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गंगा की सफाई में लगेंगे 103 कछुए
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बिजनौर: हस्तिनापुर सेंचुरी में धूप सेकते कछुए।
- फोटो : BIJNOR
गंगा की सफाई में लगेंगे 103 कछुए
बिजनौर। वन विभाग की सक्रियता रंग लाई और 103 और कछुओं के बच्चों ने आंखें खोल ली हैं। इन कछुओं को अब जल्दी ही गंगा में छोड़ा जाएगा। कछुए गंगा में बहने वाली वनस्पति आदि को खाकर गंगा को साफ करेंगे।
कछुए को नदी का प्राकृतिक सफाई का जीव माना जाता है। नदियों में सड़ने वाली वनस्पति आदि चीजों को खाकर ये नदी की सफाई में सहयोग करते हैं। कछुओं की कुछ प्रजाति नदी में बहने वाले शवों को भी चट कर जाती हैं। गंगा नदी में पाए जाने वाले कछुए नदी के तट पर रेत में अंडे देते हैं। अंडों से बच्चे निकलने के बाद सीधे पानी की ओर भागते हैं।
गंगा हर साल किसानों की खेतों की जमीन काटकर बहा ले जाती है। बरसात के बाद पानी उतरने पर किसान जमीन पर खेती करते हैं। इससे खेतों में बने घोंसलों में रखे अंडे जुताई के समय नष्ट हो जाते हैं। कछुए के अंडों को बचाने के लिए डब्लूडब्लूएफ व वन विभाग ने हैचरी बनाई है। पिछले साल वन विभाग ने इस तरह अंडे एकत्र करके 50 से ज्यादा कछुओं के बच्चों को संरक्षित किया था। इस बार भी वन विभाग ने काफी अंडे बचाए थे। इन्हें हस्तिनापुर में बनी डब्लूडब्लूएफ की हैचरी में भेजा था। वहां पर अब तक अंडों से 103 बच्चे निकल चुके हैं। इन अंडों को अब जल्दी ही नदी में छोड़ा जाएगा। कछुए मांसाहारी, शाकाहारी व सर्वाहारी तीनों तरह के होते हैं।
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नमी, तापमान का रखते हैं ध्यान
कछुए नवंबर से अप्रैल तक बच्चों को जन्म देते हैं। मिट्टी में घोंसला बनाकर अंडे देते समय वे तापमान, नमी आदि का कुदरती तौर पर ध्यान रखते हैं। वे घोंसलों में अंडों की परत बनाते हैं। सबसे ऊपर की परत के अंडे सबसे पहले निकलते हैं। कछुआ अंडे देने के बाद घोंसले की ओर नहीं आता है। फिर भी बच्चे पैदा होते ही कुदरती तौर पर पानी की ओर अपने आप ही भागते हैं।
जल्दी छोड़ेंगे गंगा में
डीएफओ डा.एम सेम्मारन के मुताबिक 103 बच्चे अंडों से निकल चुके हैं। अब बच्चे थोड़े बड़े भी हो गए हैं। इन्हें जल्दी ही नदी में छोड़ा जाएगा।
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बिजनौर। वन विभाग की सक्रियता रंग लाई और 103 और कछुओं के बच्चों ने आंखें खोल ली हैं। इन कछुओं को अब जल्दी ही गंगा में छोड़ा जाएगा। कछुए गंगा में बहने वाली वनस्पति आदि को खाकर गंगा को साफ करेंगे।
कछुए को नदी का प्राकृतिक सफाई का जीव माना जाता है। नदियों में सड़ने वाली वनस्पति आदि चीजों को खाकर ये नदी की सफाई में सहयोग करते हैं। कछुओं की कुछ प्रजाति नदी में बहने वाले शवों को भी चट कर जाती हैं। गंगा नदी में पाए जाने वाले कछुए नदी के तट पर रेत में अंडे देते हैं। अंडों से बच्चे निकलने के बाद सीधे पानी की ओर भागते हैं।
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गंगा हर साल किसानों की खेतों की जमीन काटकर बहा ले जाती है। बरसात के बाद पानी उतरने पर किसान जमीन पर खेती करते हैं। इससे खेतों में बने घोंसलों में रखे अंडे जुताई के समय नष्ट हो जाते हैं। कछुए के अंडों को बचाने के लिए डब्लूडब्लूएफ व वन विभाग ने हैचरी बनाई है। पिछले साल वन विभाग ने इस तरह अंडे एकत्र करके 50 से ज्यादा कछुओं के बच्चों को संरक्षित किया था। इस बार भी वन विभाग ने काफी अंडे बचाए थे। इन्हें हस्तिनापुर में बनी डब्लूडब्लूएफ की हैचरी में भेजा था। वहां पर अब तक अंडों से 103 बच्चे निकल चुके हैं। इन अंडों को अब जल्दी ही नदी में छोड़ा जाएगा। कछुए मांसाहारी, शाकाहारी व सर्वाहारी तीनों तरह के होते हैं।
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नमी, तापमान का रखते हैं ध्यान
कछुए नवंबर से अप्रैल तक बच्चों को जन्म देते हैं। मिट्टी में घोंसला बनाकर अंडे देते समय वे तापमान, नमी आदि का कुदरती तौर पर ध्यान रखते हैं। वे घोंसलों में अंडों की परत बनाते हैं। सबसे ऊपर की परत के अंडे सबसे पहले निकलते हैं। कछुआ अंडे देने के बाद घोंसले की ओर नहीं आता है। फिर भी बच्चे पैदा होते ही कुदरती तौर पर पानी की ओर अपने आप ही भागते हैं।
जल्दी छोड़ेंगे गंगा में
डीएफओ डा.एम सेम्मारन के मुताबिक 103 बच्चे अंडों से निकल चुके हैं। अब बच्चे थोड़े बड़े भी हो गए हैं। इन्हें जल्दी ही नदी में छोड़ा जाएगा।