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प्राकृतिक संसाधनों के दोहन ने बिगाड़ी धरती की सूरत
ब्यूरो/ अमर उजाला ,भदोही
Updated Sat, 23 Apr 2016 01:51 AM IST
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धरती की सुंदरता बढ़ाने के लिए भले ही सरकार तमाम प्रयास करे, लेकिन प्राकृतिक संसाधनों के दोहन और प्रदूषण ने हकीकत को तल्ख कर दिया है। सरकारी आंकड़े इसके गवाह बन रहे हैं। हरियाली बढ़ाने के लिए 10 साल में भले ही वन विभाग ने छह लाख पौधे लगाए, लेकिन संरक्षण न होने से 10 फीसदी पौधे भी नहीं बचे। प्राकृतिक संसाधनों के दोहन से धरती की सूरत दिन ब दिन बिगड़ती जा रही है। वाटर रिचार्जिंग और जल संरक्षण के समुचित इंतजाम के अभाव में भू-जल स्तर जहां तेजी से पाताल की ओर भाग रहा है, वहीं प्रदूषण ने जनजीवन बेपटरी कर दिया है।
आधुनिकता के बढ़ते दायरे में लोग अपने निजी स्वार्थ के आगे पृथ्वी के संरक्षण पर ध्यान नहीं दे रहे हैं। सरकार पौधरोपण, जल संरक्षण के माध्यम से पर्यावरण को संरक्षित कर स्थिति सुधारने का प्रयास कर रही है, लेकिन प्रशासनिक उपेक्षा के चलते उस पर खास अमल नहीं हो पा रहा है। लगातार बढ़ रही जनसंख्या से खेती की जमीन भी कम हो रही है। हालांकि विभाग खेती का दायरा बढ़ने का दावा कर रहा है। विभाग के मुताबिक पांच साल पहले जिले में 35 हजार हेक्टेयर रकबे में खेती होती थी, जो अब बढ़कर 48 हजार हेक्टेयर हो गई है। विभाग के मुताबिक ऊसर भूमि को सुधारकर उसमें खेती की गई। आधुनिकता के चलते कुछ मवेशी भी कम हो गए।
कभी हर घर की शान कहे जाने वाले बैल अब नाममात्र के ही बचे हैं, लेकिन दुधारू मवेशियों की संख्या लगातार बढ़ी है। पशुपालन विभाग के आंकड़ों पर गौर करें तो 2007 की पशुगणना में दो लाख नौ हजार 286 पशुधन रहे, जो 2012 की गणना में तीन लाख 54 हजार हो गए। मिल्की गांव के बुजुर्ग भोलानाथ उपाध्याय ने कहा कि चारागाह का क्षेत्र कम होने से मवेशियों की संख्या कम हुई है। हालांकि सरकारी योजनाओं के माध्यम से गिनती के लोग बड़ी तादाद में मवेशी पालन कर रहे हैं। लेकिन, सभी के पास मवेशी अब नहीं रहे। पर्यावरण को हराभरा बनाने के लिए वन विभाग की ओर से हर साल हजारों पौधे लगाए जा रहे हैं, लेकिन संरक्षण न होने से 90 फीसदी पौधे सूख जा रहे हैं। विभागीय आंकड़ों पर गौर किया जाए तो 10 साल में करीब छह लाख पौधे रोपे गए। वृक्षों का दायरा कम होने के पीछे वन माफियाओं की ओर से अंधाधुंध पेड़ों की कटाई के साथ सड़कों के निर्माण के दौरान वृक्षों के काटने को भी वजह माना जा रहा है। 10 साल में जिस ढंग से पौधरोपण हुआ उसके अनुसार जिले के करीब 50 फीसदी हिस्से में वन क्षेत्र होना चाहिए, लेकिन हकीकत के इसके अलग है। डीएफओ मनीष सिंह ने कहा कि कुछ लोग निजी स्वार्थ में पेड़ काट रहे हैं। इससे प्राकृतिक सौंदर्य का क्षरण हो रहा है। इससे बचने की जरूरत है।
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आधुनिकता के बढ़ते दायरे में लोग अपने निजी स्वार्थ के आगे पृथ्वी के संरक्षण पर ध्यान नहीं दे रहे हैं। सरकार पौधरोपण, जल संरक्षण के माध्यम से पर्यावरण को संरक्षित कर स्थिति सुधारने का प्रयास कर रही है, लेकिन प्रशासनिक उपेक्षा के चलते उस पर खास अमल नहीं हो पा रहा है। लगातार बढ़ रही जनसंख्या से खेती की जमीन भी कम हो रही है। हालांकि विभाग खेती का दायरा बढ़ने का दावा कर रहा है। विभाग के मुताबिक पांच साल पहले जिले में 35 हजार हेक्टेयर रकबे में खेती होती थी, जो अब बढ़कर 48 हजार हेक्टेयर हो गई है। विभाग के मुताबिक ऊसर भूमि को सुधारकर उसमें खेती की गई। आधुनिकता के चलते कुछ मवेशी भी कम हो गए।
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कभी हर घर की शान कहे जाने वाले बैल अब नाममात्र के ही बचे हैं, लेकिन दुधारू मवेशियों की संख्या लगातार बढ़ी है। पशुपालन विभाग के आंकड़ों पर गौर करें तो 2007 की पशुगणना में दो लाख नौ हजार 286 पशुधन रहे, जो 2012 की गणना में तीन लाख 54 हजार हो गए। मिल्की गांव के बुजुर्ग भोलानाथ उपाध्याय ने कहा कि चारागाह का क्षेत्र कम होने से मवेशियों की संख्या कम हुई है। हालांकि सरकारी योजनाओं के माध्यम से गिनती के लोग बड़ी तादाद में मवेशी पालन कर रहे हैं। लेकिन, सभी के पास मवेशी अब नहीं रहे। पर्यावरण को हराभरा बनाने के लिए वन विभाग की ओर से हर साल हजारों पौधे लगाए जा रहे हैं, लेकिन संरक्षण न होने से 90 फीसदी पौधे सूख जा रहे हैं। विभागीय आंकड़ों पर गौर किया जाए तो 10 साल में करीब छह लाख पौधे रोपे गए। वृक्षों का दायरा कम होने के पीछे वन माफियाओं की ओर से अंधाधुंध पेड़ों की कटाई के साथ सड़कों के निर्माण के दौरान वृक्षों के काटने को भी वजह माना जा रहा है। 10 साल में जिस ढंग से पौधरोपण हुआ उसके अनुसार जिले के करीब 50 फीसदी हिस्से में वन क्षेत्र होना चाहिए, लेकिन हकीकत के इसके अलग है। डीएफओ मनीष सिंह ने कहा कि कुछ लोग निजी स्वार्थ में पेड़ काट रहे हैं। इससे प्राकृतिक सौंदर्य का क्षरण हो रहा है। इससे बचने की जरूरत है।
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