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गाय के गोबर से बने दीप से रोशन होगी दीपावली
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बिजनौर में श्री कृष्णायन गौशाला में देसी गाय के गोबर से बनाये गए दीये।
- फोटो : BIJNOR
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गाय के गोबर से बने दीप से रोशन होगी दीपावली
बिजनौर। इस बार दीपावली चाइना मुक्त सामान के साथ साथ प्रकृति के पास ले जाने वाली होगी। नगीना स्थित श्री कृष्णायन गौशाला में पहली बार देसी गाय के गोबर व मूत्र से दीप बनाए जा रहे हैं। गोशाला में पहली बार एक लाख दीप बनाए जाएंगे। ये दीप जनता के बीच बेचे जाएंगे। गोबर के दीप जलाने से प्रकृति और शुद्ध होगी। इससे गोशाला की आमदनी भी बढ़ेगी। जल्दी ही गाय के गोबर से भगवान की मूर्ति भी बनाने की तैयारी है।
गंगा, गाय और गायत्री सनातन संस्कृति की धरोहर हैं। कोरोना संक्रमण को हराने के लिए लगाए गए लॉकडाउन के दौरान लोगों ने प्रकृति का महत्व फिर से समझा है। अब घर-घर में योग होता है। डोकलाम में भारतीय सैनिकों की शहादत के बाद जनता में चाइना के खिलाफ भी गुस्सा है। जनता अब चाइना का माल न खरीदने की बात कर रही है। दीपावली पर चाइना को बड़ा बाजार मिलता है। यहां तक कि घरों और मंदिरों में जलने वाले दीये भी चाइना में बने होते हैं। लेकिन अब जनता मिट्टी के दीये की जलाने की ओर भी लौट रही है। श्रीकृष्णायन गौशाला ने इससे भी एक कदम आगे की बात की है। गौशाला में पहली बार देसी लाल सिंधी गाय के गोबर से दीये बनाए जा रहे हैं। यूपी में बहुत कम जगह पर देसी गाय के गोबर से दीये बनते हैं। जनता में एक दीया तीन रुपये में बेचा जाएगा। दीये बनाने के साथ साथ मूर्तियां बनाने की तैयारी भी की जा रही है।
वैज्ञानिक महत्व
ज्योतिषविद पंडित ललित शर्मा के अनुुसार शास्त्रों में भी देशी गाय के गोबर को बहुत पवित्र माना गया है। शास्त्रों में लिखा है गो मये वसते लक्ष्मी अर्थात गोबर में लक्ष्मी जी का वास है। इससे सकारात्मक ऊर्जा में वृद्धि होती है। मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा करके उन्हें सिद्ध किया जाता है। जबकि देसी गाय के गोबर में लक्ष्मी के वास से यह स्वत: सिद्ध होती हैं। माना जाता है भगवान गणेश का जन्म भी गोबर से हुआ था। ये मूर्ति खंडित होने पर गमलों में खाद के रूप में प्रयोग की जा सकती हैं।
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वैज्ञानिक महत्व
बाजार में मिलने वाली धूपबत्ती व अन्य उत्पादों में कोयला, चारकोल, टायर, चमड़े का चूरा मिलाया जाता है जिसका धुआं सिगरेट के धुएं से भी ज्यादा खतरनाक होता है। मिट्टी के दीयों व मूूर्ति में घी, देसी कपूर व आयुर्वेदिक औषधियां डाली जाती हैं। गाय के गोबर में एंटी रेडिएशन तत्व होते हैं जो मोबाइल से होने वाले रेडिएशन को कम करते हैं।
सामाजिक महत्व
गोबर से बने उत्पाद बिकने से देसी गायों के संरक्षण को बल मिलेगा। जनता द्वारा अपरोक्ष रूप से गाय के लिए एक दिन के भोजन का प्रबंध किया जा सकता है। गोवंश को हत्या से बचाया जा सकता है। इससे दीये बनाने वाली महिलाओं को भी रोजगार मिलता है।
दीये खरीदकर करें जनता की सेवा
श्रीकृष्णायन गौशाला की प्रबंधक अलका लाहोटी का कहना है कि देशी गाय का गोबर व मूत्र आस्था से जुड़ा है। जनता देशी गाय के गोबर से बने दीये खरीदे और विदेशी सामान का बहिष्कार करे। हमारे धर्म में दूसरों को व्यापार का मौका नहीं मिलना चाहिए। जनता दीये खरीदकर गोमाता की सेवा भी कर सकती है।
