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कुछ तो मिल जाएगा तुमको भी अदब का जेवर

Mon, 16 Feb 2015 02:20 AM IST
ब्यूरो ज्ञानपुर अमर उजाला
ब्यूरो ज्ञानपुर अमर उजाला Updated Mon, 16 Feb 2015 02:20 AM IST
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You 'll find some of the literature ornament
 शायरों ने अपने कलाम से सामाज, देश के हालात, सौहार्द पर एक से बढ़कर एक कलाम पेश किए।
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शायर शमसाद करीमी ने पढ़ा- नापाक रिज्क खून में तब्दील हो गया। आंखों से आदमी के मोहब्बत चली गई। आसिम अशरी ने सुनाया- मेरा पैगाम सुना दो मैं अभी जिंदा हूं। हुक्मरानों को बता दो मैं अभी जिंदा हूं। सदारत कर रहे उस्ताद शायर मजनू भदोहवीं ने कहा- तआस्सुब की नुमाइश हो रही है। बड़ी खामोश साजिश हो रही है।
दानिश भदोहवी ने पढ़ा कि कुछ तो मिल जाएगा तुमको भी अदब का जेवर। तुमभी बैठा करो कुछ देर सुख अनवर की तरह। नौजवान शायर शाहबान करीमी के शेर- मैं टूटे हुए दिल की पुरदर्द कहानी हूं। शबनम न समझ मुझको आग का पानी हूं को भी सराहा गया।
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मुशीर इकबाल ने पढ़ा कि मैं अकेला चला चलता रहा, ना काफिला बना न मंजिल मिली। सैय्यद एखलाक ने पढ़ा- अपने लड़ने की जो आदत थी वो             अब तक न गई। गोरे कब के गए लंदन जरा ये तो देखो। संचालन मुशीर इकबाल ने किया। नशिस्त में नेहाल भदोहवी, फैज भदोहवी, आजाद बापू आदि ने भी कलाम पेश किए।
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