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भदोहीः कोरोना के चक्कर में कुपोषण को भूले अफसर, देखभाल न होने से बढ़े डेढ़ हजार कुपोषित बच्चे
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ज्ञानपुर। कालीन नगरी में कोरोना संक्रमण के कारण कुपोषण के खिलाफ जंग कमजोर हुई है। संरक्षण और देखभाल न होने से डेढ़ हजार कुपोषित और अति कुपोषित बच्चे बढ़ गए, जबकि 1250 अति गंभीर कुपोषित बच्चे मिले। अफसरों के गोद लिए गांवों को सुपोषण बनाने की मुहिम भी कागजों तक सिमट कर रह गई है।
दरअसल बच्चों की मृत्युदर रोकने के लिए सरकार स्वास्थ्य और बाल विकास एवं पुष्टाहार विभाग की ओर से कई योजनाएं गर्भवती महिलाओं के लिए चला रही है, लेकिन बेहतर निगरानी नहीं हो पाने और भ्रष्टाचार के कारण योजनाएं धरातल पर नहीं उतर पाती हैं। विभाग की ओर से पौष्टिक आहार का वितरण संग प्रधानमंत्री मातृत्व योजना में गर्भवती महिलाओं को पैसा दिया जाता है। जिससे वह जरूरी सामान खरीदकर उसका सेवन कर सकें। हर तीन महीने में बच्चों का वजन कर उनके पोषण की स्थिति का आंकलन भी किया जाता है। सुपोषण मिशन के तहत दो साल पूर्व शासन के निर्देश पर सरकारी अफसरों ने एक-एक गांव गोद भी लिया। शुरूआत में अफसरों ने काफी सक्रियता दिखाई, जिससे गांवों में कुपोषित बच्चों की संख्या भी कम हुई, लेकिन कोरोना के कारण अभियान ठंडा पड़ गया। जिससे कुपोषित-अति कुपोषित बच्चों की संख्या भी बढ़ने लगी।
आंकड़ों पर गौर करें तो मई में कुपोषित बच्चों की संख्या 5728 रही तो जून में बढ़कर 6595 हो गई। अति कुपोषित बच्चे भी 2700 से बढ़कर 3034 हो गए। इसी तरह 853 अति गंभीर और 425 गंभीर समेत 1242 मैम और सैम बच्चे मिले। मैम और सैम ऐसे बच्चों को पोषण पुनर्वास केंद्र में भर्ती कराने का दावा किया जा रहा है, लेकिन केंद्रों पर बच्चों की संख्या कम ही रहती है। अधिकारियों का मानना है कि आंगनबाड़ी और एएनएम की उदासीनता से केंद्र पर बच्चे नहीं पहुंच पाते।
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गंभीर और अति गंभीर बच्चों को पोषण पुनर्वास केंद्र तक पहुंचाने के जिम्मेदारी आशा, एएनएम और आंगनबाड़ी सेविका, सहायिका पर है। कोरेाना के कारण आंगनबाड़ी केंद्र बंद रहने के कारण कुपोषित बच्चे नहीं पहुंच रहे हैं। अब धीरे-धीरे स्थिति सामान्य हो रही है। - भानु प्रताप सिंह, सीडीओ
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दरअसल बच्चों की मृत्युदर रोकने के लिए सरकार स्वास्थ्य और बाल विकास एवं पुष्टाहार विभाग की ओर से कई योजनाएं गर्भवती महिलाओं के लिए चला रही है, लेकिन बेहतर निगरानी नहीं हो पाने और भ्रष्टाचार के कारण योजनाएं धरातल पर नहीं उतर पाती हैं। विभाग की ओर से पौष्टिक आहार का वितरण संग प्रधानमंत्री मातृत्व योजना में गर्भवती महिलाओं को पैसा दिया जाता है। जिससे वह जरूरी सामान खरीदकर उसका सेवन कर सकें। हर तीन महीने में बच्चों का वजन कर उनके पोषण की स्थिति का आंकलन भी किया जाता है। सुपोषण मिशन के तहत दो साल पूर्व शासन के निर्देश पर सरकारी अफसरों ने एक-एक गांव गोद भी लिया। शुरूआत में अफसरों ने काफी सक्रियता दिखाई, जिससे गांवों में कुपोषित बच्चों की संख्या भी कम हुई, लेकिन कोरोना के कारण अभियान ठंडा पड़ गया। जिससे कुपोषित-अति कुपोषित बच्चों की संख्या भी बढ़ने लगी।
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आंकड़ों पर गौर करें तो मई में कुपोषित बच्चों की संख्या 5728 रही तो जून में बढ़कर 6595 हो गई। अति कुपोषित बच्चे भी 2700 से बढ़कर 3034 हो गए। इसी तरह 853 अति गंभीर और 425 गंभीर समेत 1242 मैम और सैम बच्चे मिले। मैम और सैम ऐसे बच्चों को पोषण पुनर्वास केंद्र में भर्ती कराने का दावा किया जा रहा है, लेकिन केंद्रों पर बच्चों की संख्या कम ही रहती है। अधिकारियों का मानना है कि आंगनबाड़ी और एएनएम की उदासीनता से केंद्र पर बच्चे नहीं पहुंच पाते।
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गंभीर और अति गंभीर बच्चों को पोषण पुनर्वास केंद्र तक पहुंचाने के जिम्मेदारी आशा, एएनएम और आंगनबाड़ी सेविका, सहायिका पर है। कोरेाना के कारण आंगनबाड़ी केंद्र बंद रहने के कारण कुपोषित बच्चे नहीं पहुंच रहे हैं। अब धीरे-धीरे स्थिति सामान्य हो रही है। - भानु प्रताप सिंह, सीडीओ