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डब्ल्यूबी-02 प्रजाति से बढ़ेगी गेहूं की पैदावार, किसानों को होगा दुगना फायदा
Thu, 21 Feb 2019 12:28 AM IST
Dimple Sirohi
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बिजनौर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बिजनौर
Published by: Dimple Sirohi
Updated Thu, 21 Feb 2019 12:28 AM IST
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गेहूं
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कुपोषण से लडे़गी गेहूं की नई प्रजाति
बिजनौर। कृषि वैज्ञानिकों ने गेहूं का उत्पादन बढ़ाने के लिए नई प्रजाति डब्ल्यूू बी-02 विकसित की है। यह कुपोषण से लड़ने में सहायक साबित होगी। नई प्रजाति की पैदावार पुरानी प्रजातियों से काफी अधिक होगी। नई प्रजाति में पोषक तत्व अधिक होने के कारण यह कुपोषण से लड़ने में मददगार होगी। बाजार में किसानों को इसके अच्छे दाम भी मिलेंगे।
गन्ने के बाद गेहूं जिले में सबसे ज्यादा बोई जाने वाली फसल है। जिले में करीब डेढ़ लाख हेक्टेयर जमीन में गेहूं बोया जाता है। लेकिन बीते कुछ समय से गेहूं बोने में किसानों का रुझान कम हुआ है। वजह है गेहूं का कम उत्पादन और गन्ने के प्रति बढ़ता रुझान। किसानों को गेहूं की फसल बोने के लिए कृषि वैज्ञानिक नई प्रजाति विकसित करने में लगे हैं। कृषि वैज्ञानिकों ने डब्ल्यू बी-02 प्रजाति विकसित की है। यह प्रजाति सामान्य प्रजाति से अधिक पैदावार देगी। साथ ही इसमें पोषक तत्वों की मात्रा भी सामान्य गेहूं से ज्यादा है। जिले के 20 किसानों के यहां इस प्रजाति का बीज बोया गया है। छह हेक्टेयर में इस साल इस प्रजाति की फसल बोई गई है। अगले साल ये बाकी किसानों को बीज देंगे और इस प्रजाति का रकबा बड़े स्तर पर बढ़ाया जाएगा। पैदावार अधिक होने से इसे बोने पर किसानों को फायदा होगा।
सामान्य प्रजाति से अधिक है पैदावार
डब्ल्यू बी-02 प्रजाति की पैदावार भी सामान्य प्रजाति से ज्यादा है। सामान्य प्रजाति के गेहूं की प्रति हेक्टेयर में औसतन 45 से 47 क्विंटल तक पैदावार देती है। डब्ल्यू बी-02 प्रजाति की औसत पैदावार 52 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक है। इसकी पैदावार 60 क्विंटल से अधिक होने का अनुमान है। इसके आटे से बनी रोटी सफेद व मुलायम होती है। यह प्रजाति 142 दिन में तैयार हो जाती है।
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कुपोषण से लड़ने में मददगार
कुपोषण देश में बड़ी समस्या का रूप लेता जा जा रहा है। नौनिहालों के साथ-साथ बालिकाओं और गर्भवती महिलाओं में भी कुपोषण का स्तर बढ़ता जा रहा है। सामान्य प्रजाति के गेहूं में जिंक और आयरन की मात्रा 258-25 पीपीएम (पार्ट्स पर मिलियन) होती है। लेकिन डब्ल्यू बी-02 में यह जिंक 42 पीपीएम और आयरन 40 पीपीएम तक होता है। आयरन व जिंक कुपोषण के खिलाफ लड़ाई में मुख्य माने जाते हैं। इनकी मात्रा डब्ल्यू बी-02 प्रजाति में 150 प्रतिशत से भी अधिक है।
मिल सकती है ज्यादा कीमत
पोषण का दावा करने वाली कई बिस्कुट कंपनी अपने उत्पाद में जिंक और आयरन काफी होने का दावा करती हैं। ये उत्पाद आटे या मैदा के बने होते हैं। इनमें आयरन और जिंक अलग से मिलाया जाता है। लेकिन डब्ल्यू बी-02 प्रजाति में जिंक और आयरन पहले से ही बढ़े हुए हैं। अनेक उत्पाद बनाने वाली कंपनी इस प्रजाति की किसानों को ज्यादा कीमत दे सकती हैं। नगीना स्थित कृषि विज्ञान केंद्र के कृषि वैज्ञानिक डॉ. केके सिंह के अनुसार डब्ल्यू बी-02 प्रजाति का बीज 20 किसानों को दिया गया है। उनके खेतों में इसकी फसल बहुत अच्छी खड़ी है। अगले साल ज्यादा संख्या में किसान इस प्रजाति को बोएंगे।
