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गंगा की रेती में अवैध, रासायनिक खेती रोकना चुनौती
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बिजनौर के खादर क्षेत्र में गंगा की रेती में बोई गई गेंहू की फसल।
- फोटो : BIJNOR
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गंगा की रेती में अवैध खेती रोकना चुनौती
बिजनौर। किसानों को गंगा किनारे जैविक खेती के लिए जागरूक किया जा रहा है लेकिन गंगा की रेती में होने वाली खेती रोकना प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती है। गंगा की हजारों हेक्टेअर जमीन में हर साल अवैध खेती होती है। इस खेती को रोकने के लिए इस बार पहले से ज्यादा प्रयास करने की बात कही जा रही है।
खादर में गंगा की पांच किमी से ज्यादा चौड़ी धारा है। यह सब जमीन गंगा की धारा में ही दर्ज है। यह नौ हजार हेक्टेअर से भी अधिक जमीन है। बरसात में गंगा के उफान की वजह से कोई खेती नहीं होती है लेकिन बरसात खत्म होते ही गंगा रेती छोड़नी शुरू कर देती है। हजारों बीघा जमीन में ऊंचे और बहुत उपजाऊ जमीन के टापू बन जाते हैं। इन टापुओं पर हर साल बड़े पैमाने पर खेती होती है। अफसर और नेताओं में पहचान रखने वाले लोग जमीन को किसानों को बटाई या किराए पर ऐसे देते हैं जैसे उनकी खुद की हो। पहले गेहूं और बाद में पलेज की फसलें बोई जाती हैं। गंगा किनारे के गांवों में रासायनिक खेती पर तो रोक लगाई जा रही है लेकिन गंगा की रेती में ही अवैध तरीके से होने वाली खेती में रसायन का धड़ल्ले से प्रयोग होता है। इस खेती को रोकने के लिए इस बार प्रशासन ने बड़े स्तर पर अभियान चलाने का निर्णय लिया है। गंगा किनारे के क्षेत्र को जोन में बांटकर वन विभाग रोज पेट्रोलिंग कराएगा। रावली में तो वन चौकी भी खोल दी गई है।
रावली में खुले वन चौकी
रावली के पास दलदली जमीन है। दलदली जमीन बारासिंघा को बहुत भाती है। उत्तराखंड के राजाजी नेशनल पार्क से बारासिंघा क्षेत्र में आते हैं। लेकिन खेती व अन्य व्यवधानों से उन्हें वापस लौटना पड़ता है। इसे रोकने और बारासिंघा का स्थायी निवास क्षेत्र कराने के लिए वन विभाग ने रावली में वन चौकी खुलवाई है।
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गंगा में शिकार रोकने के लिए प्रयास शुरू
गंगा में होने वाले शिकार को रोकने के लिए भी प्रशासन ने प्रयास शुरू कर दिए। गंगा में मोटरबोट से सुबह शाम शिकारी गतिविधियों पर नजर रखी जा रही है।
अवैध खेती नहीं होने दी जाएगी
डीएफओ डॉ. एम सेम्मारन के अनुसार गंगा की रेती में खेती रोकने और बारासिंघा के संरक्षण के लिए बड़े स्तर पर अभियान चलाया जा रहा है। गंगा की रेती में अवैध खेती नहीं होने दी जाएगी। वन्य जीवों का पूरा संरक्षण कराया जा रहा है।
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बिजनौर। किसानों को गंगा किनारे जैविक खेती के लिए जागरूक किया जा रहा है लेकिन गंगा की रेती में होने वाली खेती रोकना प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती है। गंगा की हजारों हेक्टेअर जमीन में हर साल अवैध खेती होती है। इस खेती को रोकने के लिए इस बार पहले से ज्यादा प्रयास करने की बात कही जा रही है।
खादर में गंगा की पांच किमी से ज्यादा चौड़ी धारा है। यह सब जमीन गंगा की धारा में ही दर्ज है। यह नौ हजार हेक्टेअर से भी अधिक जमीन है। बरसात में गंगा के उफान की वजह से कोई खेती नहीं होती है लेकिन बरसात खत्म होते ही गंगा रेती छोड़नी शुरू कर देती है। हजारों बीघा जमीन में ऊंचे और बहुत उपजाऊ जमीन के टापू बन जाते हैं। इन टापुओं पर हर साल बड़े पैमाने पर खेती होती है। अफसर और नेताओं में पहचान रखने वाले लोग जमीन को किसानों को बटाई या किराए पर ऐसे देते हैं जैसे उनकी खुद की हो। पहले गेहूं और बाद में पलेज की फसलें बोई जाती हैं। गंगा किनारे के गांवों में रासायनिक खेती पर तो रोक लगाई जा रही है लेकिन गंगा की रेती में ही अवैध तरीके से होने वाली खेती में रसायन का धड़ल्ले से प्रयोग होता है। इस खेती को रोकने के लिए इस बार प्रशासन ने बड़े स्तर पर अभियान चलाने का निर्णय लिया है। गंगा किनारे के क्षेत्र को जोन में बांटकर वन विभाग रोज पेट्रोलिंग कराएगा। रावली में तो वन चौकी भी खोल दी गई है।
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रावली में खुले वन चौकी
रावली के पास दलदली जमीन है। दलदली जमीन बारासिंघा को बहुत भाती है। उत्तराखंड के राजाजी नेशनल पार्क से बारासिंघा क्षेत्र में आते हैं। लेकिन खेती व अन्य व्यवधानों से उन्हें वापस लौटना पड़ता है। इसे रोकने और बारासिंघा का स्थायी निवास क्षेत्र कराने के लिए वन विभाग ने रावली में वन चौकी खुलवाई है।
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गंगा में शिकार रोकने के लिए प्रयास शुरू
गंगा में होने वाले शिकार को रोकने के लिए भी प्रशासन ने प्रयास शुरू कर दिए। गंगा में मोटरबोट से सुबह शाम शिकारी गतिविधियों पर नजर रखी जा रही है।
अवैध खेती नहीं होने दी जाएगी
डीएफओ डॉ. एम सेम्मारन के अनुसार गंगा की रेती में खेती रोकने और बारासिंघा के संरक्षण के लिए बड़े स्तर पर अभियान चलाया जा रहा है। गंगा की रेती में अवैध खेती नहीं होने दी जाएगी। वन्य जीवों का पूरा संरक्षण कराया जा रहा है।

बिजनौर के ग्राम रावली क्षेत्र में गश्त करती वन विभाग की टीम।- फोटो : BIJNOR