पड़ती जाती है तारीख पर तारीख
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दीवानी में कहावत है कि दादा मुकदमा दाखिल करता है और पोता फैसला लेता है। लेकिन, यह प्रवृत्ति अब फौजदारी में भी हावी होने लगी है। कानून के जानकारों के मुताबिक आम आदमी को यह जानकर ताज्जुब होगा कि अपराधी का पोता भी बहुत दिन बाद जान पाता है कि उसके दादा को किसी अपराध की सजा मिली है। जानकार बताते हैं कि मुकदमों के विलंबित होने के पीछे बड़ी वजह यह है कि न्यायिक प्रक्रिया का जितना उपयोग आम आदमी को न्याय दिलाने के लिए होता है, उससे कहीं ज्यादा उपयोग एक खास आदमी न्याय के दंड से बचने के लिए कर लेता है।
तीन मौकों पर देनी पड़ती है दरख्वास्त
एक न्यायिक अधिकारी के मुताबिक केवल फौजदारी मुकदमों की बात की जाए तो एक मुकदमे के विचारण के दौरान किसी भी अपराधी को तीन अवसर पर मुक्त कर देने के लिए दरख्वास्त देनी पड़ती है। इन अवसरों पर कोई भी एक पक्ष अगर ऊपरी अदालत का दरवाजा खटखटाता है तो निचली अदालत की कार्यवाही रोक दी जाती है। इसके चलते भी मामले लंबित होते जाते हैं।