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ई कोशिशों के बाद भी 20 के पार नहीं जा पा रही छात्र संख्या
Updated Tue, 27 Mar 2018 11:03 PM IST
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नजीबाबाद।
शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए विभाग ने अपना रुख कड़ा कर लिया है। कई प्रयासों के बावजूद छात्र संख्या न बढ़ने पर बेसिक शिक्षा विभाग ने ऐसे सरकारी स्कूलों को बंद करने का मन बना लिया है। नजीबाबाद विकासखंड में ऐसे दर्जन भर स्कूल चिह्नित किए गए हैं।
विकास खंड के प्राथमिक एवं पूर्व माध्यमिक विद्यालयों में विद्यार्थियों की संख्या बढ़ाने के लिए सर्व शिक्षा अभियान के अंतर्गत स्कूल चलो अभियान चलाया जाता है। इसमें जागरूकता रैलियां निकाली जाती हैं। इसके अलावा विद्यालय और अभिभावकों के बीच से प्रबंध समिति के अध्यक्ष और सदस्यों का चयन कर प्रतिमाह बैठकें आयोजित कर शिक्षा व्यवस्था में सुधार की कोशिशें की जाती हैं। शिक्षकों द्वारा घर-घर जाकर अभिभावकों से संपर्क करना, नुक्कड़ बैठकें आयोजित करना भी साल भर चलता है। इतना ही नहीं बेसिक शिक्षा विभाग शिक्षा व्यवस्था बेहतर ढंग से संचालित करने के लिए शिक्षकों का नवाचार भी कराता है। इन व्यवस्थाओं के बीच ब्लॉक के कई प्राथमिक और पूर्व माध्यमिक विद्यालयों में छात्र संख्या मानक से काफी कम होने को शासन ने गंभीरता से लिया है। ऐसे विद्यालयों को बंद करने पर विचार शुरू हो गया है।
बीईओ इशकलाल ने बताया कि गांव चमरौला, मलूकवाली, जसपुर, कुतुबपुर नंगली, मोटाढाक स्थित प्राथमिक विद्यालय और गांव मोचीपरा, वीरपुर, कुतुबपुर नंगली और मोटाढाक स्थित पूर्व माध्यमिक विद्यालयों सहित कुछ ऐसे विद्यालयों को चिह्नित कर शासन को सूची भेजी गई है, जहां छात्र संख्या 20 से भी कम है।
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रैली के लिए मिलते हैं 500 रुपये
सर्व शिक्षा अभियान के अंतर्गत जागरूकता रैली निकालने के लिए प्रत्येक परिषदीय प्राथमिक एवं पूर्व माध्यमिक विद्यालय को सरकार द्वारा 500 रुपये का बजट जारी किया जाता है। इसके अलावा गांव के बच्चों को सरकारी स्कूल की ओर आकर्षित करने के लिए व्यवस्थाएं जुटाने पर प्रतिवर्ष हजारों रुपये का बजट खर्च किया जाता है। इसके बावजूद कई स्कूलों में छात्र संख्या का न बढ़ना बेसिक शिक्षा विभाग के लिए सिरदर्द बना हुआ है।
सघन आबादी न होना मुख्य कारण - बीईओ
बीईओ इश्कलाल ने बताया कि चिह्नित किए गए कम छात्र संख्या वाले विद्यालयों के आसपास सघन आबादी नहीं है। अलग-अलग डेरों पर परिवार रहते हैं। कुछ परिवारों में बच्चे नहीं होते हैं तो कुछ परिवारों से स्कूलों की दूरी अधिक होने से वे बच्चों को स्कूल नहीं भेज पाते हैं।
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शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए विभाग ने अपना रुख कड़ा कर लिया है। कई प्रयासों के बावजूद छात्र संख्या न बढ़ने पर बेसिक शिक्षा विभाग ने ऐसे सरकारी स्कूलों को बंद करने का मन बना लिया है। नजीबाबाद विकासखंड में ऐसे दर्जन भर स्कूल चिह्नित किए गए हैं।
विकास खंड के प्राथमिक एवं पूर्व माध्यमिक विद्यालयों में विद्यार्थियों की संख्या बढ़ाने के लिए सर्व शिक्षा अभियान के अंतर्गत स्कूल चलो अभियान चलाया जाता है। इसमें जागरूकता रैलियां निकाली जाती हैं। इसके अलावा विद्यालय और अभिभावकों के बीच से प्रबंध समिति के अध्यक्ष और सदस्यों का चयन कर प्रतिमाह बैठकें आयोजित कर शिक्षा व्यवस्था में सुधार की कोशिशें की जाती हैं। शिक्षकों द्वारा घर-घर जाकर अभिभावकों से संपर्क करना, नुक्कड़ बैठकें आयोजित करना भी साल भर चलता है। इतना ही नहीं बेसिक शिक्षा विभाग शिक्षा व्यवस्था बेहतर ढंग से संचालित करने के लिए शिक्षकों का नवाचार भी कराता है। इन व्यवस्थाओं के बीच ब्लॉक के कई प्राथमिक और पूर्व माध्यमिक विद्यालयों में छात्र संख्या मानक से काफी कम होने को शासन ने गंभीरता से लिया है। ऐसे विद्यालयों को बंद करने पर विचार शुरू हो गया है।
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बीईओ इशकलाल ने बताया कि गांव चमरौला, मलूकवाली, जसपुर, कुतुबपुर नंगली, मोटाढाक स्थित प्राथमिक विद्यालय और गांव मोचीपरा, वीरपुर, कुतुबपुर नंगली और मोटाढाक स्थित पूर्व माध्यमिक विद्यालयों सहित कुछ ऐसे विद्यालयों को चिह्नित कर शासन को सूची भेजी गई है, जहां छात्र संख्या 20 से भी कम है।
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रैली के लिए मिलते हैं 500 रुपये
सर्व शिक्षा अभियान के अंतर्गत जागरूकता रैली निकालने के लिए प्रत्येक परिषदीय प्राथमिक एवं पूर्व माध्यमिक विद्यालय को सरकार द्वारा 500 रुपये का बजट जारी किया जाता है। इसके अलावा गांव के बच्चों को सरकारी स्कूल की ओर आकर्षित करने के लिए व्यवस्थाएं जुटाने पर प्रतिवर्ष हजारों रुपये का बजट खर्च किया जाता है। इसके बावजूद कई स्कूलों में छात्र संख्या का न बढ़ना बेसिक शिक्षा विभाग के लिए सिरदर्द बना हुआ है।
सघन आबादी न होना मुख्य कारण - बीईओ
बीईओ इश्कलाल ने बताया कि चिह्नित किए गए कम छात्र संख्या वाले विद्यालयों के आसपास सघन आबादी नहीं है। अलग-अलग डेरों पर परिवार रहते हैं। कुछ परिवारों में बच्चे नहीं होते हैं तो कुछ परिवारों से स्कूलों की दूरी अधिक होने से वे बच्चों को स्कूल नहीं भेज पाते हैं।