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ढूंढे नहीं मिल रहे ईको फ्रेंडली पटाखे
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ग्रीन वैली के बच्चों ने दीया बनाकर लगाया स्टाल।
- फोटो : BASTI
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ढूंढे नहीं मिल रहे ईको फ्रेंडली पटाखे
बस्ती। ग्रीन दीपावली की खूबियों से वाकिफ गांधीनगर के राहुल टंडन ने तय किया था कि इस बार सेहत को नुकसान पहुंचाने वाली आतिशबाजी से तौबा कर लेंगे। मगर बुधवार को पटाखा मार्केट में ग्रीन पटाखा ढूंढ-ढूंढकर थक गए तो हर्बल दीपावली मनाने का उत्साह काफूर हो गया।
उनकी तरह सरस्वती बालिका विद्यालय रामबाग की छात्रा काव्या ने भाई और पापा के साथ बाजार के कई चक्कर लगा लिए, लेकिन ग्रीन पटाखे नहीं मिले। मजबूरी मेें दोनों को फुलझड़ी, सुतली बम और चुटपुटिया से संतोष करना पड़ा। नरेंद्र देव कृषि विश्वविद्यालय कुमारगंज फैजाबाद के मौसम विज्ञानी डॉ. अमरनाथ मिश्र के मुताबिक पर्यावरण के प्रति चिंता वाजिब है, लेकिन बाजार अभी तैयार नहीं है। ऐसे तमाम लोगों ने दीपावली पर कार्बन और अन्य हानिकारक रासायनों वाले पटाखों को न इस्तेमाल करने का प्रण किया था, मगर बाजार में इसके लिए तैयार नहीं दिखता।
शहर से गांव व कस्बों तक में एक हजार से ज्यादा पटाखे की दुकानें लगी हैं, लेकिन, हर्बल पार्क ग्रीन पटाखों की उपलब्धता न के बराबर है। बुधवार को कई लोग बाजार में इसके लिए भटकते दिखे। जानकारों का कहना है कि ग्रीन दीपावली के लिए अभी बाजार तैयार नहीं है। कहा जा रहा था कि पटाखा बाजार में ईको फ्रेंडली पटाखों की काफी वैरायटी आई है, जिसमें ईको फ्रेंडली रॉकेट से लेकर अनार, फुलझड़ी, स्काई शॉट्स समेत बच्चों के लिए खास ईको फ्रेंडली दिवाली पटाखा पैक्स के ऑप्शन भी मौजूद हैं, लेकिन इसे पसंद करने वालों को मायूसी हाथ लगी।
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क्या हैं ईको फ्रेंडली पटाखे
राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (नीरी) ने ग्रीन पटाखे की खोज सामान्य पटाखों से भारी मात्रा में निकलने वाली नाइट्रोजन और सल्फर गैस की मात्रा कम करने के लिए किया था। शोध में पाया गया कि 40 से 60 प्रतिशत तक हानिकारक गैस कम निकलेगी। ग्रीन पटाखों में खास फॉर्मूले से पटाखे जलने के बाद हानिकारक गैस पानी बनकर घुल जाएगी। पटाखे जलने के बाद पानी के कण पैदा करते हैं। इसमें सल्फर और नाइट्रोजन के कण घुल जाएंगे। सल्फर और नाइट्रोजन कम पैदा करने वाले स्टार या सेफ थर्माइट क्रैकर नाम दिया गया है। इसमें ऑक्सीडाइजिंग एजेंट के उपयोग होने से जलने के बाद सल्फर और नाइट्रोजन कम मात्रा में पैदा होते हैं। इसके लिए खास तरह के केमिकल का इस्तेमाल होता है। कम एल्यूमीनियम का इस्तेमाल वाला सेफ मिनिमम एल्यूमीनियम (सफल) पटाखे और अरोमा क्रैकर्स के जलाने से बारूद की गंध नहीं, इत्र की खुशबू बिखरते हैं।
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बस्ती। ग्रीन दीपावली की खूबियों से वाकिफ गांधीनगर के राहुल टंडन ने तय किया था कि इस बार सेहत को नुकसान पहुंचाने वाली आतिशबाजी से तौबा कर लेंगे। मगर बुधवार को पटाखा मार्केट में ग्रीन पटाखा ढूंढ-ढूंढकर थक गए तो हर्बल दीपावली मनाने का उत्साह काफूर हो गया।
उनकी तरह सरस्वती बालिका विद्यालय रामबाग की छात्रा काव्या ने भाई और पापा के साथ बाजार के कई चक्कर लगा लिए, लेकिन ग्रीन पटाखे नहीं मिले। मजबूरी मेें दोनों को फुलझड़ी, सुतली बम और चुटपुटिया से संतोष करना पड़ा। नरेंद्र देव कृषि विश्वविद्यालय कुमारगंज फैजाबाद के मौसम विज्ञानी डॉ. अमरनाथ मिश्र के मुताबिक पर्यावरण के प्रति चिंता वाजिब है, लेकिन बाजार अभी तैयार नहीं है। ऐसे तमाम लोगों ने दीपावली पर कार्बन और अन्य हानिकारक रासायनों वाले पटाखों को न इस्तेमाल करने का प्रण किया था, मगर बाजार में इसके लिए तैयार नहीं दिखता।
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शहर से गांव व कस्बों तक में एक हजार से ज्यादा पटाखे की दुकानें लगी हैं, लेकिन, हर्बल पार्क ग्रीन पटाखों की उपलब्धता न के बराबर है। बुधवार को कई लोग बाजार में इसके लिए भटकते दिखे। जानकारों का कहना है कि ग्रीन दीपावली के लिए अभी बाजार तैयार नहीं है। कहा जा रहा था कि पटाखा बाजार में ईको फ्रेंडली पटाखों की काफी वैरायटी आई है, जिसमें ईको फ्रेंडली रॉकेट से लेकर अनार, फुलझड़ी, स्काई शॉट्स समेत बच्चों के लिए खास ईको फ्रेंडली दिवाली पटाखा पैक्स के ऑप्शन भी मौजूद हैं, लेकिन इसे पसंद करने वालों को मायूसी हाथ लगी।
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क्या हैं ईको फ्रेंडली पटाखे
राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (नीरी) ने ग्रीन पटाखे की खोज सामान्य पटाखों से भारी मात्रा में निकलने वाली नाइट्रोजन और सल्फर गैस की मात्रा कम करने के लिए किया था। शोध में पाया गया कि 40 से 60 प्रतिशत तक हानिकारक गैस कम निकलेगी। ग्रीन पटाखों में खास फॉर्मूले से पटाखे जलने के बाद हानिकारक गैस पानी बनकर घुल जाएगी। पटाखे जलने के बाद पानी के कण पैदा करते हैं। इसमें सल्फर और नाइट्रोजन के कण घुल जाएंगे। सल्फर और नाइट्रोजन कम पैदा करने वाले स्टार या सेफ थर्माइट क्रैकर नाम दिया गया है। इसमें ऑक्सीडाइजिंग एजेंट के उपयोग होने से जलने के बाद सल्फर और नाइट्रोजन कम मात्रा में पैदा होते हैं। इसके लिए खास तरह के केमिकल का इस्तेमाल होता है। कम एल्यूमीनियम का इस्तेमाल वाला सेफ मिनिमम एल्यूमीनियम (सफल) पटाखे और अरोमा क्रैकर्स के जलाने से बारूद की गंध नहीं, इत्र की खुशबू बिखरते हैं।