{"_id":"61914217711cca0e6d0005a6","slug":"cut-poverty-from-cabar-basti-news-gkp4163368175","type":"story","status":"publish","title_hn":"कबाड़ से काटी मुफलिसी की धार, चल पड़ी जिंदगी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
कबाड़ से काटी मुफलिसी की धार, चल पड़ी जिंदगी
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
कबाड़ से काटी मुफलिसी की धार, चल पड़ी जिंदगी
- मो. अकरम ने मजदूरी से पाई-पाई जोड़ कर कबाड़ से तैयार की चाकू-कैंची पर धार देने वाली मशीन
- बाजार में मशीन की कीमत सात से आठ हजार रुपये है, महज पंद्रह सौ रुपये में तैयार किया मशीन
नगर बाजार (बस्ती)। गरीबी और जरूरत जिदंगी को बसर करने के रास्ते भी सुझाती है। कलवारी क्षेत्र के खम्हरिया गांव निवासी मो. अकरम ऐसे ही लोगों में से एक हैं, जो कबाड़ से मुफलिसी की धार को काट रहे हैं। पाई-पाई जोड़कर चाकू और कैंची पर धार देने वाली मशीन तैयार की। जिससे जिंदगी का पहिया भी आसानी से चल पड़ा।
मो. अकरम के पिता रहमत अली का साया बचपन में ही उनके सिर से उठ गया था। पिता के असमय चले जाने के बाद मुफलिसी ने घेर लिया। इसी बीच उनकी शादी हो गई। मेहनत-मजदूरी कर घर का खर्च चलाने के दौरान ही मां बैतुन्निशा का भी करीब पंद्रह साल पहले इंतकाल हो गया। अब घर की पूरी जिम्मेदारी अकरम पर थी। बताते हैं कि घर चलाने के लिए ठेला तक चलाया। गांव-गांव जाकर लोगों के घरों पर मजदूरी की, लेकिन इस कमाई से परिवार का खर्च चलाना मुश्किल हो रहा था। इसी दौरान गांव में साइकिल से चाकू व कैंची पर धार देने वाले व्यक्ति को देखा, जो लोगों से 15 से 20 रुपये लेकर धार रखने का काम करता था। उसी दिन तय किया कि वह भी यही मशीन खरीदकर चाकू-कैंची पर धार रखने का काम करेंगे, लेकिन उनके पास इतने पैसे नहीं थे कि नई मशीन खरीद सकें। किसी के सामने हाथ फैलाने के बजाय मजदूरी कर थोड़ा-थोड़ा पैसा इकट्ठा कर कबाड़ की दुकान से साइकिल का पुराना चैन व पैडल खरीदा, फिर कुछ दिन और मजदूरी कर लोहे का पुराना एंगल खरीद कर मशीन तैयार कर ली, लेकिन धार लगाने वाले पत्थर के लिए पांच सौ रुपये की जरूरत थी। पत्थर लाने के लिए दो दिन मजदूरी कर किसी तरह से रुपये जुटाकर पत्थर खरीदा तो मशीन तैयार हो गई। कहते हैं कि सात से आठ हजार रुपये की आने वाली मशीन महज पंद्रह सौ रुपये में तैयार हो गई। इसे बनाने में कुल बीस दिन लगे। कहते हैं कि रहने के लिए आवास तक नहीं है। पांच बच्चों के साथ टूटे-फूटे छप्पर में रहते हैं। आवास के नाम पर पिछले कई वर्षों से सिर्फ आश्वासन ही मिल रहा है। अकरम कहते हैं कि अब उन्होंने गोविंदापुर गांव के बाहर प्लास्टिक की पन्नी तानकर उसी में दुकान लगा ली है। जहां आने-जाने वाले लोग कैंची, चाकू की धार तेज करवाते हैं।
विज्ञापन
- मो. अकरम ने मजदूरी से पाई-पाई जोड़ कर कबाड़ से तैयार की चाकू-कैंची पर धार देने वाली मशीन
- बाजार में मशीन की कीमत सात से आठ हजार रुपये है, महज पंद्रह सौ रुपये में तैयार किया मशीन
नगर बाजार (बस्ती)। गरीबी और जरूरत जिदंगी को बसर करने के रास्ते भी सुझाती है। कलवारी क्षेत्र के खम्हरिया गांव निवासी मो. अकरम ऐसे ही लोगों में से एक हैं, जो कबाड़ से मुफलिसी की धार को काट रहे हैं। पाई-पाई जोड़कर चाकू और कैंची पर धार देने वाली मशीन तैयार की। जिससे जिंदगी का पहिया भी आसानी से चल पड़ा।
मो. अकरम के पिता रहमत अली का साया बचपन में ही उनके सिर से उठ गया था। पिता के असमय चले जाने के बाद मुफलिसी ने घेर लिया। इसी बीच उनकी शादी हो गई। मेहनत-मजदूरी कर घर का खर्च चलाने के दौरान ही मां बैतुन्निशा का भी करीब पंद्रह साल पहले इंतकाल हो गया। अब घर की पूरी जिम्मेदारी अकरम पर थी। बताते हैं कि घर चलाने के लिए ठेला तक चलाया। गांव-गांव जाकर लोगों के घरों पर मजदूरी की, लेकिन इस कमाई से परिवार का खर्च चलाना मुश्किल हो रहा था। इसी दौरान गांव में साइकिल से चाकू व कैंची पर धार देने वाले व्यक्ति को देखा, जो लोगों से 15 से 20 रुपये लेकर धार रखने का काम करता था। उसी दिन तय किया कि वह भी यही मशीन खरीदकर चाकू-कैंची पर धार रखने का काम करेंगे, लेकिन उनके पास इतने पैसे नहीं थे कि नई मशीन खरीद सकें। किसी के सामने हाथ फैलाने के बजाय मजदूरी कर थोड़ा-थोड़ा पैसा इकट्ठा कर कबाड़ की दुकान से साइकिल का पुराना चैन व पैडल खरीदा, फिर कुछ दिन और मजदूरी कर लोहे का पुराना एंगल खरीद कर मशीन तैयार कर ली, लेकिन धार लगाने वाले पत्थर के लिए पांच सौ रुपये की जरूरत थी। पत्थर लाने के लिए दो दिन मजदूरी कर किसी तरह से रुपये जुटाकर पत्थर खरीदा तो मशीन तैयार हो गई। कहते हैं कि सात से आठ हजार रुपये की आने वाली मशीन महज पंद्रह सौ रुपये में तैयार हो गई। इसे बनाने में कुल बीस दिन लगे। कहते हैं कि रहने के लिए आवास तक नहीं है। पांच बच्चों के साथ टूटे-फूटे छप्पर में रहते हैं। आवास के नाम पर पिछले कई वर्षों से सिर्फ आश्वासन ही मिल रहा है। अकरम कहते हैं कि अब उन्होंने गोविंदापुर गांव के बाहर प्लास्टिक की पन्नी तानकर उसी में दुकान लगा ली है। जहां आने-जाने वाले लोग कैंची, चाकू की धार तेज करवाते हैं।
विज्ञापन