग के अधिकारियों ने राहत की सांस ली।
दिवाली पर उल्लू व बाघ के नाखूनों, मूंछ के बालों को तंत्र क्रिया में इस्तेमाल को लेकर वन विभाग चौकस रहा। वनों में अलर्ट जारी कर विभागीय कर्मियों की छुट्टियां तक रद्द की गई। वनों में रात दिन सशस्त्र व लंबी दूरी की गश्त की गई। कालागढ़ के उप प्रभागीय वनाधिकारी कुंदन सिंह खाती ने बताया कि जब सभी दिवाली पर्व को मनाने में लगे थे, ऐसे में वनकर्मी व अधिकारी वनों में वन्यजीवों की सुरक्षा में लगे रहे। वनों में वन्यजीवों के रोमांचक व दुर्लभ दृश्य देखने को मिले। कहीं हाथी के झुंड, कहीं चीतल तो कहीं बाघ अपने शिकार को लेकर जाता मिला। वनों में सभी कुछ सामान्य रहा। वनों में बाहरी स्थानों से किसी को प्रवेश नही मिला। सबसे अधिक खतरा तांत्रिकों से उल्लू पक्षी को होता है। दिवाली पर रात्रि में तंत्र क्रिया में इस पक्षी के अंग व बाघ के नाखून तथा मूंछ के बाल प्रयोग किए जा सकते थे। वहीं बावरिया जाति के लोग भी अक्सर बाघ के शिकार को लेकर सक्रिय हो जाते हैं।
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