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मेडिकल कॉलेज : दो साल बाद भी 50 बेड की सीसीयू अपूर्ण
Sat, 25 Oct 2025 02:00 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बस्ती
संवाद न्यूज एजेंसी, बस्ती
Updated Sat, 25 Oct 2025 02:00 AM IST
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मेडिकल कालेज में निर्माणाधीन क्रिटिकल केयर यूनिट- संवाद
बस्ती। गोरखपुर-लखनऊ की तरह महर्षि वशिष्ठ मेडिकल कॉलेज बस्ती को अपग्रेड करने की योजना दो साल पहले बनी थी। एनएचएम के बजट से अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस 50 शय्या का क्रिटिकल केयर यूनिट जनवरी में ही चालू होनी थी।
लेकिन, कार्यदायी एजेंसी राजकीय निर्माण निगम की सुस्ती से निर्माण कार्य पूरा नहीं हो सका है। डीएम की लगातार तीन बार चेतावनी के बाद भी यह यूनिट तैयार नहीं हुई। इसका खामियाजा गंभीर मरीजों को भुगतना पड़ रहा है। आईसीयू की सुविधा न मिलने से गंभीर मरीजों को मेडिकल कॉलेज से रेफर करना पड़ रहा है।
दवा के कारोबारी धर्मेंद्र बताते हैं कि निर्माण एजेंसियों के कार्य करने का तरीका हर जगह एक जैसा है। स्वास्थ्य से जुड़ी परियोजना हो या अन्य कोई परियोजना, समयबद्धता के साथ कार्य करना तो उनकी आदत में ही शुमार नहीं है। डीएम स्तर के अधिकारी तीन बार चेतावनी दे चुके हैं।
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लेकिन, अब भी मशीनीकरण, बेड, फिनिशिंग की बात छोड़िए, भवन का ही कार्य पूर्ण नहीं हो सका है। यह यूनिट चालू हो जाती तो मेडिकल कॉलेज अपग्रेड हो गया होता। यह यूनिट एमबीबीएस छात्रों के प्रैक्टिकल में बहुत कारगर सिद्ध होती। अभी यहां केवल सामान्य मरीजों का इलाज संभव है।
वहीं, परमात्मा प्रसाद मिश्र का कहना है कि जिस हिसाब से इस यूनिट का निर्माण कार्य चल रहा है, उससे तो लगता है कि अभी इसे पूरा होने में कम से कम एक साल और लग जाएंगे। बताया कि निर्माण एजेंसी के अधिकारी भी सप्ताह या पखवाड़े में केवल एक या दो बार पहुंचते हैं। भवन निर्माण की क्वालिटी की जांच भी नियमित नहीं होती है। जानकार बताते हैं कि किसी भी सिविल वर्क में शुरू से आखिरी तक क्वालिटी की जांच जरूरी है। इसके लिए सरकार की तमाम अधिकृत संस्थाएं बनाई गई हैं। अमूमन सेटिंग वाले संस्था से ही क्वालिटी जांच की रिपोर्ट पक्ष में लगवाकर कोरम पूरा कर लिया जाता है।
रोजाना रेफर हो रहे 15 से 20 मरीज : हार्ट हटैक एवं ब्रेन स्ट्रोक वाले गंभीर मरीजों को मेडिकल कॉलेज की ओर से प्राथमिक उपचार के बाद तत्काल रेफर करना पड़ रहा है। आईसीयू वार्ड की व्यवस्था न हाेने से ऐसे मरीजों का इलाज नहीं हो पा रहा है। गंभीर रूप से दुर्घटनाग्रस्त मरीज भी रेफर किए जा रहे हैं। तत्काल उपचार की आस में लोग कुछ निजी अस्पतालों का सहारा ले रहे हैं। यहां अधिक खर्च के बाद भी मुकम्मल इलाज नहीं होने से लोग ठगा महसूस कर लखनऊ और गोरखपुर मरीज लेकर भागने पर विवश हो रहे हैं।
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लेकिन, कार्यदायी एजेंसी राजकीय निर्माण निगम की सुस्ती से निर्माण कार्य पूरा नहीं हो सका है। डीएम की लगातार तीन बार चेतावनी के बाद भी यह यूनिट तैयार नहीं हुई। इसका खामियाजा गंभीर मरीजों को भुगतना पड़ रहा है। आईसीयू की सुविधा न मिलने से गंभीर मरीजों को मेडिकल कॉलेज से रेफर करना पड़ रहा है।
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दवा के कारोबारी धर्मेंद्र बताते हैं कि निर्माण एजेंसियों के कार्य करने का तरीका हर जगह एक जैसा है। स्वास्थ्य से जुड़ी परियोजना हो या अन्य कोई परियोजना, समयबद्धता के साथ कार्य करना तो उनकी आदत में ही शुमार नहीं है। डीएम स्तर के अधिकारी तीन बार चेतावनी दे चुके हैं।
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लेकिन, अब भी मशीनीकरण, बेड, फिनिशिंग की बात छोड़िए, भवन का ही कार्य पूर्ण नहीं हो सका है। यह यूनिट चालू हो जाती तो मेडिकल कॉलेज अपग्रेड हो गया होता। यह यूनिट एमबीबीएस छात्रों के प्रैक्टिकल में बहुत कारगर सिद्ध होती। अभी यहां केवल सामान्य मरीजों का इलाज संभव है।
वहीं, परमात्मा प्रसाद मिश्र का कहना है कि जिस हिसाब से इस यूनिट का निर्माण कार्य चल रहा है, उससे तो लगता है कि अभी इसे पूरा होने में कम से कम एक साल और लग जाएंगे। बताया कि निर्माण एजेंसी के अधिकारी भी सप्ताह या पखवाड़े में केवल एक या दो बार पहुंचते हैं। भवन निर्माण की क्वालिटी की जांच भी नियमित नहीं होती है। जानकार बताते हैं कि किसी भी सिविल वर्क में शुरू से आखिरी तक क्वालिटी की जांच जरूरी है। इसके लिए सरकार की तमाम अधिकृत संस्थाएं बनाई गई हैं। अमूमन सेटिंग वाले संस्था से ही क्वालिटी जांच की रिपोर्ट पक्ष में लगवाकर कोरम पूरा कर लिया जाता है।
रोजाना रेफर हो रहे 15 से 20 मरीज : हार्ट हटैक एवं ब्रेन स्ट्रोक वाले गंभीर मरीजों को मेडिकल कॉलेज की ओर से प्राथमिक उपचार के बाद तत्काल रेफर करना पड़ रहा है। आईसीयू वार्ड की व्यवस्था न हाेने से ऐसे मरीजों का इलाज नहीं हो पा रहा है। गंभीर रूप से दुर्घटनाग्रस्त मरीज भी रेफर किए जा रहे हैं। तत्काल उपचार की आस में लोग कुछ निजी अस्पतालों का सहारा ले रहे हैं। यहां अधिक खर्च के बाद भी मुकम्मल इलाज नहीं होने से लोग ठगा महसूस कर लखनऊ और गोरखपुर मरीज लेकर भागने पर विवश हो रहे हैं।