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बिजनौर। कृषि वैज्ञानिकों ने गेहूं का उत्पादन बढ़ाने के लिए नई प्रजाति डब्ल्यूू बी-02 विकसित की है। यह कुपोषण से लड़ने में सहायक साबित होगी। नई प्रजाति की पैदावार पुरानी प्रजातियों से काफी अधिक होगी। नई प्रजाति में पोषक तत्व अधिक होने के कारण यह कुपोषण से लड़ने में मददगार होगी। बाजार में किसानों को इसके अच्छे दाम भी मिलेंगे।
गन्ने के बाद गेहूं जिले में सबसे ज्यादा बोई जाने वाली फसल है। जिले में करीब डेढ़ लाख हेक्टेयर जमीन में गेहूं बोया जाता है। लेकिन बीते कुछ समय से गेहूं बोने में किसानों का रुझान कम हुआ है। वजह है गेहूं का कम उत्पादन और गन्ने के प्रति बढ़ता रुझान। किसानों को गेहूं की फसल बोने के लिए कृषि वैज्ञानिक नई प्रजाति विकसित करने में लगे हैं। कृषि वैज्ञानिकों ने डब्ल्यू बी-02 प्रजाति विकसित की है। यह प्रजाति सामान्य प्रजाति से अधिक पैदावार देगी। साथ ही इसमें पोषक तत्वों की मात्रा भी सामान्य गेहूं से ज्यादा है। जिले के 20 किसानों के यहां इस प्रजाति का बीज बोया गया है। छह हेक्टेयर में इस साल इस प्रजाति की फसल बोई गई है। अगले साल ये बाकी किसानों को बीज देंगे और इस प्रजाति का रकबा बड़े स्तर पर बढ़ाया जाएगा। पैदावार अधिक होने से इसे बोने पर किसानों को फायदा होगा।
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सामान्य प्रजाति से अधिक है पैदावार
डब्ल्यू बी-02 प्रजाति की पैदावार भी सामान्य प्रजाति से ज्यादा है। सामान्य प्रजाति के गेहूं की प्रति हेक्टेयर में औसतन 45 से 47 क्विंटल तक पैदावार देती है। डब्ल्यू बी-02 प्रजाति की औसत पैदावार 52 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक है। इसकी पैदावार 60 क्विंटल से अधिक होने का अनुमान है। इसके आटे से बनी रोटी सफेद व मुलायम होती है। यह प्रजाति 142 दिन में तैयार हो जाती है।
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कुपोषण से लड़ने में मददगार
कुपोषण देश में बड़ी समस्या का रूप लेता जा जा रहा है। नौनिहालों के साथ-साथ बालिकाओं और गर्भवती महिलाओं में भी कुपोषण का स्तर बढ़ता जा रहा है। सामान्य प्रजाति के गेहूं में जिंक और आयरन की मात्रा 258-25 पीपीएम (पार्ट्स पर मिलियन) होती है। लेकिन डब्ल्यू बी-02 में यह जिंक 42 पीपीएम और आयरन 40 पीपीएम तक होता है। आयरन व जिंक कुपोषण के खिलाफ लड़ाई में मुख्य माने जाते हैं। इनकी मात्रा डब्ल्यू बी-02 प्रजाति में 150 प्रतिशत से भी अधिक है।
मिल सकती है ज्यादा कीमत
पोषण का दावा करने वाली कई बिस्कुट कंपनी अपने उत्पाद में जिंक और आयरन काफी होने का दावा करती हैं। ये उत्पाद आटे या मैदा के बने होते हैं। इनमें आयरन और जिंक अलग से मिलाया जाता है। लेकिन डब्ल्यू बी-02 प्रजाति में जिंक और आयरन पहले से ही बढ़े हुए हैं। अनेक उत्पाद बनाने वाली कंपनी इस प्रजाति की किसानों को ज्यादा कीमत दे सकती हैं। नगीना स्थित कृषि विज्ञान केंद्र के कृषि वैज्ञानिक डॉ. केके सिंह के अनुसार डब्ल्यू बी-02 प्रजाति का बीज 20 किसानों को दिया गया है। उनके खेतों में इसकी फसल बहुत अच्छी खड़ी है। अगले साल ज्यादा संख्या में किसान इस प्रजाति को बोएंगे।