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भदोही की रामलीला- सातवां दिन
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भदोही। नगर के मर्यादपट्टी स्थित रामलीला मैदान में रामलीला की 7वीं रात्रि में अयोध्या के कलाकारों ने समस्त मुनि मिलन, दशरथ मरण, भरत आगमन, भरत-राम संवाद समेत जयंत कुटिलता आदि की लीलाओं का मंचन किया। दशरथ मरण की लीला के समय श्रद्धालु भाव विह्वल हो उठे। लोगों की आंखें नम हो गईं। कलाकारों ने जीवंत कला का नमूना प्रस्तुत करते हुए रामलीला में जान फूंक दी।
निशा का शुभारंभ प्रभु राम के वन यात्रा के दौरान चित्रकूट आश्रम पर समस्त मुनि मिलन की लीला से हुआ। मुनियों ने प्रभु राम से वन आने का कारण पूछा तो प्रभु ने सारा किस्सा सुना दिया। तब मुनि ने कहा कि कैकेयी ने उचित ही किया है। इस पर प्रभु राम मुस्कुराए। इसके बाद निषाद राज के सहयोग से राजा भरत सेना के साथ चित्रकुट पहुंचे। सेना देख लक्ष्मण का क्रोधित होना। प्रभु राम द्वारा लक्ष्मण को समझाना और फिर भरत व राम संवाद श्रद्धालुओं को खूब पंसद आया। भरत जी चित्रकुट पहुंचते ही प्रभु राम के चरणों में दंडवत प्रणाम करते हैं और विलाप करते हुए आंखों से आंसू बहने लगते हैं।
राजा भरत प्रभु राम से अयोध्या वापस चलने का आग्रह करते हैं, लेकिन प्रभु राम ने कहा कि पिता के वचन को नहीं तोड़ सकते। तब भरत प्रभु राम की आज्ञा से उनका खड़ाऊं लेकर अयोध्या वापस हो जाते हैं। कलाकारों द्वारा प्रस्तुत जयंत की कुटिलता का प्रसंग भी दर्शकों को खूब भाया। एक दिन प्रभु राम सीताजी का शृंगार कर रहे थे, तभी इंद्र के पुत्र जयंत के मन में राम के भगवान न होने की शंका हुई और जयंत ने अपनी शंका दूर करने के लिए कौवे का रूप धारण कर सीता जी के पैर में खरोंच मार देता है। प्रभु राम उस पर अग्नि बाण छोड़ते हैं तब वह जान बचाकर भागकर ब्रह्मा जी, शंकर जी के पास पहुंचता है, लेकिन कोई सहायता नहीं करता। तब नारद जी के कहने पर जयंत प्रभु राम से आकर माफी मांगता है। प्रभु राम उसकी एक आंख फोड़ कर प्राण दान करते हैं।
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निशा का शुभारंभ प्रभु राम के वन यात्रा के दौरान चित्रकूट आश्रम पर समस्त मुनि मिलन की लीला से हुआ। मुनियों ने प्रभु राम से वन आने का कारण पूछा तो प्रभु ने सारा किस्सा सुना दिया। तब मुनि ने कहा कि कैकेयी ने उचित ही किया है। इस पर प्रभु राम मुस्कुराए। इसके बाद निषाद राज के सहयोग से राजा भरत सेना के साथ चित्रकुट पहुंचे। सेना देख लक्ष्मण का क्रोधित होना। प्रभु राम द्वारा लक्ष्मण को समझाना और फिर भरत व राम संवाद श्रद्धालुओं को खूब पंसद आया। भरत जी चित्रकुट पहुंचते ही प्रभु राम के चरणों में दंडवत प्रणाम करते हैं और विलाप करते हुए आंखों से आंसू बहने लगते हैं।
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राजा भरत प्रभु राम से अयोध्या वापस चलने का आग्रह करते हैं, लेकिन प्रभु राम ने कहा कि पिता के वचन को नहीं तोड़ सकते। तब भरत प्रभु राम की आज्ञा से उनका खड़ाऊं लेकर अयोध्या वापस हो जाते हैं। कलाकारों द्वारा प्रस्तुत जयंत की कुटिलता का प्रसंग भी दर्शकों को खूब भाया। एक दिन प्रभु राम सीताजी का शृंगार कर रहे थे, तभी इंद्र के पुत्र जयंत के मन में राम के भगवान न होने की शंका हुई और जयंत ने अपनी शंका दूर करने के लिए कौवे का रूप धारण कर सीता जी के पैर में खरोंच मार देता है। प्रभु राम उस पर अग्नि बाण छोड़ते हैं तब वह जान बचाकर भागकर ब्रह्मा जी, शंकर जी के पास पहुंचता है, लेकिन कोई सहायता नहीं करता। तब नारद जी के कहने पर जयंत प्रभु राम से आकर माफी मांगता है। प्रभु राम उसकी एक आंख फोड़ कर प्राण दान करते हैं।
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