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Basti News: कस्बों व ग्रामीण क्षेत्रों में सबसे अधिक खप रही जेनेरिक दवाएं
Sat, 10 Aug 2024 05:37 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बस्ती
संवाद न्यूज एजेंसी, बस्ती
Updated Sat, 10 Aug 2024 05:37 AM IST
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- मेडिकल स्टोर से ज्यादातर लोग सामान्य मर्ज की दवा की करते हैं खरीदारी
- 80 प्रतिशत तक सस्ती दवाओं का पूरा दाम लेकर बेच रहे धंधेबाज
संवाद न्यूज एजेंसी
बस्ती। जेनेरिक दवाओं के नाम पर सबसे ज्यादा घालमेल ग्रामीण क्षेत्र व कस्बों में चल रहा है। वहां ज्यादातर लोग सामान्य बीमारी जैसे बुखार, खांसी-जुकाम, फोड़े-फुंसी, पेट दर्द, उल्टी-दस्त आदि की दवा किसी भी केमिस्ट से ले लेते हैं। कई बार झोलाछाप से भी इस तरह की दवा लेने से लोग नहीं हिचकते। जानकार बताते हैं कि पढ़े-लिखे लोगों को भी सस्ते दाम वाली जेनरिक दवा स्टोर वाला पकड़ा कर एमआरपी के हिसाब से दाम वसूल लेता है, जबकि वह दवा 80 प्रतिशत तक सस्ती होती है। इसे इस तरह भी समझा जा सकता है कि दवा के पत्ते पर लिखे मूल्य के हिसाब से खुराक तीस रुपये का पड़ रहा है लेकिन असल में उस खुराक की कीमत बमुश्किल 10 रुपये होती है।
दवा के बाजार में एक से बड़े एक खेल हो रहे हैं। सरकार ने सस्ते दाम पर दवाएं उपलब्ध कराने की पहल की तो बड़ी कंपनियों ने ब्रांडेड के साथ ही जेनेरिक दवाएं भी बाजार में उतार दीं, लेकिन इसका फायदा मरीजों को कम धंधेबाजों को ज्यादा हो रहा है। धंधेबाज जेनेरिक को ही ब्रांडेड बताकर मरीजों को ऊंचे दाम पर बेच दे रहे हैं। मिलते-जुलते नाम और निगरानी नहीं होने से धंधेबाज चांदी काट रहे हैं तो मरीज ठगे जा रहे हैं।
जेनेरिक और ब्रांडेड के खेल में जानकारों को भी धंधेबाज चूना लगाने से नहीं चूकते। असल में यह घालमेल इतने बड़े पैमाने पर होता है कि जो दवा के व्यवसाय की बारीकी समझता है वही इस खेल को समझ पाता है। आसानी से समझने के लिए पूरे स्ट्रक्चर को समझना पड़ेगा। आम आदमी को मर्ज से छुटकारा मिलने से मतलब है। वह कीमत पर ज्यादा ध्यान नहीं देता, इसलिए चालाक केमिस्ट ब्रांडेड कंपनियों की जेनेरिक दवाओं को देकर ब्रांडेड की कीमत आसानी से वसूल रहे हैं।
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क्या है यह खेल
असल में ब्रांडेड दवाओं की एमआरपी में उसके मार्केटिंग, स्टाकिस्ट कमीशन, अन्य कमीशन, ट्रांस्पोटेशन और टैक्स जुड़े होते हैं, जबकि जेनेरिक दवा में इसमें से कई खर्चे बच जाते हैं। जैसे मार्केटिंग, कमीशन के अलावा टैक्स में भी कई तरह के छूट होते हैं। जिससे जेनेरिक दवा की लागत कम आती है। जो दवा ब्रांडेड में 10 रुपये की गोली है वह जेनेरिक में दो रुपये में मिल सकती है। केमिस्ट बताते हैं कि दोनों दवाओं के साल्ट में कोई फर्क नहीं पड़ता। सिर्फ सस्ते और महंगे का खेल है।
सस्ती दवा का मंसूबा फेल
सेवानिवृत्त फार्मासिस्ट लोगों को सस्ती दवा उपलब्ध हो सके इसलिए जेनेरिक दवाओं का कॉन्सेप्ट बाजार में उतारा गया है। जिस दवा को ब्रांडेड कंपनियां पांच गुना ज्यादा कीमत वसूल रही हैं, उन्हें सस्ते दाम पर लोगों को मुहैया कराने के लिए जेनेरिक फाॅर्मूला लाया गया। इसमें खामी यह है कि एमआरपी लिखने पर कोई अंकुश नहीं है। अगर लागत के हिसाब से एमआरपी लिखी जाए तो यह घालमेल रुक सकता है।
