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Basti News: रुपयों के अभाव में दम तोड़ देते हैं मरीज... हेल्थ इंश्योरेंस बढ़ाता है इलाज का खर्च
Sun, 15 Sep 2024 11:04 PM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बस्ती
संवाद न्यूज एजेंसी, बस्ती
Updated Sun, 15 Sep 2024 11:04 PM IST
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सरकारी सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटलों में भर्ती नहीं हो पा रहे मरीज, प्राइवेट में आ रहा ज्यादा खर्च
जान बचाने के लिए जायदाद तक दांव पर लगा रहे लोग, गंभीर बीमारी में खर्च की कोई सीमा नहीं
संवाद न्यूज एजेंसी
बस्ती। निजी क्षेत्र के छोटे से लेकर बड़े स्तर तक के अस्पतालों में इलाज का खर्च सामान्य लोगों की पहुंच से बाहर है। यहां रुपयों के अभाव में मरीज या तो दम तोड़ दे रहे हैं या फिर उनकी जायदाद, गहने समेत सबकुछ दांव पर लग जा रहा है। इसके बाद भी जिंदगी बचने की गारंटी नहीं है। यह खेल निजी क्षेत्र के छोटे-बड़े अधिकतर अस्पतालों में चल रहा है।
गंभीर मरीज अक्सर जिला अस्पताल एवं ओपेक चिकित्सालय कैली से गोरखपुर, लखनऊ रेफर कर दिए जा रहे हैं। इसके बाद रुपयों के बेइंतहा खर्च का दौर शुरू हो जाता है। यदि मरीज अथवा उनके परिजन आर्थिक रूप से सक्षम नहीं है तो सच मानिए, इलाज हो पाना बेहद कठिन है। क्योंकि लखनऊ में केजीएमयू, डॉ. राम मनोहर लोहिया मेडिकल इंस्टीट्यूट, एसजीपीजीआई कहीं पर भी गंभीर मरीज को तत्काल आईसीयू में भर्ती करने की सुविधा नहीं मिल पा रही है। इस वजह से लोगों को निजी क्षेत्र के सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल का सहारा लेना पड़ रहा है।
यहां खर्च की कोई सीमा नहीं है। यदि हजारों के खर्च पर आप ठीक होकर लौटने का सपना संजोए हैं तो यह अपने दिमाग से निकाल दीजिए। बीमारी के हिसाब से खर्चा बढ़कर लाखों में पहुंच सकता है। मध्यम वर्गीय लोगों के लिए निजी क्षेत्र के बड़े अस्पतालों में इलाज के दौरान रुपये भी कम पड़ रहे हैं। ऐसे में तीमारदार अपने मरीज के इलाज के खातिर अस्पताल प्रबंधन से भुगतान के खातिर मोहलत मिलने की विनती करते हैं। इसके बाद जायदाद, गहने आदि गिरवी रखकर किसी तरह फिर पहुंचते हैं। क्योंकि अस्पताल प्रबंधन का पूरा दबाव इलाज के बिल भुगतान पर रहता है। जिनके पास एकदम रुपयों की व्यवस्था नहीं रहती है उन्हें दम भी तोड़ देना पड़ता है।
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ज्यादातर लीवर, किडनी, कैंसर, न्यूरो से संबंधित गंभीर रोगियों के इलाज काफी महंगे हो गए हैं। इन्हें आईसीयू में रखने के साथ दवा, इलाज के नाम पर प्रति 24 घंटे 25 से 50 हजार रुपये का खर्च आ रहा है। ऐसे मरीजों को 15 दिन भी भर्ती रखने पर हाई लेबल के अस्पतालों का बिल लाखों में पहुंच रहा है। सामान्य लोगों के लिए अचानक इतना खर्च वहन कर पाना संभव नहीं है। इसीलिए लोग रुपये खत्म होने पर मरीज को लेकर लौट आ रहे हैं।
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केस- एक
भाभी की तबीयत खराब थी। उन्हें सांस लेने में दिक्कत थी। लखनऊ के प्रसिद्ध सुपर स्पेशलिटी हाॅस्पिटल में भर्ती कराया गया। डॉक्टर ने आईसीयू में रखने की सलाह दी। प्रतिदिन 25 हजार रुपये का खर्च आ रहा था। लगभग एक महीने तक यही स्थिति रही। लगभग 8 लाख रुपये का भुगतान करना पड़ा। फिर भी उनकी जान नहीं बची। उधर से शव लेकर लौटना पड़ा।
प्रभाकर मणि त्रिपाठी, पिकौरा शिवगुलाम
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केस-दो
