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दो दशक बाद भी सेज का सपना अधूरा

Tue, 22 Feb 2022 11:23 PM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Tue, 22 Feb 2022 11:23 PM IST
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do dashak baad bhee sej ka sapana adhoora
कालीन उद्योग के विकास को लेकर करोड़ों रुपये खर्च कर विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) का सपना 19 साल बाद भी पूरा नहीं हो सका है। किसानों की 208 एकड़ जमीन अधिग्रहीत करने के बाद भी सेज की परिकल्पना राजनीति की भेंट चढ़ गई। सेज की अधिकांश जमीन पर अब अतिक्रमण कर कब्जा कर लिया गया है। उधर, अधिग्रहण से प्रभावित 710 किसानों को अभी तक मुआवजा तक नहीं मिल सका है।
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भदोही में कालीन उद्योग के विकास के लिए वर्ष 2003 में वाराणसी-भदोही मार्ग पर स्थित कंधिया के पास स्पेशल इकोनामिक जोन स्थापित करने के लिए 208 हेक्टेयर भूमि अधिग्रहीत की गई थी। अधिग्रहण से कछुआ बोझ, कंधिया, जोल्हापुर, धनापुर आदि गांवों के 1800 से अधिक किसान प्रभावित हुए थे। इसमें से 1023 किसानों को 9 करोड़ 13 लाख 33 हजार 315 रुपये मुआवजा का भुगतान कर दिया गया था, जबकि 710 किसानों को मुआवजा के रूप में 7 करोड़ 31 लाख 19 हजार 933 रुपये का भुगतान 19 साल बाद भी नहीं हो सका है। सेज के निर्माण की जिम्मेदारी उत्तर प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास निगम लिमिटेड को सौंपी गई थी। आरोप है कि किसानों की बेशकीमती जमीन कौड़ी के दाम अधिगृहीत कर ली गई थी। अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू होने से लेकर अब तक किसानों ने हार नहीं मानी। उनकी लड़ाई चलती रही। करीब दो दशक गुजरने वाले हैं, लेकिन लोकसभा से लेकर विधानसभा चुनाव में भी जनप्रतिनिधियों की ओर से न तो सेज को लेकर कोई वादा किया जाता है और न ही जीत के बाद ही इसका नाम लिया जाता है। इससे कालीन कारोबार से जुड़े लोगों की उम्मीदें अब तक पूरी नहीं हो सकी हैं। वर्ष 2003 से सपा की दो बार, बसपा की एक बार और भाजपा की एक बार प्रदेश में सरकार बनी, लेकिन कालीन नगरी के इस महत्वपूर्ण कार्य की तरफ किसी ने ध्यान नहीं दिया। उधर, विशेष आर्थिक क्षेत्र के लिए अधिग्रहीत जमीन पर कब्जा हो गया है। इससे प्रशासन के लिए आने वाले समय में चुनौतियां और बढ़ेंगी। अगर भविष्य में सेज का मसला सुलझा तो फिर अधिग्रहीत जमीन को कब्जामुक्त करने के लिए शासन-प्रशासन को ऊर्जा व्यय करनी होगी।
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