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Basti News: पीलिया, मिर्गी और टाइफायड में करा रहे झाड़फूंक, जा रहीं कई की जान
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बस्ती। बस्ती में विकास तेजी से हो रहा है। करोड़ों की लग्जरी कारों में फोरलेन, सिक्सलेन पर लोग फर्राटा भर रहे हैं, लेकिन अंधविश्वास के चलते लोग अब भी सौ-डेढ़ सौ साल पुरानी कु-प्रथाओं को नहीं छोड़ पा रहे।
अंधविश्वास में यहां अभी भी एक बड़ी आबादी सांप के डसने, पीलिया होने, टाइफायड, मिर्गी, बुखार में दौरे और निमोनिया जैसी बीमारी में सीधे डॉक्टर के पास जाने के बजाय झाड़फूंक करा रहे हैं। इनकी झाड़फूंक यहीं खत्म नहीं होती, बेटे पैदा होने की चाहत में गर्भवती को कई तरह की बूटी और भभूत खिलाई जाती है। साथ ही ताबीज तो हर तीसरे-चौथे घर में मिल जाएंगे।
आमतौर पर लोग इस पर विश्वास कर इसे पुरानी प्रथा के अनुसार इलाज करना मानते हैं, जबकि डॉक्टरों का कहना है कि मरीज को झाड़फूंक नहीं, सही समय पर सही इलाज की जरूरत होती है।
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केस-1
25 साल की एक युवती रात में उठकर घर से बाहर निकल जाती थी। वह बैठे-बैठे चीखने लगती थी। बताती थी कि कोई उसके पास आता है, उससे बातें करता है, उसे बाहर जाने को कहता है। घरवाले इसे प्रेत-बाधा समझकर तीन साल तक लड़की को बाबा और झाड़फूंक करने वाले के पास ले गए। उसकी हालत बिगड़ती जा रही थी। जिला अस्पताल जाने पर पता चला कि वह सिजोफ्रेनिया की शिकार है।
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केस-2
दो बच्चों की मां को एक दिन घर में काम करते वक्त सांप ने डस लिया। पति और उसके घरवाले महिला को लेकर छह-सात घंटे तक इधर-उधर झाड़फूंक कराते रहे, लेकिन, जब वह मरणासन्न हो गई, तो उसे लेकर जिला अस्पताल पहुंचे। वहां डॉक्टरों ने महिला को मृत बता दिया, जबकि परिजन डॉक्टरों से उसे बचा लेने की गुहार लगाते रहे।
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केस-3
35 साल के एक युवा को पीलिया हो गया था। बीमारी समझ में आते ही परिजन अपने बेटे को झाड़फूंक कराने के लिए कई जगह ले गए। जहां पीलिया की झाड़फूंक करने वालों ने उसे धागा बांधकर गले में जड़ी-बूटी की कई मालाएं पहनाईं। डेढ़ महीने तक वह लोग झाड़फूंक कराते रहे। हालत बिगड़ गई तो उसे जिला अस्पताल में भर्ती कराया।
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विशेषज्ञों का कहना
यहां बच्चों को दौरे पड़ने पर, टाइफायड होने और सांप के डसने पर लोग पहले झाड़फूंक कराते हैं। पीलिया होने पर भी कई दिनों तक पीलिया झड़वाते रहते हैं, जबकि झाड़फूंक से अक्सर बच्चों की हालत बिगड़ जाती है। इससे इलाज में भी देरी होती है। अक्सर समझाने पर भी परिजन नहीं मानते हैं।
-डॉ. अभिषेक, बाल रोग विशेषज्ञ
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सांप के डसने पर अधिकांश परिवार सबसे पहले झाड़फूंक कराने दौड़ते हैं। इसके अलावा र्मिगी, साइकोसिस (मनोविक्षिप्त) और बार-बार बेहोश हो जाना व उल्टी-सीधी बातें करने के केस में इसे ऊपरी चक्कर मानकर झड़वाने के लिए बाबाओं के पास पहुंच जाते हैं। कई बार तो लकवा और तेज बुखार न उतरने पर भी दवा से पहले झाड़फूंक कराते हैं। इससे कई मामलों में जान तक चली जाती है।
-डॉ. रामजी सोनी, वरिष्ठ फिजिशियन, जिला अस्पताल
