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...हे भगवान अब बस भी करो, कितना कहर ढाओगे!

Wed, 12 Oct 2022 12:30 AM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Wed, 12 Oct 2022 12:30 AM IST
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oh god, just do it now, how much havoc you will cause
अग्निकांड से गमजदा ढोल वादक राममूरत का परिवार। - फोटो : BHADOHI
दुर्गा पूजा पंडाल में लगी आग में सबसे अधिक कहर पुरुषोत्तमपुर, बारी गांव निवासी पूर्व प्रधान रमापति पर टूटा है। मंगलवार तक उनके परिवार के छह लोगों की जान चली गई। उन्होंने अब तक पत्नी, दो पौत्र, दो पौत्री और बहू को खो दिया है। रोज-रोज मिल रही अपनों के मौत की सूचना ने उन्हें काठ का पुतला बना दिया है। आंखों के आंसू भी अब सूख गए हैं। इनकी पीड़ा को देखकर हर कोई बस यहीं कर रहा...हे भगवान अब बस भी करों, कितना कहर ढाओगे। यह हादसा रमापति के लिए किसी बुरे स्वप्न जैसा हो चुका है। घर में एक के बाद एक मौत से पूरा परिवार सदमे में है। मंगलवार को पौत्री शिवांगी की मौत की खबर सुनते ही परिजनों का रो-रोकर बुरा हाल है।
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परिवार में अब तक हुई मौतें
हादसे में रमापति के घर के आठ सदस्य गंभीर रूप से झुलस गए थे। पहले ही दिन पत्नी एवं पूर्व प्रधान जया देवी की मौत हो गई। उसके बाद पौत्र सुजल पुत्र स्व. अवधेश, नवीन पुत्र उमेश, बहू सीमा पत्नी स्व. अवधेश, प्रियल पुत्री स्व. अवधेश और अब शिवांगी पुत्री उमेश की मौत हो गई। परिवार के दो सदस्य अब भी अस्पताल में जिंदगी और मौत से जूझ रहे हैं।
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रमापति को नहीं दी गई शिवांगी के मौत की जानकारी
इस हादसे ने 70 वर्ष के रमापति को इतने झटके दिए हैं कि शायद अब वे इससे ज्यादा बर्दाश्त न कर सकें। मंगलवार को बीएचयू में इलाज के दौरान दम तोड़ने वाली शिवांगी की मौत की सूचना शाम तक रमापति को नहीं दी गई। घर के सभी सदस्य अस्पताल में मरीजों के साथ हैं। घर पर वे अकेले हैं। रिश्तेदारी की एक-दो महिलाएं जरूर घर पर हैं, लेकिन उनके साथ बैठ कर बात करने वाला कोई नहीं है। परिजन एक का अंतिम संस्कार करके आ रहे, तभी दूसरे के मौत की सूचना मिल रही है। ऐसे में वृद्धावस्था में रमापति के साथ कुछ बुरा न हो जाए, यहीं सोच कर शाम तक लोगों ने शिवांगी के नहीं रहने की सूचना उनको नहीं दी।
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बाउ जी रहे तो खूब ढोल बजावैं और गावैं.....
