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Basti News: हिरणों को भाए बस्ती के जंगल...प्राकृतिक वास मिला तो बढ़ गया कुनबा
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नगर क्षेत्र के बसहवा गांव के सिवान में टहलता हिरण संवाद
बस्ती। छोटे-छोटे जंगल, घनी घास, पर्याप्त जलस्रोत और सुरक्षित वातावरण ने बस्ती के जंगलों को हिरणों के लिए प्राकृतिक आवास बना दिया है। यही वजह है कि जिले में वर्षों से हिरणों की संख्या लगातार बढ़ रही है।
वन विभाग के अनुसार, जिले की चारों वन रेंज में हिरणों की विभिन्न प्रजातियां पाई जा रही हैं, जबकि रामनगर और सदर रेंज के रिजर्व फॉरेस्ट इनका सबसे बड़ा ठिकाना बन चुके हैं।
हिरणों के लिए खुले घास के मैदान, झाड़ियां, पेड़-पौधों की पर्याप्त मौजूदगी और पास में जलस्रोत सबसे जरूरी होते हैं। जब किसी क्षेत्र में लंबे समय तक अनुकूल वातावरण और सुरक्षा मिलती है, तभी हिरण वहां प्रजनन (ब्रीडिंग) करते हैं और उनका कुनबा तेजी से बढ़ने लगता है। बस्ती के जंगल इन सभी प्राकृतिक जरूरतों को पूरा करते हैं। यहां पर्याप्त मात्रा में घास और पत्तियां भोजन के रूप में उपलब्ध हैं, जबकि छोटे जंगल और झाड़ियां नवजात शावकों को छिपने का सुरक्षित स्थान देती हैं।
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जिले में बाघ या तेंदुए जैसे बड़े शिकारी वन्यजीवों की अनुपस्थिति भी हिरणों के लिए अनुकूल साबित हुई है। साथ ही लोग शिकार नहीं करते और यदि कहीं हिरण घायल मिलता है तो तुरंत वन विभाग को सूचना देते हैं। भारत वन स्थिति रिपोर्ट 2023 के अनुसार जिले का ट्री कवर भी 0.25 प्रतिशत बढ़ा है।
दरअसल, दो दशक पूर्व जिले के वन्य क्षेत्रों में हिरणों का नामोनिशान नहीं था। वर्ष 2007 की वन्यजीव गणना में पहली बार चीतल प्रजाति के 39 हिरण जिले के वन्य क्षेत्र में पाए गए। तीन वर्षों में इनकी आबादी तेजी से बढ़ी और 2010-11 की गणना में चीतल हिरणों की संख्या 104 तक पहुंच गई। इसके बाद हिरणों की आबादी लगातार बढ़ती रही।
इन क्षेत्रों में अधिक पाए जाते हैं हिरण : सरयू नदी के किनारे दुबौलिया, कलवारी, विक्रमजोत, कुआनो नदी के किनारे गनेशपुर, बंधुआ, डमरुआ जंगल, सिक्टा, अंधेड़ी, बाघाकांडर, मिश्रौलिया, गौरा घाट, डड़वारे, बैजीपुरवा, अजगैवा जंगल, शिवाघाट, महदेवा, अटरा, बारहछत्तर, मनोरा नदी के किनारे, नाऊडाड़, निरंजनपुर, सोंधिया घाट, रवई नदी के किनारे बसहवा, मरहा, कोईलपुरा, चितरगड़िया, रैकवार, कटरा बुजुर्ग आदि क्षेत्रों में हिरण अधिक देखे जा रहे हैं।
नदी किनारे का इलाका उन्हें विशेष रूप से भाता है। ये वन क्षेत्रों के साथ-साथ गन्ना, गेहूं और धान के खेतों में भी विचरण करते हैं।
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वन विभाग के अनुसार, जिले की चारों वन रेंज में हिरणों की विभिन्न प्रजातियां पाई जा रही हैं, जबकि रामनगर और सदर रेंज के रिजर्व फॉरेस्ट इनका सबसे बड़ा ठिकाना बन चुके हैं।
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हिरणों के लिए खुले घास के मैदान, झाड़ियां, पेड़-पौधों की पर्याप्त मौजूदगी और पास में जलस्रोत सबसे जरूरी होते हैं। जब किसी क्षेत्र में लंबे समय तक अनुकूल वातावरण और सुरक्षा मिलती है, तभी हिरण वहां प्रजनन (ब्रीडिंग) करते हैं और उनका कुनबा तेजी से बढ़ने लगता है। बस्ती के जंगल इन सभी प्राकृतिक जरूरतों को पूरा करते हैं। यहां पर्याप्त मात्रा में घास और पत्तियां भोजन के रूप में उपलब्ध हैं, जबकि छोटे जंगल और झाड़ियां नवजात शावकों को छिपने का सुरक्षित स्थान देती हैं।
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जिले में बाघ या तेंदुए जैसे बड़े शिकारी वन्यजीवों की अनुपस्थिति भी हिरणों के लिए अनुकूल साबित हुई है। साथ ही लोग शिकार नहीं करते और यदि कहीं हिरण घायल मिलता है तो तुरंत वन विभाग को सूचना देते हैं। भारत वन स्थिति रिपोर्ट 2023 के अनुसार जिले का ट्री कवर भी 0.25 प्रतिशत बढ़ा है।
दरअसल, दो दशक पूर्व जिले के वन्य क्षेत्रों में हिरणों का नामोनिशान नहीं था। वर्ष 2007 की वन्यजीव गणना में पहली बार चीतल प्रजाति के 39 हिरण जिले के वन्य क्षेत्र में पाए गए। तीन वर्षों में इनकी आबादी तेजी से बढ़ी और 2010-11 की गणना में चीतल हिरणों की संख्या 104 तक पहुंच गई। इसके बाद हिरणों की आबादी लगातार बढ़ती रही।
इन क्षेत्रों में अधिक पाए जाते हैं हिरण : सरयू नदी के किनारे दुबौलिया, कलवारी, विक्रमजोत, कुआनो नदी के किनारे गनेशपुर, बंधुआ, डमरुआ जंगल, सिक्टा, अंधेड़ी, बाघाकांडर, मिश्रौलिया, गौरा घाट, डड़वारे, बैजीपुरवा, अजगैवा जंगल, शिवाघाट, महदेवा, अटरा, बारहछत्तर, मनोरा नदी के किनारे, नाऊडाड़, निरंजनपुर, सोंधिया घाट, रवई नदी के किनारे बसहवा, मरहा, कोईलपुरा, चितरगड़िया, रैकवार, कटरा बुजुर्ग आदि क्षेत्रों में हिरण अधिक देखे जा रहे हैं।
नदी किनारे का इलाका उन्हें विशेष रूप से भाता है। ये वन क्षेत्रों के साथ-साथ गन्ना, गेहूं और धान के खेतों में भी विचरण करते हैं।