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संकट में पौराणिक नदी मनोरम और रामरेखा का अस्तित्व
ब्यूरो/अमर उजाला बस्ती
Updated Tue, 12 Jun 2018 11:16 PM IST
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छावनी क्षेत्र मेंे पौराणिक रामरेखा नदी में उगी जलकुंभी।
- फोटो : अमर उजाला
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हर्रैया/बस्ती। कृषि प्रधान देश में नदियों को जीवनरेखा माना जाता है, लेकिन प्रशासन की उपेक्षा से जिले की दौ पौराणिक नदियों का अस्तित्व संकट में है। कभी लहराती-बलखाती बहने वाली ये नदियां आज अपनी पहचान बचाने को जूझ रही हैं। हर्रैया तहसील क्षेत्र की मनोरमा नदी का बहाव कई स्थानों पर थम गया है तो रामरेखा का अस्तित्व भी खत्म होने को है।
नदियां संस्कृति और सभ्यता के साथ-साथ आर्थिक उन्नति का भी आधार होती हैं। तमाम सभ्यताएं नदी किनारे विकसित हुईं। मनोरमा भी अपने आंचल में सैकड़ों गांवों को समेटे हुए थी। सिंचाई तथा पेयजल व्यवस्था पूरी तरह से इसी नदी पर आश्रित थी। मनोरमा के किनारे नई दुनिया, चौबेपुर, सेहरिया, कुसमौर, हरिगांव, नागपुर ठाकुरपुर, बनकटवा, हरनहवा, ककरा, अमारी ,लजघटा, हरैया, जगदीशपुर ,तपसी धाम समेत सैकड़ों ऐसे गांव हैं, जहां खेतों की सिंचाई नदी के जल से ढेकुली लगाकर की जाती थी। धीरे-धीरे नदी की धारा घटती गई। गोंडा के मनकापुर में कल-कारखानों के छोड़े गए अपशिष्ट तथा गंदे पानी से नदी का जल दूषित हो गया। प्रदूषण के चलते नई किस्म की घास व सिल्ट जमा हो गए। अविरल धारा बाधित होने से नदी का स्वरूप छोटे-छोटे तालाबों में परिवर्तित हो गया है। न तो आज बेजुबानों के लिए घाट पर पीने को पानी है और न सिंचाई के लिए पर्याप्त जल। गांव के श्रवण कुमार, राम भवन यादव, हरिश्चंद्र, राम जनक, श्यामलाल, सियाराम यादव, उमाकांत शास्त्री आदि ने कहा कि नदी की दुर्दशा देख असहनीय पीड़ा होती है।
अस्तित्व के लिए जूझ रही दूसरी नदी है रामरेखा। कभी इस नदी के जल से सीता जीने प्यास बुझाई थी, लेकिन आज अतिक्रमण की वजह से यह सिमटती जा रही है। साफ-सफाई के अभाव में नदी नाले में तबदील हो गई है। मान्यता है कि जनकपुर लौटते समय राम, सीता और लक्ष्मण ने इसी स्थान पर विश्राम किया था। माता सीता को प्यास लगने पर भगवान राम ने अपने बाण से रेखा खींच कर जल निकाला था, जिससे माता ने अपनी प्यास बुझाई थी। यहां से निकला जल आगे जाकर हर्रैया के पास मनवर नदी में मिला था। तभी से इसे रामरेखा नदी के नाम से जाना जाता है।
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रामरेखा नदी के तट पर बना रामजानकी मंदिर परिसर चौरासी कोसी परिक्रमा का प्रथम पड़ाव स्थल है। इतने महत्व के बाद भी रामरेखा नदी दुर्दशा झेल रही है। किसी भी सरकार में नदी की सफाई और सौंदर्यीकरण पर ध्यान नहीं दिया गया। मंदिर के पुजारी बाबा दयाशंकर दास का कहना है कि सफाई के अभाव में नदी में जलकुंभी के अलावा तमाम तरह के झाड़-झंखाड़ उग आए हैं। आज इसका जल जानवर भी नहीं पी पा रहे हैं। सामाजिक कार्यकर्ता अनिल सिंह ने कुछ वर्ष पहले जन सहयोग से नदी को साफ करने का अभियान शुरू किया था, लेकिन अपेक्षित सहयोग नहीं मिलने से कोई अभियान रुक गया।