पिता जी की तबीयत अचानक बिगड़ी। उन्हें उल्टी-दस्त की शिकायत हुई। यहां से चिकित्सकों ने लखनऊ रेफर कर दिया। उन्हें लेकर लखनऊ के प्रतिष्ठित निजी हॉस्पिटल में पहुंचे। उन्हें तीन से चार दिन तक आईसीयू में रखने के बाद आंत का ऑपरेशन किया गया। लगभग 15 दिन बाद डिस्चार्ज करके घर भेज दिया गया। लेकिन दो सप्ताह बाद उनकी मौत हो गई। उनके इलाज में एक महीने के भीतर 8 से 10 लाख रुपये खर्च हुए।
-अरुण कुमार, मालवीय रोड
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सरकारी हायर मेडिकल सेंटर में भर्ती होना आसान नहीं
यहां से रेफर होने के बाद लखनऊ के लोहिया, मेडिकल कॉलेज और एसजीपीजीआई जैसे हायर मेडिकल सेंटर में मरीजों को आसानी से भर्ती नहीं मिलती है। हर जगह आईसीयू फुल होने एवं बेड न खाली होने का जवाब मिलता है। इस वजह से मरीज को लेकर निजी क्षेत्र के सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल में लेकर जाना लोगों की मजबूरी बन जाती है।
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वेंटिलेटर की सुविधा मिलने से दूर होती कुछ समस्या
जिले के किसी भी अस्पताल में गंभीर मरीजों के लिए वेंटिलेटर की सुविधा नहीं है। इस वजह से मरीजों को गोरखपुर और लखनऊ जैसे हायर मेडिकल सेंटर पर रेफर करना पड़ता है। काफी मरीज रास्ते में मर जाते हैं। अगर वेंटिलेटर की सुविधा बढ़ जाए तो रास्ते में मरने वालों की संख्या घट जाएगी। कोरोना काल में मेडिकल कॉलेज को 97 वेंटिलेटर आवंटित हुए थे। मगर, इसे आपरेट करने के लिए मैन पावर ही नहीं दिए गए। यह वेंटिलेटर चार साल से धूल फांक रहे हैं।
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हेल्थ इंश्योरेंस बढ़ा रहा इलाज का खर्च
यदि आप इस मुगालते में है कि आपने हेल्थ इंश्योरेंस कराया है और इलाज आपका मुफ्त हो जाएगा तो यह भी नुकसानदेह साबित हो सकता है। कभी-कभी हेल्थ इंश्योरेंस वाले गंभीर मरीजों को आईसीयू में तब तक रखा जाता है जब तक कि इंश्योरेंस की लिमिट पूरी नहीं हो जाती। राजन कुमार बताते हैं कि उनकी मां कैंसर की मरीज थीं। दिल्ली के एक निजी अस्पताल में ऑपरेशन करने के बाद आईसीयू में महीनों तक भर्ती रखा गया। बाद में उनकी मौत हो गई। इंश्योरेंस की लिमिट भी लगभग खत्म हो चुकी थी।
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जान बचाने के लिए जायदाद तक दांव पर लगा रहे लोग, गंभीर बीमारी में खर्च की कोई सीमा नहीं
संवाद न्यूज एजेंसी
बस्ती। निजी क्षेत्र के छोटे से लेकर बड़े स्तर तक के अस्पतालों में इलाज का खर्च सामान्य लोगों की पहुंच से बाहर है। यहां रुपयों के अभाव में मरीज या तो दम तोड़ दे रहे हैं या फिर उनकी जायदाद, गहने समेत सबकुछ दांव पर लग जा रहा है। इसके बाद भी जिंदगी बचने की गारंटी नहीं है। यह खेल निजी क्षेत्र के छोटे-बड़े अधिकतर अस्पतालों में चल रहा है।
गंभीर मरीज अक्सर जिला अस्पताल एवं ओपेक चिकित्सालय कैली से गोरखपुर, लखनऊ रेफर कर दिए जा रहे हैं। इसके बाद रुपयों के बेइंतहा खर्च का दौर शुरू हो जाता है। यदि मरीज अथवा उनके परिजन आर्थिक रूप से सक्षम नहीं है तो सच मानिए, इलाज हो पाना बेहद कठिन है। क्योंकि लखनऊ में केजीएमयू, डॉ. राम मनोहर लोहिया मेडिकल इंस्टीट्यूट, एसजीपीजीआई कहीं पर भी गंभीर मरीज को तत्काल आईसीयू में भर्ती करने की सुविधा नहीं मिल पा रही है। इस वजह से लोगों को निजी क्षेत्र के सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल का सहारा लेना पड़ रहा है।
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यहां खर्च की कोई सीमा नहीं है। यदि हजारों के खर्च पर आप ठीक होकर लौटने का सपना संजोए हैं तो यह अपने दिमाग से निकाल दीजिए। बीमारी के हिसाब से खर्चा बढ़कर लाखों में पहुंच सकता है। मध्यम वर्गीय लोगों के लिए निजी क्षेत्र के बड़े अस्पतालों में इलाज के दौरान रुपये भी कम पड़ रहे हैं। ऐसे में तीमारदार अपने मरीज के इलाज के खातिर अस्पताल प्रबंधन से भुगतान के खातिर मोहलत मिलने की विनती करते हैं। इसके बाद जायदाद, गहने आदि गिरवी रखकर किसी तरह फिर पहुंचते हैं। क्योंकि अस्पताल प्रबंधन का पूरा दबाव इलाज के बिल भुगतान पर रहता है। जिनके पास एकदम रुपयों की व्यवस्था नहीं रहती है उन्हें दम भी तोड़ देना पड़ता है।