औराई/घोसिया (भदोही)। दो कच्ची झोपड़ी..एक में गृहस्थी का थोड़ा सा सामान दूसरे में खाना बनाने के लिए बना मिट्टी का चूल्हा...देखने में साफ प्रतीत हो रहा था कि घर में कई दिनों से ठीक से चूल्हा नहीं जला है। एक तरफ चारपाई पर राममूरत के बड़े बेटे अखिलेश बैठे हुए थे। पास में उनकी मां चिरौंगी देेवी भी थीं, जिन्हें वे पिता जी की मौत के बाद तसल्ली दे रहे थे। पास में ही छोटा भाई मिथिलेश और परिवार के अन्य सदस्य खड़े थे।
अमर उजाला की टीम जब उनके घर पहुंची तो एक गजब की उदासी छाई हुई थी। बड़ा बेटा कहता है कि बाबू जी रहलन त हमेशा घरे में भजन गूंजत रहे। उ ढोल बजावे और गावैं....उनकर पूरा जिनगी ही ऐही में बीत गयल...समाजसेवा और भगवान क भजन, ऐही उनकर दिनचर्चा रहल...विधि क विधान देखीं कि आखिर में उ ढोल बजावत ही गुजर गइलन।
ये बातें सुनते ही गुमसुम पड़ी उनकी मां के आंखों में आंसू आ गए और बोल पड़ीं, का करबा बेटवा...। विडंबना यह है जिस व्यक्ति ने पूरी जिंदगी समाज के बीच बिता दिया, उसके बड़े बेटे को तो किसी तरह आवास का लाभ मिल गया, लेकिन छोटा बेटा अभी खंडहरनुमा झोपड़ी में रहने को विवश है और उसके परिवार का राशन कार्ड भी नहीं बन पाया है।
बेटे को बचा लिया पर पत्नी को न बचा पाने का मलाल
पूजा पंडाल अग्निकांड ने कई परिवारों को उजाड़ दिया है। इनमें सुरेश विश्वकर्मा भी हैं। हादसे ने उनकी पत्नी लील ली। उस रात को याद कर सुरेश सिसक उठते हैं। कहते हैँ कि जब आग लगी तो चारों तरफ अफरा-तफरी मच गयी। अचानक पूरा पंडाल आग का गोला बन गया। हमारे साथ 14 साल का बेटा अजीत भी था। मैंने किसी तरह बेटे को पंडाल के बगल में स्थित तालाब के पास फेंक दिया और तेजी से पत्नी मंजू (40) को बचाने के लिए दौड़ा। भगदड़ के बीच काफी प्रयास किया, लेकिन मेरी पत्नी नहीं दिखी, आखिर में तेज होती आग की आंच से मैं पीछे हट गया। आग ठंडी हुई तो पत्नी बुरी तरह झुलस मिली और अस्पताल में उसने दम तोड़ दिया।
आपदा की घड़ी में ग्राम प्रधानों ने संभाला मोर्चा
औराई। पंडाल अग्निकांड में झुलसे लोग अस्पतालों में जिंदगी और मौत की जंग लड़ रहे हैं। अस्पतालों में भर्ती मरीज और उनके तीमारदारों को जिला प्रशासन हरसंभव मदद कर रहा है। दूसरी तरफ स्थानीय ग्राम प्रधान भी मरीजों और उनके तीमारदारों के लिए मसीहा बनकर सामने आए हैं।
नथुआ, उपरौठ और औराई के ग्राम प्रधान रामसहाय जायसवाल, रामधनी सरोज और सुभाष कन्नौजिया 24 घंटे सूर्या ट्रामा सेंटर में भर्ती मरीजों और उनके तीमारदारों की देखभाल कर रहे हैं। इस हॉस्पिटल में 16 मरीज भर्ती है। इसके साथ ही उनके परिजन भी रह रहे हैं। ग्राम प्रधान इनके लिए न सिर्फ चाय-नाश्ते का प्रबंध कर रहे हैं, बल्कि सुबह-शाम उनकी भोजन की भी व्यवस्था कर रहे हैं। यह सारे कार्य प्रधान अपने निजी खर्चे से कर रहे हैं।

अमर उजाला के साथ बातचीत में प्रधानों का कहना है कि यह कठिन परीक्षा का दौर है। ऐसे में हम सभी को एक साथ मिलकर इसका मुकाबला करना है। हादसे ने हमारे अपनों को छीना है। हमारे गांव के बच्चे और बड़े इस समय जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे हैं। इसलिए हमारा भी कर्तव्य बनता है कि हम उनके लिए कुछ कर सकें।
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