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नदियां संस्कृति और सभ्यता के साथ-साथ आर्थिक उन्नति का भी आधार होती हैं। तमाम सभ्यताएं नदी किनारे विकसित हुईं। मनोरमा भी अपने आंचल में सैकड़ों गांवों को समेटे हुए थी। सिंचाई तथा पेयजल व्यवस्था पूरी तरह से इसी नदी पर आश्रित थी। मनोरमा के किनारे नई दुनिया, चौबेपुर, सेहरिया, कुसमौर, हरिगांव, नागपुर ठाकुरपुर, बनकटवा, हरनहवा, ककरा, अमारी ,लजघटा, हरैया, जगदीशपुर ,तपसी धाम समेत सैकड़ों ऐसे गांव हैं, जहां खेतों की सिंचाई नदी के जल से ढेकुली लगाकर की जाती थी। धीरे-धीरे नदी की धारा घटती गई। गोंडा के मनकापुर में कल-कारखानों के छोड़े गए अपशिष्ट तथा गंदे पानी से नदी का जल दूषित हो गया। प्रदूषण के चलते नई किस्म की घास व सिल्ट जमा हो गए। अविरल धारा बाधित होने से नदी का स्वरूप छोटे-छोटे तालाबों में परिवर्तित हो गया है। न तो आज बेजुबानों के लिए घाट पर पीने को पानी है और न सिंचाई के लिए पर्याप्त जल। गांव के श्रवण कुमार, राम भवन यादव, हरिश्चंद्र, राम जनक, श्यामलाल, सियाराम यादव, उमाकांत शास्त्री आदि ने कहा कि नदी की दुर्दशा देख असहनीय पीड़ा होती है।
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अस्तित्व के लिए जूझ रही दूसरी नदी है रामरेखा। कभी इस नदी के जल से सीता जीने प्यास बुझाई थी, लेकिन आज अतिक्रमण की वजह से यह सिमटती जा रही है। साफ-सफाई के अभाव में नदी नाले में तबदील हो गई है। मान्यता है कि जनकपुर लौटते समय राम, सीता और लक्ष्मण ने इसी स्थान पर विश्राम किया था। माता सीता को प्यास लगने पर भगवान राम ने अपने बाण से रेखा खींच कर जल निकाला था, जिससे माता ने अपनी प्यास बुझाई थी। यहां से निकला जल आगे जाकर हर्रैया के पास मनवर नदी में मिला था। तभी से इसे रामरेखा नदी के नाम से जाना जाता है।
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रामरेखा नदी के तट पर बना रामजानकी मंदिर परिसर चौरासी कोसी परिक्रमा का प्रथम पड़ाव स्थल है। इतने महत्व के बाद भी रामरेखा नदी दुर्दशा झेल रही है। किसी भी सरकार में नदी की सफाई और सौंदर्यीकरण पर ध्यान नहीं दिया गया। मंदिर के पुजारी बाबा दयाशंकर दास का कहना है कि सफाई के अभाव में नदी में जलकुंभी के अलावा तमाम तरह के झाड़-झंखाड़ उग आए हैं। आज इसका जल जानवर भी नहीं पी पा रहे हैं। सामाजिक कार्यकर्ता अनिल सिंह ने कुछ वर्ष पहले जन सहयोग से नदी को साफ करने का अभियान शुरू किया था, लेकिन अपेक्षित सहयोग नहीं मिलने से कोई अभियान रुक गया।