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स्वामी सच्चिदानंद की 47 वीं शहादत पर
Updated Thu, 05 Apr 2018 12:05 AM IST
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निर्भीक और इमानदार पत्रकार थे स्वामी सच्चिदानंद
बिजनौर। जनपद के पत्रकार और विनोवा भावे के अनुयायी स्वामी सच्चिदानंद की शहादत को आज 47 साल हो गए। आज के ही दिन कुछ बदमाशों द्वारा खारी के पास गोविंदपुर स्थित आश्रम में इनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। वे अंग्रेजी में पर्सनाल्टी नाम से साप्ताहिक अखबार निकालते थे।
भ्रष्टाचार के कई तत्कालीन मामले इनके कारण चर्चाओं में आए। उन्होंने एक बिजली इंस्पेक्टर को सरे आम रिश्वत लेते गिरफ्तार कराया। खारी की बुनकर सोसायटी के अध्यक्ष को गबन में जेल भिजवाया। इससे पहले विनावा जी के आश्रम वर्धा में उनके साथ रहते समय से स्वामी जी पत्रकारिता से जुड़ गए थे। लंबे समय तक वे विनोवा जी की पत्रिका ग्रामदान के संपादक भी रहे।
स्वामी जी बहुत तेज पत्रकार थे। वे सामाजिक व्यवस्था में बदलाव के लिए कार्यरत रहे। जनपद में फैले भ्रष्टाचार के विरुद्घ उन्होंने जमकर आवाज उठाई। पर्सनाल्टी अखबार आश्रम में साइक्लोस्टाइल मशीन पर छापते थे। टाइपराइटर पर मैटर टाइप करते। बाद में उसे साइक्लोस्टाइल करते। उनसे कार्यों और धमक से प्रभावित होकर पांच अप्रैल 71 की रात में उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई। उनके एक साथी की भी उनके साथ हत्या हुई थी।
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विनोवा के शिष्य थे सच्चिदानंद
स्वामी सच्चिदानंद मूलरूप से पंजाब के रहने वाले थे। 21 दिंसबर 1920 को मोगा के पास बुडडूवाल गांव में उनका जन्म हुआ। बचपन का नाम सत्यानंद था। दयानंद मथुरादास कॉलेज मोगा से इंटर करने के बाद गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर से बीए किया। स्वामी सत्यानंद जी के संपर्क में आए और आध्यात्म के पथ पर चल पड़े। मात्र 22 साल की उम्र में उन्होंने सन्यास ले लिया। गुरु और शिष्य का नाम एक था। गुरु ने दीक्षा के बाद उन्हें सच्चिदानंद नाम दिया। पहले गेरूए वस्त्र धारण किए। कुछ समय बाद श्वेत वस्त्र पहने। बाद में अर्ध नग्न रहने लगे। कमर पर घुटनों तक सफेद घोती, गले में सफेद चादर, नंगे पांव। आने जाने में साइकिल का प्रयोग करते।
गुरु के आदेश पर भूदान आंदोलन से जुडे़
गुरु से आज्ञा लेकर लेकर विनोवा जी के भूदान यज्ञ आंदोलन में जुड़ गए। लंबे समय तक उनकी ग्रामदान पत्रिका के संपादक रहे। केरल में कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार के दौरान इन्होंने सर्वोदय इन कम्युनिस्ट स्टेट नाम की पुस्तक लिखी। 55 से 59 तक विनोवा जी के साथ रहकर कुछ अलग करने के इरादे से पंजाब चले आए। चलने से पूर्व विनोवा जी ने इनसे वचन लिया जहां भी रहेंगे, दस साल तक एक ही स्थान पर रहकर कार्य करेंगे।
बहनोई के कहने पर आए थे बिजनौर
अपने बहनोई विपिन महर्षि के कहने पर 1960 में जनपद के खारी गांव में आ गए। आश्रम चलाने के लिए धर्मपुरा में इन्हें 50 बीघा जमीन मिल गई। यहां आश्रम शुरू किया। कुटिया बना ली। आश्रम तक सड़क बनाई गई। बच्चों की शिक्षा का काम शुरू किया गया। धीरे-धीर स्वामी जी की प्रसिद्धि दूर-दूर तक हो गई। हवा का रुख बदला तो उन्हें आश्रम छोड़ना पड़ा। स्वामी जी का इरादा रेलवे लाइन के किनारे झोपड़ी डालकर रहने का था। किंतु खारी के भगवत शरण आगे आए। स्वामी जी के साथी पंडित सोमदत्त पांडेय की पुस्तक ‘स्वामी जी के साथ’ के अनुसार पंडित भगवत शरण ने दस बीघे के बाग की रजिस्ट्री स्वामी जी के नाम कर दी। गांव के कालू सिंह ने भी एक बीघा जमीन दान दे दी। इस उजाड़ रेतीली भूमि में आश्रम बनाने का काम शुरू हुआ।
दलितों को मुख्य धारा से जोड़ा
स्वामी जी अन्याय और शोषण के विरुद्घ आवाज उठाने लगे। वे खारी की दलित बस्ती और गांव के रास्तों की सफाई करते। क्षेत्र के सबसे प्रसिद्ध झारखंडी मंदिर पर दलितों से उन्होंने जल चढ़वाया। खारी के एक जमींदार ने अपने भतीजे की 11 बीघा भूमि पर कब्जा कर रखा था। स्वामी जी खुद गए और भूमि पर हल चलाकर कब्जा हटवाया। धीरे-धीरे स्वामी जी के दुश्मनों की संख्या बढ़ती चली गई। पांच अप्रैल की रात में गोविंदपुर आश्रम में स्वामी जी और दक्षिण भारत के कार्यकर्ता गोविंद रेड्डी की गोली मारकर हत्या कर दी गई।
