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जिला चिकित्सालय में कूड़ा-कचरा से बनेगी खाद
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ज्ञानपुर। महाराजा चेतसिंह जिला चिकित्सालय से प्रतिदिन निकले वाला कूड़ा-कचरा से वर्मी कंपोस्ट खाद तैयार किया जाएगा। जिसका उपयोग चिकित्सालय की फुलवारी में किया जाएगा। चिकित्सालय में इसे लेकर तैयारियां शुरू कर दी गई है।
महाराजा चेतसिंह जिला चिकित्सालय में प्रतिदिन हजारों की संख्या में मरीज व तीमारदार आते हैं। जिनके माध्यम से तमाम वेस्टेज सामान निकलता है। चिकित्सालय से हर रोज काफी कूड़े-कचरा निकलता है। जिसका उपयोग खाद बनाने के लिए किया जाएगा। इससे बनने वाले वर्मी कंपोस्ट खाद का उपयोग अस्पताल के फुलवारी में किया जाएगा। इसके लिए चार फीट चौड़ा आठ फीट गहरा गड्डा बनाया गया। जिसमें एक में कचरा के साथ केंचुए रखे जाएंगे। जिससे वर्मी कपोस्ट खाद तैयार होगी। सीएमएस डॉ. राजेंद्र कुमार ने बताया कि जिला चिकित्सालय में वर्मी कंपोस्ट से खाद बनाने की तैयारी पूरी कर ली गई है, इसे जल्द ही शुरू कर दिया जाएगा।
अस्पताल में हर रोज चार से पांच किलो कचरा के साथ ही परिसर के अंदर लगे पेड़-पौधों की सूखी पत्तियां होती है। इन्हें एकत्रित कर गढ्ढे में डाला जायेगा। इसके बाद केंचुओं को भी उस गढ्ढे में डाला जाएगा। इस गड्ढे को उथला रखा जाता है, ताकि केंचुओं को बनने वाली ऊष्मा से बचाया जा सके अन्यथा वे मर सकते हैं। उनके द्वारा अपशिष्ट पदार्थ को तीव्रता से बाहर छोड़ने के लिए सामान्य तापक्रम लगभग 30 डिग्री सेंटीग्रेड के आसपास रखा जाता है। इस प्रक्रिया से उत्पन्न उत्पाद को वर्मी कंपोस्ट कहा जाता है, जो केंचुओं द्वारा खाए गए जैविक पदार्थों के अपशिष्ट से बनता है।
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महाराजा चेतसिंह जिला चिकित्सालय में प्रतिदिन हजारों की संख्या में मरीज व तीमारदार आते हैं। जिनके माध्यम से तमाम वेस्टेज सामान निकलता है। चिकित्सालय से हर रोज काफी कूड़े-कचरा निकलता है। जिसका उपयोग खाद बनाने के लिए किया जाएगा। इससे बनने वाले वर्मी कंपोस्ट खाद का उपयोग अस्पताल के फुलवारी में किया जाएगा। इसके लिए चार फीट चौड़ा आठ फीट गहरा गड्डा बनाया गया। जिसमें एक में कचरा के साथ केंचुए रखे जाएंगे। जिससे वर्मी कपोस्ट खाद तैयार होगी। सीएमएस डॉ. राजेंद्र कुमार ने बताया कि जिला चिकित्सालय में वर्मी कंपोस्ट से खाद बनाने की तैयारी पूरी कर ली गई है, इसे जल्द ही शुरू कर दिया जाएगा।
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अस्पताल में हर रोज चार से पांच किलो कचरा के साथ ही परिसर के अंदर लगे पेड़-पौधों की सूखी पत्तियां होती है। इन्हें एकत्रित कर गढ्ढे में डाला जायेगा। इसके बाद केंचुओं को भी उस गढ्ढे में डाला जाएगा। इस गड्ढे को उथला रखा जाता है, ताकि केंचुओं को बनने वाली ऊष्मा से बचाया जा सके अन्यथा वे मर सकते हैं। उनके द्वारा अपशिष्ट पदार्थ को तीव्रता से बाहर छोड़ने के लिए सामान्य तापक्रम लगभग 30 डिग्री सेंटीग्रेड के आसपास रखा जाता है। इस प्रक्रिया से उत्पन्न उत्पाद को वर्मी कंपोस्ट कहा जाता है, जो केंचुओं द्वारा खाए गए जैविक पदार्थों के अपशिष्ट से बनता है।
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