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चार वर्ष में सात करोड़ हजम,गोशालाओं में चारा-पानी को तरस रहे बेजुबान
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जिले के छह ब्लाकों औराई, भदोही, डीघ, अभोली, सुरियावां और ज्ञानपुर के अंतर्गत संचालित 22 अस्थाई और एक स्थाई गोशालाओं की हालत वर्तमान समय में बहुत बदहाल है। आलम यह है कि इन गोशालाओं में संरक्षण लेने वाले लगभग 3300 बेजुबानों के नाम पर चार वर्ष में सात करोड़ रुपये हजम किया जा चुका है। जबकि वहीं दूसरी ओर गोशालाओं में रह रहे पशुओं को अब चारा-पानी और रखरखाव का संकट झेलना पड़ रहा है।
इस संबंध में उच्चाधिकारियों के नेतृत्व में गठित संरक्षण समिति के हाथ खींच लेने से गांव की सरकार भी गोशाला में हो रहे भ्रष्टाचार को रोकने में नाकाम साबित हो रही हैं। लोगों ने सवाल उठाया है कि प्रदेश सरकार ने खेत-खलिहान, सड़क, गली-मोहल्लों में छुट्टा घूमने वाले बेजुबानों को संरक्षण देने के लिए चार वर्ष पहले योजना तैयार कर धन की कमी न होने का वादा किया था। लेकिन मामला सीधे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से जुड़ा होने के कारण प्रदेश के सभी जिलों में अस्थाई, स्थाई गोशाला निर्माण ने जोर पकड़ा। जैसे-जैसे गोशाला बनकर तैयार हुए वैसे-वैसे पशुपालन विभाग प्रति पशु संरक्षण के लिए 30 रुपये की दर से संबंधित ब्लॉक के खातों में धनराशि उपलब्ध कराया जाता रहा। गोशालाओं की अपेक्षा नगरीय और ग्रामीण क्षेत्रों में विचरण करने वाले छुट्टा पशुओं की संख्या बढ़ने का मामला शासन तक पहुंचने पर मंडलीय अधिकारियों ने संरक्षण दिलाने के लिए एड़ीचोटी का प्रयास किया। बावजूद इसके संरक्षण का वह लक्ष्य हासिल नहीं कराया जा सका जो सरकार चाहती है।
दरअसल 2015 से 20 तक कार्यरत रही गांव की सरकार खुले हाथ से फर्जीवाड़ा कर भूसा के नाम पर पुआल की कुट्टी, हैंडपंप, सबमर्सिबल पंप के स्थान पर नहर, तालाब के गंदे पानी पिलाने, साफ-सफाई में अनदेखी करने से लगभग दो सौ संरक्षण लेने पशु तरह-तरह की बीमारियों की चपेट में आकर दम तोड़ते गए और धनराशि का भुगतान होता रहा । 2021 में गांव की नई सरकार का गठन होने के दो माह बाद भी गोशालाओं की 60 फीसद जिम्मेदारी मनरेगा के तहत प्रचलन में आने का इंतजार कर रही है। जब तब गांव की सरकार पूर्ण अधिकार पाकर खाते का संचालन नहीं करेगी तब तक स्थिति में सुधार होना असंभव ही बना रहेगा।
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मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी डा.जय सिंह ने बताया कि विभागीय टीम गोशालाओं की निगरानी में लगी है। अस्वस्थ होने वाले पशुओं को तत्काल इलाज की सुविधा दी जा रही है। रखरखाव की जिम्मेदारी ब्लॉक और ग्रामसभा स्तर से होने के कारण कुछ गोशालाओं की उपेक्षा का मामला संज्ञान में आया है जहां पहुंच कर वह निरीक्षण के दौरान मिलने वाली कमियों को पूरा करा रहे हैं।
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इस संबंध में उच्चाधिकारियों के नेतृत्व में गठित संरक्षण समिति के हाथ खींच लेने से गांव की सरकार भी गोशाला में हो रहे भ्रष्टाचार को रोकने में नाकाम साबित हो रही हैं। लोगों ने सवाल उठाया है कि प्रदेश सरकार ने खेत-खलिहान, सड़क, गली-मोहल्लों में छुट्टा घूमने वाले बेजुबानों को संरक्षण देने के लिए चार वर्ष पहले योजना तैयार कर धन की कमी न होने का वादा किया था। लेकिन मामला सीधे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से जुड़ा होने के कारण प्रदेश के सभी जिलों में अस्थाई, स्थाई गोशाला निर्माण ने जोर पकड़ा। जैसे-जैसे गोशाला बनकर तैयार हुए वैसे-वैसे पशुपालन विभाग प्रति पशु संरक्षण के लिए 30 रुपये की दर से संबंधित ब्लॉक के खातों में धनराशि उपलब्ध कराया जाता रहा। गोशालाओं की अपेक्षा नगरीय और ग्रामीण क्षेत्रों में विचरण करने वाले छुट्टा पशुओं की संख्या बढ़ने का मामला शासन तक पहुंचने पर मंडलीय अधिकारियों ने संरक्षण दिलाने के लिए एड़ीचोटी का प्रयास किया। बावजूद इसके संरक्षण का वह लक्ष्य हासिल नहीं कराया जा सका जो सरकार चाहती है।
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दरअसल 2015 से 20 तक कार्यरत रही गांव की सरकार खुले हाथ से फर्जीवाड़ा कर भूसा के नाम पर पुआल की कुट्टी, हैंडपंप, सबमर्सिबल पंप के स्थान पर नहर, तालाब के गंदे पानी पिलाने, साफ-सफाई में अनदेखी करने से लगभग दो सौ संरक्षण लेने पशु तरह-तरह की बीमारियों की चपेट में आकर दम तोड़ते गए और धनराशि का भुगतान होता रहा । 2021 में गांव की नई सरकार का गठन होने के दो माह बाद भी गोशालाओं की 60 फीसद जिम्मेदारी मनरेगा के तहत प्रचलन में आने का इंतजार कर रही है। जब तब गांव की सरकार पूर्ण अधिकार पाकर खाते का संचालन नहीं करेगी तब तक स्थिति में सुधार होना असंभव ही बना रहेगा।
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मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी डा.जय सिंह ने बताया कि विभागीय टीम गोशालाओं की निगरानी में लगी है। अस्वस्थ होने वाले पशुओं को तत्काल इलाज की सुविधा दी जा रही है। रखरखाव की जिम्मेदारी ब्लॉक और ग्रामसभा स्तर से होने के कारण कुछ गोशालाओं की उपेक्षा का मामला संज्ञान में आया है जहां पहुंच कर वह निरीक्षण के दौरान मिलने वाली कमियों को पूरा करा रहे हैं।