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बिजनौर। जनपद के पत्रकार और विनोवा भावे के अनुयायी स्वामी सच्चिदानंद की शहादत को आज 47 साल हो गए। आज के ही दिन कुछ बदमाशों द्वारा खारी के पास गोविंदपुर स्थित आश्रम में इनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। वे अंग्रेजी में पर्सनाल्टी नाम से साप्ताहिक अखबार निकालते थे।
भ्रष्टाचार के कई तत्कालीन मामले इनके कारण चर्चाओं में आए। उन्होंने एक बिजली इंस्पेक्टर को सरे आम रिश्वत लेते गिरफ्तार कराया। खारी की बुनकर सोसायटी के अध्यक्ष को गबन में जेल भिजवाया। इससे पहले विनावा जी के आश्रम वर्धा में उनके साथ रहते समय से स्वामी जी पत्रकारिता से जुड़ गए थे। लंबे समय तक वे विनोवा जी की पत्रिका ग्रामदान के संपादक भी रहे।
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स्वामी जी बहुत तेज पत्रकार थे। वे सामाजिक व्यवस्था में बदलाव के लिए कार्यरत रहे। जनपद में फैले भ्रष्टाचार के विरुद्घ उन्होंने जमकर आवाज उठाई। पर्सनाल्टी अखबार आश्रम में साइक्लोस्टाइल मशीन पर छापते थे। टाइपराइटर पर मैटर टाइप करते। बाद में उसे साइक्लोस्टाइल करते। उनसे कार्यों और धमक से प्रभावित होकर पांच अप्रैल 71 की रात में उनकी गोली मारकर हत्या कर दी गई। उनके एक साथी की भी उनके साथ हत्या हुई थी।
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विनोवा के शिष्य थे सच्चिदानंद
स्वामी सच्चिदानंद मूलरूप से पंजाब के रहने वाले थे। 21 दिंसबर 1920 को मोगा के पास बुडडूवाल गांव में उनका जन्म हुआ। बचपन का नाम सत्यानंद था। दयानंद मथुरादास कॉलेज मोगा से इंटर करने के बाद गवर्नमेंट कॉलेज लाहौर से बीए किया। स्वामी सत्यानंद जी के संपर्क में आए और आध्यात्म के पथ पर चल पड़े। मात्र 22 साल की उम्र में उन्होंने सन्यास ले लिया। गुरु और शिष्य का नाम एक था। गुरु ने दीक्षा के बाद उन्हें सच्चिदानंद नाम दिया। पहले गेरूए वस्त्र धारण किए। कुछ समय बाद श्वेत वस्त्र पहने। बाद में अर्ध नग्न रहने लगे। कमर पर घुटनों तक सफेद घोती, गले में सफेद चादर, नंगे पांव। आने जाने में साइकिल का प्रयोग करते।
गुरु के आदेश पर भूदान आंदोलन से जुडे़
गुरु से आज्ञा लेकर लेकर विनोवा जी के भूदान यज्ञ आंदोलन में जुड़ गए। लंबे समय तक उनकी ग्रामदान पत्रिका के संपादक रहे। केरल में कम्युनिस्ट पार्टी की सरकार के दौरान इन्होंने सर्वोदय इन कम्युनिस्ट स्टेट नाम की पुस्तक लिखी। 55 से 59 तक विनोवा जी के साथ रहकर कुछ अलग करने के इरादे से पंजाब चले आए। चलने से पूर्व विनोवा जी ने इनसे वचन लिया जहां भी रहेंगे, दस साल तक एक ही स्थान पर रहकर कार्य करेंगे।
बहनोई के कहने पर आए थे बिजनौर
अपने बहनोई विपिन महर्षि के कहने पर 1960 में जनपद के खारी गांव में आ गए। आश्रम चलाने के लिए धर्मपुरा में इन्हें 50 बीघा जमीन मिल गई। यहां आश्रम शुरू किया। कुटिया बना ली। आश्रम तक सड़क बनाई गई। बच्चों की शिक्षा का काम शुरू किया गया। धीरे-धीर स्वामी जी की प्रसिद्धि दूर-दूर तक हो गई। हवा का रुख बदला तो उन्हें आश्रम छोड़ना पड़ा। स्वामी जी का इरादा रेलवे लाइन के किनारे झोपड़ी डालकर रहने का था। किंतु खारी के भगवत शरण आगे आए। स्वामी जी के साथी पंडित सोमदत्त पांडेय की पुस्तक ‘स्वामी जी के साथ’ के अनुसार पंडित भगवत शरण ने दस बीघे के बाग की रजिस्ट्री स्वामी जी के नाम कर दी। गांव के कालू सिंह ने भी एक बीघा जमीन दान दे दी। इस उजाड़ रेतीली भूमि में आश्रम बनाने का काम शुरू हुआ।
दलितों को मुख्य धारा से जोड़ा
स्वामी जी अन्याय और शोषण के विरुद्घ आवाज उठाने लगे। वे खारी की दलित बस्ती और गांव के रास्तों की सफाई करते। क्षेत्र के सबसे प्रसिद्ध झारखंडी मंदिर पर दलितों से उन्होंने जल चढ़वाया। खारी के एक जमींदार ने अपने भतीजे की 11 बीघा भूमि पर कब्जा कर रखा था। स्वामी जी खुद गए और भूमि पर हल चलाकर कब्जा हटवाया। धीरे-धीरे स्वामी जी के दुश्मनों की संख्या बढ़ती चली गई। पांच अप्रैल की रात में गोविंदपुर आश्रम में स्वामी जी और दक्षिण भारत के कार्यकर्ता गोविंद रेड्डी की गोली मारकर हत्या कर दी गई।