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ज्यादातर लीवर, किडनी, कैंसर, न्यूरो से संबंधित गंभीर रोगियों के इलाज काफी महंगे हो गए हैं। इन्हें आईसीयू में रखने के साथ दवा, इलाज के नाम पर प्रति 24 घंटे 25 से 50 हजार रुपये का खर्च आ रहा है। ऐसे मरीजों को 15 दिन भी भर्ती रखने पर हाई लेबल के अस्पतालों का बिल लाखों में पहुंच रहा है। सामान्य लोगों के लिए अचानक इतना खर्च वहन कर पाना संभव नहीं है। इसीलिए लोग रुपये खत्म होने पर मरीज को लेकर लौट आ रहे हैं।
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केस- एक
भाभी की तबीयत खराब थी। उन्हें सांस लेने में दिक्कत थी। लखनऊ के प्रसिद्ध सुपर स्पेशलिटी हाॅस्पिटल में भर्ती कराया गया। डॉक्टर ने आईसीयू में रखने की सलाह दी। प्रतिदिन 25 हजार रुपये का खर्च आ रहा था। लगभग एक महीने तक यही स्थिति रही। लगभग 8 लाख रुपये का भुगतान करना पड़ा। फिर भी उनकी जान नहीं बची। उधर से शव लेकर लौटना पड़ा।
प्रभाकर मणि त्रिपाठी, पिकौरा शिवगुलाम
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केस-दो
पिता जी की तबीयत अचानक बिगड़ी। उन्हें उल्टी-दस्त की शिकायत हुई। यहां से चिकित्सकों ने लखनऊ रेफर कर दिया। उन्हें लेकर लखनऊ के प्रतिष्ठित निजी हॉस्पिटल में पहुंचे। उन्हें तीन से चार दिन तक आईसीयू में रखने के बाद आंत का ऑपरेशन किया गया। लगभग 15 दिन बाद डिस्चार्ज करके घर भेज दिया गया। लेकिन दो सप्ताह बाद उनकी मौत हो गई। उनके इलाज में एक महीने के भीतर 8 से 10 लाख रुपये खर्च हुए।
-अरुण कुमार, मालवीय रोड
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सरकारी हायर मेडिकल सेंटर में भर्ती होना आसान नहीं
यहां से रेफर होने के बाद लखनऊ के लोहिया, मेडिकल कॉलेज और एसजीपीजीआई जैसे हायर मेडिकल सेंटर में मरीजों को आसानी से भर्ती नहीं मिलती है। हर जगह आईसीयू फुल होने एवं बेड न खाली होने का जवाब मिलता है। इस वजह से मरीज को लेकर निजी क्षेत्र के सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल में लेकर जाना लोगों की मजबूरी बन जाती है।
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वेंटिलेटर की सुविधा मिलने से दूर होती कुछ समस्या
जिले के किसी भी अस्पताल में गंभीर मरीजों के लिए वेंटिलेटर की सुविधा नहीं है। इस वजह से मरीजों को गोरखपुर और लखनऊ जैसे हायर मेडिकल सेंटर पर रेफर करना पड़ता है। काफी मरीज रास्ते में मर जाते हैं। अगर वेंटिलेटर की सुविधा बढ़ जाए तो रास्ते में मरने वालों की संख्या घट जाएगी। कोरोना काल में मेडिकल कॉलेज को 97 वेंटिलेटर आवंटित हुए थे। मगर, इसे आपरेट करने के लिए मैन पावर ही नहीं दिए गए। यह वेंटिलेटर चार साल से धूल फांक रहे हैं।
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हेल्थ इंश्योरेंस बढ़ा रहा इलाज का खर्च
यदि आप इस मुगालते में है कि आपने हेल्थ इंश्योरेंस कराया है और इलाज आपका मुफ्त हो जाएगा तो यह भी नुकसानदेह साबित हो सकता है। कभी-कभी हेल्थ इंश्योरेंस वाले गंभीर मरीजों को आईसीयू में तब तक रखा जाता है जब तक कि इंश्योरेंस की लिमिट पूरी नहीं हो जाती। राजन कुमार बताते हैं कि उनकी मां कैंसर की मरीज थीं। दिल्ली के एक निजी अस्पताल में ऑपरेशन करने के बाद आईसीयू में महीनों तक भर्ती रखा गया। बाद में उनकी मौत हो गई। इंश्योरेंस की लिमिट भी लगभग खत्म हो चुकी थी।