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आजादी के आंदोलन में गौरवमयी रहा है नूरपुर का इतिहास
Updated Wed, 15 Aug 2018 12:24 AM IST
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प्रत्येक वर्ष नूरपुर में लगता है शहीद मेला
नूरपुर। आजादी के आंदोलन में नूरपुर का इतिहास गौरवमयी रहा है। महात्मा गांधी द्वारा वर्ष 1942 में चलाए गए अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन में क्षेत्र के दो वीर सपूतों ने अपनी जान गवाईं थी। नूरपुर थाने पर तिरंगा फहराने के दौरान ब्रिटिश पुलिस की गोली से शहीद हुए गांव अस्करीपुर निवासी रिक्खी सिंह व गुनियाखेड़ी निवासी परवीन सिंह की याद में नूरपुर थाने के सामने शहीद स्थल बना हुआ है। प्रत्येक वर्ष 16 अगस्त को शहीद स्थल पर मेले का आयोजन कर उन्हें श्रद्धांजलि दी जाती है।
महात्मा गांधी ने आठ अगस्त को मुंबई से अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत की थी। इसके बाद देश में भर में जगह-जगह धरना-प्रदर्शन की शुरुआत हो गई। नूरपुर भी इस आंदोलन से अछूता नहीं रहा। 16 अगस्त 1942 को नूरपुर थाने पर तिरंगा झंडा फहराने की योजना बनाई गई। इसके लिए आंदोलन में शामिल लोगों ने गुपचुप जनसंपर्क करना शुरू कर दिया। योजना के अनुसार चारों ओर से हजारों की भीड़ नूरपुर पहुंच गई। पुलिस ने भीड़ को काफी रोकने का प्रयास किया, लेकिन फिर भी काफी लोग थाने तक पहुंच गए। भीड़ ने पुलिस से शांतिपूर्ण ढंग से प्रदर्शन कर तिरंगा झंडा फहराने की मांग की, लेकिन पुलिस ने इजाजत नहीं दी। इसके बाद कुछ लोग हाथ में तिरंगा लेकर थाने की छत तक पहुंच गए। पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पहले लाठीचार्ज किया और बाद में गोली चला दी। इस दौरान तिरंगा फहराने का प्रयास कर रहे गुनियाखेड़ी निवासी परवीन सिंह की मौके पर ही मौत हो गई थी, जबकि अस्करीपुर निवासी रिक्खी सिंह ने अस्पताल ले जाते समय रास्ते में दम तोड़ा था। इस समय परवीन सिंह की मौत हुई उस समय उनकी उम्र 20 वर्ष से भी कम थी। उनकी शादी हो चुकी थी, लेकिन गौना नही हुआ था। परवीन सिंह की मौत के बाद उनकी पत्नी ने दूसरी शादी करने से इंकार कर दिया था। उन्होंने अपना पूरा जीवन पति की याद में ही गुजार दिया। करीब पांच वर्ष पूर्व उनकी मौत हो गई। रिक्खी सिंह की भी शादी हो चुकी थी तथा उनका इकलौते पुत्र रामप्रसाद सिंह आज भी जीवित हैं। दोनों शहीदों की याद में नूरपुर में थाने के सामने शहीद स्मारक बना हुआ है, जहां प्रत्येक वर्ष शहीद मेले का आयोजन किया जाता है। इस वर्ष हिंदू जागरण मंच की ओर से 16 अगस्त को शहीद स्थल पर बलिदानों की माटी को नमन कार्यक्रम का आयोजन करने की घोषणा की गई है। इस कार्यक्रम में आजादी के शहीदों एवं देशसेवा करते हुए सेना में शहीद हुए जवानों के परिजनों को सम्मानित किया जाएगा।
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नूरपुर। आजादी के आंदोलन में नूरपुर का इतिहास गौरवमयी रहा है। महात्मा गांधी द्वारा वर्ष 1942 में चलाए गए अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन में क्षेत्र के दो वीर सपूतों ने अपनी जान गवाईं थी। नूरपुर थाने पर तिरंगा फहराने के दौरान ब्रिटिश पुलिस की गोली से शहीद हुए गांव अस्करीपुर निवासी रिक्खी सिंह व गुनियाखेड़ी निवासी परवीन सिंह की याद में नूरपुर थाने के सामने शहीद स्थल बना हुआ है। प्रत्येक वर्ष 16 अगस्त को शहीद स्थल पर मेले का आयोजन कर उन्हें श्रद्धांजलि दी जाती है।
महात्मा गांधी ने आठ अगस्त को मुंबई से अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत की थी। इसके बाद देश में भर में जगह-जगह धरना-प्रदर्शन की शुरुआत हो गई। नूरपुर भी इस आंदोलन से अछूता नहीं रहा। 16 अगस्त 1942 को नूरपुर थाने पर तिरंगा झंडा फहराने की योजना बनाई गई। इसके लिए आंदोलन में शामिल लोगों ने गुपचुप जनसंपर्क करना शुरू कर दिया। योजना के अनुसार चारों ओर से हजारों की भीड़ नूरपुर पहुंच गई। पुलिस ने भीड़ को काफी रोकने का प्रयास किया, लेकिन फिर भी काफी लोग थाने तक पहुंच गए। भीड़ ने पुलिस से शांतिपूर्ण ढंग से प्रदर्शन कर तिरंगा झंडा फहराने की मांग की, लेकिन पुलिस ने इजाजत नहीं दी। इसके बाद कुछ लोग हाथ में तिरंगा लेकर थाने की छत तक पहुंच गए। पुलिस ने भीड़ को तितर-बितर करने के लिए पहले लाठीचार्ज किया और बाद में गोली चला दी। इस दौरान तिरंगा फहराने का प्रयास कर रहे गुनियाखेड़ी निवासी परवीन सिंह की मौके पर ही मौत हो गई थी, जबकि अस्करीपुर निवासी रिक्खी सिंह ने अस्पताल ले जाते समय रास्ते में दम तोड़ा था। इस समय परवीन सिंह की मौत हुई उस समय उनकी उम्र 20 वर्ष से भी कम थी। उनकी शादी हो चुकी थी, लेकिन गौना नही हुआ था। परवीन सिंह की मौत के बाद उनकी पत्नी ने दूसरी शादी करने से इंकार कर दिया था। उन्होंने अपना पूरा जीवन पति की याद में ही गुजार दिया। करीब पांच वर्ष पूर्व उनकी मौत हो गई। रिक्खी सिंह की भी शादी हो चुकी थी तथा उनका इकलौते पुत्र रामप्रसाद सिंह आज भी जीवित हैं। दोनों शहीदों की याद में नूरपुर में थाने के सामने शहीद स्मारक बना हुआ है, जहां प्रत्येक वर्ष शहीद मेले का आयोजन किया जाता है। इस वर्ष हिंदू जागरण मंच की ओर से 16 अगस्त को शहीद स्थल पर बलिदानों की माटी को नमन कार्यक्रम का आयोजन करने की घोषणा की गई है। इस कार्यक्रम में आजादी के शहीदों एवं देशसेवा करते हुए सेना में शहीद हुए जवानों के परिजनों को सम्मानित किया जाएगा।
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