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‘स्वयं को सुसंस्कारित बनाने की है जरूरत’
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‘स्वयं को सुसंस्कारित बनाने की है जरूरत’
बिजनौर। श्री हरि चैतन्य पुरी महाराज ने आवास विकास में प्रवचन करते हुए कहा कि हममें परमात्मा के प्रति दृढ़ विश्वास होना चाहिए। ईश्वर के प्रति मन में यदि संशय आ जाता है तो उसके प्रति होने वाली भक्ति स्वत: ही नष्ट हो जाती है। प्यार की न तो कोई परिभाषा होती है और न ही प्यार को किसी बंधन में बाधा जा सकता है।
प्रवचन में कहा कि संसार में सभी लोग किसी न किसी स्वार्थवश ही संबंध रखते हैं। जीव मात्र से बिना किसी स्वार्थ के हित चाहने व प्रेम करने वाले तो एक मात्र परमात्मा ही है। बिना विचार कोई कर्म नहीं करना चाहिए। विचारशील प्राणी कुछ भी बोलने से, व्यवहार करने, संबंध बनाने या कर्म करने से पहले विचार करता है। परमात्मा तो हमारी प्रेम व भावनाओं का भूखा है। प्रेम रहित दुर्योधन के आतिथ्य को त्याग कर विदुर की कुटिया में साग व केले के छिलके भी प्रेम सहित स्वीकार करता है। कहा कि मात्र मानव शरीर पाकर ही हम सच्चे अर्थों में मानव या इंसान कहलाने का अधिकारी नहीं बन जाते हैं, स्वयं को सुसंस्कारित करके समाज के लिए उपयोगी बनना चाहिए।
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बिजनौर। श्री हरि चैतन्य पुरी महाराज ने आवास विकास में प्रवचन करते हुए कहा कि हममें परमात्मा के प्रति दृढ़ विश्वास होना चाहिए। ईश्वर के प्रति मन में यदि संशय आ जाता है तो उसके प्रति होने वाली भक्ति स्वत: ही नष्ट हो जाती है। प्यार की न तो कोई परिभाषा होती है और न ही प्यार को किसी बंधन में बाधा जा सकता है।
प्रवचन में कहा कि संसार में सभी लोग किसी न किसी स्वार्थवश ही संबंध रखते हैं। जीव मात्र से बिना किसी स्वार्थ के हित चाहने व प्रेम करने वाले तो एक मात्र परमात्मा ही है। बिना विचार कोई कर्म नहीं करना चाहिए। विचारशील प्राणी कुछ भी बोलने से, व्यवहार करने, संबंध बनाने या कर्म करने से पहले विचार करता है। परमात्मा तो हमारी प्रेम व भावनाओं का भूखा है। प्रेम रहित दुर्योधन के आतिथ्य को त्याग कर विदुर की कुटिया में साग व केले के छिलके भी प्रेम सहित स्वीकार करता है। कहा कि मात्र मानव शरीर पाकर ही हम सच्चे अर्थों में मानव या इंसान कहलाने का अधिकारी नहीं बन जाते हैं, स्वयं को सुसंस्कारित करके समाज के लिए उपयोगी बनना चाहिए।
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