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मौत का मंजर देख कांप उठा कलेजा
ब्यूरो, भदोही, अमर उजाला
Updated Sat, 02 May 2015 01:22 AM IST
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जिंदगी में पहली बार मौत का मंजर इतनी करीब से देखा था। धरती डोल रही थी और मकान एवं दीवारें जमीदोज हो रही थी। लोगों के चिल्लाने की आवाज आ रही थी। जिसको देखो अपनी जान बचाकर भागने की कोशिश कर रहा था। उन लोगों ने भी कंपनी से बाहर निकलकर अपनी जान बचाई।
यह बातें नेपाल में आए भूकंप के दौरान एक कालीन कंपनी में कार्य करने वाले भदोही जनपद के खमरिया निवासी कुछ लोगों ने घर वापसी पर शुक्रवार को बातचीत में बतलाई।
खमरिया के वार्ड नंबर 14 निवासी रमजान, रमेश, बनारसी, सुरेश ने बताया कि वे नेपाल के काठमांडू से कुछ दूरी पर स्थित एक कालीन कंपनी में मजदूरी का कार्य करते हैं। वहां आए भूकंप के दौरान मची त्रासदी कलेजा दहला देने वाला था। ऐसा मंजर जिंदगी में कभी नहीं देखा। सुबह जब वे लोग कंपनी में काम कर रहे थे तभी जोर से धरती डोलने लगी। वे सभी जान बचाकर कंपनी से बाहर आ गए। धरती एक बार नहीं, दर्जनों बार डोली।
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कंपनी के बाहर ही उन लोगों ने टेंट लगाकर तीन रातें गुजारीं। कंपनी के ठेकेदार से घर जाने की बात कहते थे वे मना कर देता था। तीन दिनों बाद ठेकेदार ने कुछ पैसे देकर इस शर्त पर जाने की इजाजत दी कि वे स्थिति सामान्य होने के बाद दोबारा यहां आएंगे।
तीन दिनों तक बिस्कुट और चाय पीकर किसी तरह दिन काटा। खाना बनाने की हिम्मत नहीं करता था। तीन दिनों के बाद ठेकेदार की इजाजत के बाद वे सड़क मार्ग से गोरखपुर पहुंचे तथा वहां राहत कैंप से रसीद लेकर रेल मार्ग से वाराणसी और फिर अपने घर खमरियां पहुंचे। उन्होंने बताया कि नेपाल में त्रासदी के बाद स्थिति काफी भयावह हो गई है। अभी भी न जाने कितनी लाशें मलबों में दबी हुई हैं। भूकंप का मंजर देखने के बाद अब दोबारा वहां जाने की हिम्मत नहीं है।
यह बातें नेपाल में आए भूकंप के दौरान एक कालीन कंपनी में कार्य करने वाले भदोही जनपद के खमरिया निवासी कुछ लोगों ने घर वापसी पर शुक्रवार को बातचीत में बतलाई।
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खमरिया के वार्ड नंबर 14 निवासी रमजान, रमेश, बनारसी, सुरेश ने बताया कि वे नेपाल के काठमांडू से कुछ दूरी पर स्थित एक कालीन कंपनी में मजदूरी का कार्य करते हैं। वहां आए भूकंप के दौरान मची त्रासदी कलेजा दहला देने वाला था। ऐसा मंजर जिंदगी में कभी नहीं देखा। सुबह जब वे लोग कंपनी में काम कर रहे थे तभी जोर से धरती डोलने लगी। वे सभी जान बचाकर कंपनी से बाहर आ गए। धरती एक बार नहीं, दर्जनों बार डोली।
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कंपनी के बाहर ही उन लोगों ने टेंट लगाकर तीन रातें गुजारीं। कंपनी के ठेकेदार से घर जाने की बात कहते थे वे मना कर देता था। तीन दिनों बाद ठेकेदार ने कुछ पैसे देकर इस शर्त पर जाने की इजाजत दी कि वे स्थिति सामान्य होने के बाद दोबारा यहां आएंगे।
तीन दिनों तक बिस्कुट और चाय पीकर किसी तरह दिन काटा। खाना बनाने की हिम्मत नहीं करता था। तीन दिनों के बाद ठेकेदार की इजाजत के बाद वे सड़क मार्ग से गोरखपुर पहुंचे तथा वहां राहत कैंप से रसीद लेकर रेल मार्ग से वाराणसी और फिर अपने घर खमरियां पहुंचे। उन्होंने बताया कि नेपाल में त्रासदी के बाद स्थिति काफी भयावह हो गई है। अभी भी न जाने कितनी लाशें मलबों में दबी हुई हैं। भूकंप का मंजर देखने के बाद अब दोबारा वहां जाने की हिम्मत नहीं है।