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सभी तिथियां स्त्रीरूपा, षष्ठी आनंद दायिनी
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ज्ञानपुर। सनातनी व्यवस्था में सभी तिथियां स्त्री स्वरूपा होती हैं, लेकिन सूर्य षष्ठी तिथि आनंद दायिनी अर्थात पुत्र को देने वाली मानी जाती है। इसे देवी रूप में पूजा जाता है। ये बातें जिले के प्रतिष्ठित संत केशव कृपाल महाराज ने कही। डाला छठ के वैज्ञानिक निहितार्थ समझाते हुए उन्होंने कहा कि इस व्रत को करने वाली माताएं षष्ठी देवी से कार्तिकेय तुल्य पुत्र की कामना करती हैं, जो शिव पुत्र कार्तिकेय की तरह देव सेनानी बनकर समाज के दुर्गुण रूपी दानव से लड़कर सद्गुण रूपी देवत्व की स्थापना कर सके।
उन्होंने डाला छठ या सूर्य षष्ठी पर विचार करते हुए कहा कि यद्यपि हमारी सभी तिथियां स्त्रीरूपा होती हैं, किंतु षष्ठी को देवी के रूप में पूजा जाता है। षष्ठी नंदा तिथि होती है, जो आनंद दायिनी और नंदन प्रदायिनी अर्थात पुत्र को देने वाली होती है। इस अवसर पर गाए जाने वाले नितांत लौकिक गीतों में अलौकिक आध्यात्मिक चेतना छिपी होती है। माताएं षष्ठी देवी से कार्तिकेय जैसे पुत्र की कामना करती हैं, जो शिव पुत्र कार्तिकेय की तरह देव सेनानी बनकर समाज में दुर्गुण रूपी दानव से लड़ सके और सद्गुण रूपी देवत्व की स्थापना कर सके। कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से इस व्रत की पृष्ठभूमि शुरू होती है। इस दिन व्रती लोग स्नान आदि के बाद घर में चावल और शाकाहार करते हैं। इसी को लोकभाषा में ‘नहाय खाय’ कहा गया। अगले दिन पंचमी को ‘खरना’ कहा जाता है ,जिसमें निर्जल उपवास करके सायंकाल गुड़-क्षीर मिश्रित आहार लेने की परंपरा है। षष्ठी के व्रत में पुन: निर्जल उपवास करके सायंकाल अस्ताचलगामी सूर्य को विविध पूजन सामग्री, धूपदीप और नैवेद्य के द्वारा जल में खड़े होकर अर्घ्य देने का विधान है। इसके उपरांत व्रती पूरी रात निर्जल व्रत का पालन करते हैं और सप्तमी के दिन उसी सूर्य के वापस उदय के समय फिर से उसी तरह जल में पूजन और अर्घ्य के बाद श्रेष्ठ वर की कामना करते हुए व्रत की पारणा करते हैं। षष्ठी के दिन को प्रथम अर्घ्य और सप्तमी के दिन को द्वितीय अर्घ्य के रूप में जाना जाता है।
अनेक विशेषताओं से युक्त होते हुए इस पर्व की सबसे बड़ी विशेषता है कि अस्ताचलगामी सूर्य के पूजन के द्वारा यह संदेश दिया जाता है कि हम किसी के पराभव के समय में भी उतना ही सम्मान और श्रद्धा का भाव रखते हैं, जैसा कि उसके अच्छे दिनों में। अस्त होते हुए सूर्य का पूजन करके हम उसे नए सिरे से फिर अभिनव रश्मियों के साथ उदित होने की आशा लेकर घर जाते हैं और सूर्योदय की अरुणिमा को प्राप्त कर सफल मनोरथ होते हैं।
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सांसारिक इच्छाएं पूरी करता है व्रत
ज्ञानपुर। पुराणों में इस व्रत के अनेक कथानक हैं, जिनमें महारानी द्रौपदी और खासकर स्वयं सूर्यपुत्र कर्ण के द्वारा जल में खड़े होकर सूर्य का अर्चन किया गया है। सूर्य समस्त कामनाओं को देने वाले देवता कहे गए हैं। वैज्ञानिक मत से भी इस सृष्टि के अस्तित्व के मूल में सूर्य ही हैं। सामान्य संसारी व्यक्ति में पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणा ही प्रधान इच्छाएं होती हैं। इस व्रत के द्वारा इन तीनों की परिलब्धि संभव बताई गई है। छठ के प्रसिद्ध गीत में गाया जाता है, ‘काहे लागी कर ह छठी के बरतिया हे... अन धन सोनवा लागी पूजी देवल घरवा हे, पुत्र लागी करी हम छठी के बरतिया हे।’
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‘सांस्कृतिक धरोहर का भंडारण करता है कार्तिक मास’
ज्ञानपुर। स्कंद पुराण के एक श्लोक ‘मासानां कार्तिक: श्रेष्ठो देवानां मधुसूदन:’ के जरिए कार्तिक महीने की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए संत केशव कृपाल कहते हैं कि सभी द्वादश मासों में कार्तिक मास श्रेष्ठ है। यह परमात्मा की परम विभूति है। इसमें प्रारंभ से देखें तो कृष्ण पक्ष में करवा चौथ, गोवत्स द्वादशी, धनतेरस, नरक चतुर्दशी, हनुमान जयंती और अमावस्या को दीपावली मनाई जाती है। शुक्ल पक्ष के शुरूहोते ही गोवर्धन पूजा, भ्रातृ द्वितीया, सूर्य षष्ठी, गोपाष्टमी, अक्षय नवमी, देवोत्थान एकादशी, वैकुंठ चतुर्दशी और अंत में कार्तिक पूर्णिमा का महा महोत्सव संपन्न होता है। इस दृष्टि से कार्तिक मास हमारी सांस्कृतिक धरोहर का भंडारण करता है।
