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गणपति के पूजन के साथ प्रकृति का भी रहेगा ध्यान

Thu, 06 Sep 2018 12:33 AM IST
Updated Thu, 06 Sep 2018 12:33 AM IST
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गणपति के पूजन के साथ प्रकृति का भी रहेगा ध्यान
गणपति के पूजन के साथ प्रकृति का भी रहेगा ध्यान
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बिजनौर।
इस बार गणेश चतुर्थी पर भगवान गणपति के पूजन के साथ साथ प्रकृति को सहेजने का काम भी किया जाएगा। गणेश चतुर्थी पर पहली बार बाजार में कच्ची मिट्टी की मूर्ति आई हैं। ये मूर्तियां पानी में कुछ ही मिनटों में घुल जाएंगी। इनमें रंग भी बिना केमिकल वाले भरे गए हैं। मूर्तियों की बाजार में काफी मांग है।
गणेश चतुर्थी जिले में भी धूमधाम से मनाया जाता है। महाराष्ट्र से आए सराफा कारीगरों ने जिले में दो दशक पहले इस पूजन की शुरूआत की थी। आज यह पर्व धूमधाम से पूरे जिले में मनाया जाता है। यहां तक कि गांवों में भी गणेश चतुर्थी मनाई जाती है। मंदिरों व सार्वजनिक स्थलों के अलावा घरों में भी गणपति विराजमान किए जाते हैं। पूजन के बाद श्रद्धालु पूरी श्रद्धापूर्वक मूर्तियों को नदियों में विसर्जित करते हैं। गंगा में मूर्तियों के विसर्जन पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा रखी है। इसकी वजह है मूर्तियों पर केमिकल व पीओपी से बना होने से पक्का होने के कारण इनका न गलना। हालांकि भक्त किसी नहर या नदी की छोटी धारा में मूर्तियों तो प्रवाहित करते ही हैं। इस बार बाजार में कच्ची मिट्टी से बनी भगवान गणेश की मूर्ति आई है। यह मूर्ति पहली बार बाजार में आई है। इस मिट्टी की विशेषता यह है कि यह चिकनी मिट्टी से बनाई गई है। यह पानी में डालते ही घुल जाएगी। इसमें बिना केमिकल वाले रंगों का इस्तेमाल किया गया है। यह पर्यावरण को किसी तरह का नुकसान नहीं पहुंचाएंगी। बिजनौर में मोहल्ला दक्षनगर निवासी कमल कुमार व गौरव कुमार ये मूर्तियां बना रहे हैं।
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गौरव और कमल की बनी मूर्ति यूपी के अलावा उत्तराखंड व हरिद्वार में बिकती हैं। कच्ची मिट्टी से बनी मूर्ति की ऊंचाई छह इंच से साढ़े तीन फीट तक है। आधा फीट ऊंची मूर्ति 600 रुपये की व साढ़े तीन फीट ऊंची मूर्ति पांच हजार रुपये तक की है। प्रदूषण नियंत्रण विभाग के क्षेत्रीय अधिकारी जीसी वर्मा के अनुसार श्रद्धालु कच्ची मिट्टी की बनी मूर्ति को अपने घर लाएं। बाद में इन्हें पानी में घोलकर गमले में रखकर पौधा लगाएं। सभी इस तरह से गणेश चतुर्थी मनाएं तथा अपने पर्यावरण को सुरक्षित रखें।
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