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सिजोफ्रेनिया के केस में तो अक्सर ही लोग झाड़फूंक के चक्कर में पड़ जाते हैं। उन्हें लगता है कि किसी ऊपरी हवा ने जकड़ लिया है। इसलिए उनका मरीज उल्टी-सीधी बातें कर रहा है। जो कि सिजोफ्रेनिया के मरीज के लक्षण होते हैं। अक्सर काउंसलिंग के दौरान लोगों को बताया जाता है कि बीमार व्यक्ति को झाड़फूंक नहीं बल्कि सही समय पर दवा की जरूरत होती है।
-डॉ. स्तुति, मानसिक रोग विशेषज्ञ
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अंधविश्वास में यहां अभी भी एक बड़ी आबादी सांप के डसने, पीलिया होने, टाइफायड, मिर्गी, बुखार में दौरे और निमोनिया जैसी बीमारी में सीधे डॉक्टर के पास जाने के बजाय झाड़फूंक करा रहे हैं। इनकी झाड़फूंक यहीं खत्म नहीं होती, बेटे पैदा होने की चाहत में गर्भवती को कई तरह की बूटी और भभूत खिलाई जाती है। साथ ही ताबीज तो हर तीसरे-चौथे घर में मिल जाएंगे।
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आमतौर पर लोग इस पर विश्वास कर इसे पुरानी प्रथा के अनुसार इलाज करना मानते हैं, जबकि डॉक्टरों का कहना है कि मरीज को झाड़फूंक नहीं, सही समय पर सही इलाज की जरूरत होती है।
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केस-1
25 साल की एक युवती रात में उठकर घर से बाहर निकल जाती थी। वह बैठे-बैठे चीखने लगती थी। बताती थी कि कोई उसके पास आता है, उससे बातें करता है, उसे बाहर जाने को कहता है। घरवाले इसे प्रेत-बाधा समझकर तीन साल तक लड़की को बाबा और झाड़फूंक करने वाले के पास ले गए। उसकी हालत बिगड़ती जा रही थी। जिला अस्पताल जाने पर पता चला कि वह सिजोफ्रेनिया की शिकार है।
केस-2
दो बच्चों की मां को एक दिन घर में काम करते वक्त सांप ने डस लिया। पति और उसके घरवाले महिला को लेकर छह-सात घंटे तक इधर-उधर झाड़फूंक कराते रहे, लेकिन, जब वह मरणासन्न हो गई, तो उसे लेकर जिला अस्पताल पहुंचे। वहां डॉक्टरों ने महिला को मृत बता दिया, जबकि परिजन डॉक्टरों से उसे बचा लेने की गुहार लगाते रहे।
केस-3
35 साल के एक युवा को पीलिया हो गया था। बीमारी समझ में आते ही परिजन अपने बेटे को झाड़फूंक कराने के लिए कई जगह ले गए। जहां पीलिया की झाड़फूंक करने वालों ने उसे धागा बांधकर गले में जड़ी-बूटी की कई मालाएं पहनाईं। डेढ़ महीने तक वह लोग झाड़फूंक कराते रहे। हालत बिगड़ गई तो उसे जिला अस्पताल में भर्ती कराया।
विशेषज्ञों का कहना
यहां बच्चों को दौरे पड़ने पर, टाइफायड होने और सांप के डसने पर लोग पहले झाड़फूंक कराते हैं। पीलिया होने पर भी कई दिनों तक पीलिया झड़वाते रहते हैं, जबकि झाड़फूंक से अक्सर बच्चों की हालत बिगड़ जाती है। इससे इलाज में भी देरी होती है। अक्सर समझाने पर भी परिजन नहीं मानते हैं।
-डॉ. अभिषेक, बाल रोग विशेषज्ञ
सांप के डसने पर अधिकांश परिवार सबसे पहले झाड़फूंक कराने दौड़ते हैं। इसके अलावा र्मिगी, साइकोसिस (मनोविक्षिप्त) और बार-बार बेहोश हो जाना व उल्टी-सीधी बातें करने के केस में इसे ऊपरी चक्कर मानकर झड़वाने के लिए बाबाओं के पास पहुंच जाते हैं। कई बार तो लकवा और तेज बुखार न उतरने पर भी दवा से पहले झाड़फूंक कराते हैं। इससे कई मामलों में जान तक चली जाती है।
-डॉ. रामजी सोनी, वरिष्ठ फिजिशियन, जिला अस्पताल
सिजोफ्रेनिया के केस में तो अक्सर ही लोग झाड़फूंक के चक्कर में पड़ जाते हैं। उन्हें लगता है कि किसी ऊपरी हवा ने जकड़ लिया है। इसलिए उनका मरीज उल्टी-सीधी बातें कर रहा है। जो कि सिजोफ्रेनिया के मरीज के लक्षण होते हैं। अक्सर काउंसलिंग के दौरान लोगों को बताया जाता है कि बीमार व्यक्ति को झाड़फूंक नहीं बल्कि सही समय पर दवा की जरूरत होती है।
-डॉ. स्तुति, मानसिक रोग विशेषज्ञ