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बिजनौर। इस बार दीपावली चाइना मुक्त सामान के साथ साथ प्रकृति के पास ले जाने वाली होगी। नगीना स्थित श्री कृष्णायन गौशाला में पहली बार देसी गाय के गोबर व मूत्र से दीप बनाए जा रहे हैं। गोशाला में पहली बार एक लाख दीप बनाए जाएंगे। ये दीप जनता के बीच बेचे जाएंगे। गोबर के दीप जलाने से प्रकृति और शुद्ध होगी। इससे गोशाला की आमदनी भी बढ़ेगी। जल्दी ही गाय के गोबर से भगवान की मूर्ति भी बनाने की तैयारी है।
गंगा, गाय और गायत्री सनातन संस्कृति की धरोहर हैं। कोरोना संक्रमण को हराने के लिए लगाए गए लॉकडाउन के दौरान लोगों ने प्रकृति का महत्व फिर से समझा है। अब घर-घर में योग होता है। डोकलाम में भारतीय सैनिकों की शहादत के बाद जनता में चाइना के खिलाफ भी गुस्सा है। जनता अब चाइना का माल न खरीदने की बात कर रही है। दीपावली पर चाइना को बड़ा बाजार मिलता है। यहां तक कि घरों और मंदिरों में जलने वाले दीये भी चाइना में बने होते हैं। लेकिन अब जनता मिट्टी के दीये की जलाने की ओर भी लौट रही है। श्रीकृष्णायन गौशाला ने इससे भी एक कदम आगे की बात की है। गौशाला में पहली बार देसी लाल सिंधी गाय के गोबर से दीये बनाए जा रहे हैं। यूपी में बहुत कम जगह पर देसी गाय के गोबर से दीये बनते हैं। जनता में एक दीया तीन रुपये में बेचा जाएगा। दीये बनाने के साथ साथ मूर्तियां बनाने की तैयारी भी की जा रही है।
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वैज्ञानिक महत्व
ज्योतिषविद पंडित ललित शर्मा के अनुुसार शास्त्रों में भी देशी गाय के गोबर को बहुत पवित्र माना गया है। शास्त्रों में लिखा है गो मये वसते लक्ष्मी अर्थात गोबर में लक्ष्मी जी का वास है। इससे सकारात्मक ऊर्जा में वृद्धि होती है। मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा करके उन्हें सिद्ध किया जाता है। जबकि देसी गाय के गोबर में लक्ष्मी के वास से यह स्वत: सिद्ध होती हैं। माना जाता है भगवान गणेश का जन्म भी गोबर से हुआ था। ये मूर्ति खंडित होने पर गमलों में खाद के रूप में प्रयोग की जा सकती हैं।
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वैज्ञानिक महत्व
बाजार में मिलने वाली धूपबत्ती व अन्य उत्पादों में कोयला, चारकोल, टायर, चमड़े का चूरा मिलाया जाता है जिसका धुआं सिगरेट के धुएं से भी ज्यादा खतरनाक होता है। मिट्टी के दीयों व मूूर्ति में घी, देसी कपूर व आयुर्वेदिक औषधियां डाली जाती हैं। गाय के गोबर में एंटी रेडिएशन तत्व होते हैं जो मोबाइल से होने वाले रेडिएशन को कम करते हैं।
सामाजिक महत्व
गोबर से बने उत्पाद बिकने से देसी गायों के संरक्षण को बल मिलेगा। जनता द्वारा अपरोक्ष रूप से गाय के लिए एक दिन के भोजन का प्रबंध किया जा सकता है। गोवंश को हत्या से बचाया जा सकता है। इससे दीये बनाने वाली महिलाओं को भी रोजगार मिलता है।
दीये खरीदकर करें जनता की सेवा
श्रीकृष्णायन गौशाला की प्रबंधक अलका लाहोटी का कहना है कि देशी गाय का गोबर व मूत्र आस्था से जुड़ा है। जनता देशी गाय के गोबर से बने दीये खरीदे और विदेशी सामान का बहिष्कार करे। हमारे धर्म में दूसरों को व्यापार का मौका नहीं मिलना चाहिए। जनता दीये खरीदकर गोमाता की सेवा भी कर सकती है।