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- 80 प्रतिशत तक सस्ती दवाओं का पूरा दाम लेकर बेच रहे धंधेबाज
संवाद न्यूज एजेंसी
बस्ती। जेनेरिक दवाओं के नाम पर सबसे ज्यादा घालमेल ग्रामीण क्षेत्र व कस्बों में चल रहा है। वहां ज्यादातर लोग सामान्य बीमारी जैसे बुखार, खांसी-जुकाम, फोड़े-फुंसी, पेट दर्द, उल्टी-दस्त आदि की दवा किसी भी केमिस्ट से ले लेते हैं। कई बार झोलाछाप से भी इस तरह की दवा लेने से लोग नहीं हिचकते। जानकार बताते हैं कि पढ़े-लिखे लोगों को भी सस्ते दाम वाली जेनरिक दवा स्टोर वाला पकड़ा कर एमआरपी के हिसाब से दाम वसूल लेता है, जबकि वह दवा 80 प्रतिशत तक सस्ती होती है। इसे इस तरह भी समझा जा सकता है कि दवा के पत्ते पर लिखे मूल्य के हिसाब से खुराक तीस रुपये का पड़ रहा है लेकिन असल में उस खुराक की कीमत बमुश्किल 10 रुपये होती है।
दवा के बाजार में एक से बड़े एक खेल हो रहे हैं। सरकार ने सस्ते दाम पर दवाएं उपलब्ध कराने की पहल की तो बड़ी कंपनियों ने ब्रांडेड के साथ ही जेनेरिक दवाएं भी बाजार में उतार दीं, लेकिन इसका फायदा मरीजों को कम धंधेबाजों को ज्यादा हो रहा है। धंधेबाज जेनेरिक को ही ब्रांडेड बताकर मरीजों को ऊंचे दाम पर बेच दे रहे हैं। मिलते-जुलते नाम और निगरानी नहीं होने से धंधेबाज चांदी काट रहे हैं तो मरीज ठगे जा रहे हैं।
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जेनेरिक और ब्रांडेड के खेल में जानकारों को भी धंधेबाज चूना लगाने से नहीं चूकते। असल में यह घालमेल इतने बड़े पैमाने पर होता है कि जो दवा के व्यवसाय की बारीकी समझता है वही इस खेल को समझ पाता है। आसानी से समझने के लिए पूरे स्ट्रक्चर को समझना पड़ेगा। आम आदमी को मर्ज से छुटकारा मिलने से मतलब है। वह कीमत पर ज्यादा ध्यान नहीं देता, इसलिए चालाक केमिस्ट ब्रांडेड कंपनियों की जेनेरिक दवाओं को देकर ब्रांडेड की कीमत आसानी से वसूल रहे हैं।
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क्या है यह खेल
असल में ब्रांडेड दवाओं की एमआरपी में उसके मार्केटिंग, स्टाकिस्ट कमीशन, अन्य कमीशन, ट्रांस्पोटेशन और टैक्स जुड़े होते हैं, जबकि जेनेरिक दवा में इसमें से कई खर्चे बच जाते हैं। जैसे मार्केटिंग, कमीशन के अलावा टैक्स में भी कई तरह के छूट होते हैं। जिससे जेनेरिक दवा की लागत कम आती है। जो दवा ब्रांडेड में 10 रुपये की गोली है वह जेनेरिक में दो रुपये में मिल सकती है। केमिस्ट बताते हैं कि दोनों दवाओं के साल्ट में कोई फर्क नहीं पड़ता। सिर्फ सस्ते और महंगे का खेल है।
सस्ती दवा का मंसूबा फेल
सेवानिवृत्त फार्मासिस्ट लोगों को सस्ती दवा उपलब्ध हो सके इसलिए जेनेरिक दवाओं का कॉन्सेप्ट बाजार में उतारा गया है। जिस दवा को ब्रांडेड कंपनियां पांच गुना ज्यादा कीमत वसूल रही हैं, उन्हें सस्ते दाम पर लोगों को मुहैया कराने के लिए जेनेरिक फाॅर्मूला लाया गया। इसमें खामी यह है कि एमआरपी लिखने पर कोई अंकुश नहीं है। अगर लागत के हिसाब से एमआरपी लिखी जाए तो यह घालमेल रुक सकता है।