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उन्होंने डाला छठ या सूर्य षष्ठी पर विचार करते हुए कहा कि यद्यपि हमारी सभी तिथियां स्त्रीरूपा होती हैं, किंतु षष्ठी को देवी के रूप में पूजा जाता है। षष्ठी नंदा तिथि होती है, जो आनंद दायिनी और नंदन प्रदायिनी अर्थात पुत्र को देने वाली होती है। इस अवसर पर गाए जाने वाले नितांत लौकिक गीतों में अलौकिक आध्यात्मिक चेतना छिपी होती है। माताएं षष्ठी देवी से कार्तिकेय जैसे पुत्र की कामना करती हैं, जो शिव पुत्र कार्तिकेय की तरह देव सेनानी बनकर समाज में दुर्गुण रूपी दानव से लड़ सके और सद्गुण रूपी देवत्व की स्थापना कर सके। कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से इस व्रत की पृष्ठभूमि शुरू होती है। इस दिन व्रती लोग स्नान आदि के बाद घर में चावल और शाकाहार करते हैं। इसी को लोकभाषा में ‘नहाय खाय’ कहा गया। अगले दिन पंचमी को ‘खरना’ कहा जाता है ,जिसमें निर्जल उपवास करके सायंकाल गुड़-क्षीर मिश्रित आहार लेने की परंपरा है। षष्ठी के व्रत में पुन: निर्जल उपवास करके सायंकाल अस्ताचलगामी सूर्य को विविध पूजन सामग्री, धूपदीप और नैवेद्य के द्वारा जल में खड़े होकर अर्घ्य देने का विधान है। इसके उपरांत व्रती पूरी रात निर्जल व्रत का पालन करते हैं और सप्तमी के दिन उसी सूर्य के वापस उदय के समय फिर से उसी तरह जल में पूजन और अर्घ्य के बाद श्रेष्ठ वर की कामना करते हुए व्रत की पारणा करते हैं। षष्ठी के दिन को प्रथम अर्घ्य और सप्तमी के दिन को द्वितीय अर्घ्य के रूप में जाना जाता है।
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अनेक विशेषताओं से युक्त होते हुए इस पर्व की सबसे बड़ी विशेषता है कि अस्ताचलगामी सूर्य के पूजन के द्वारा यह संदेश दिया जाता है कि हम किसी के पराभव के समय में भी उतना ही सम्मान और श्रद्धा का भाव रखते हैं, जैसा कि उसके अच्छे दिनों में। अस्त होते हुए सूर्य का पूजन करके हम उसे नए सिरे से फिर अभिनव रश्मियों के साथ उदित होने की आशा लेकर घर जाते हैं और सूर्योदय की अरुणिमा को प्राप्त कर सफल मनोरथ होते हैं।
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सांसारिक इच्छाएं पूरी करता है व्रत
ज्ञानपुर। पुराणों में इस व्रत के अनेक कथानक हैं, जिनमें महारानी द्रौपदी और खासकर स्वयं सूर्यपुत्र कर्ण के द्वारा जल में खड़े होकर सूर्य का अर्चन किया गया है। सूर्य समस्त कामनाओं को देने वाले देवता कहे गए हैं। वैज्ञानिक मत से भी इस सृष्टि के अस्तित्व के मूल में सूर्य ही हैं। सामान्य संसारी व्यक्ति में पुत्रैषणा, वित्तैषणा और लोकैषणा ही प्रधान इच्छाएं होती हैं। इस व्रत के द्वारा इन तीनों की परिलब्धि संभव बताई गई है। छठ के प्रसिद्ध गीत में गाया जाता है, ‘काहे लागी कर ह छठी के बरतिया हे... अन धन सोनवा लागी पूजी देवल घरवा हे, पुत्र लागी करी हम छठी के बरतिया हे।’
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‘सांस्कृतिक धरोहर का भंडारण करता है कार्तिक मास’
ज्ञानपुर। स्कंद पुराण के एक श्लोक ‘मासानां कार्तिक: श्रेष्ठो देवानां मधुसूदन:’ के जरिए कार्तिक महीने की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए संत केशव कृपाल कहते हैं कि सभी द्वादश मासों में कार्तिक मास श्रेष्ठ है। यह परमात्मा की परम विभूति है। इसमें प्रारंभ से देखें तो कृष्ण पक्ष में करवा चौथ, गोवत्स द्वादशी, धनतेरस, नरक चतुर्दशी, हनुमान जयंती और अमावस्या को दीपावली मनाई जाती है। शुक्ल पक्ष के शुरूहोते ही गोवर्धन पूजा, भ्रातृ द्वितीया, सूर्य षष्ठी, गोपाष्टमी, अक्षय नवमी, देवोत्थान एकादशी, वैकुंठ चतुर्दशी और अंत में कार्तिक पूर्णिमा का महा महोत्सव संपन्न होता है। इस दृष्टि से कार्तिक मास हमारी सांस्कृतिक धरोहर का भंडारण करता है।