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उधार के अफसर से जेल की चौकसी
Updated Sun, 09 Sep 2018 11:54 PM IST
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उधार के अफसर से जेल की चौकसी
अवकाश देने को देवरिया के डिप्टी जेलर कर रहे ड्यूटी
क्षमता से तीन गुना बंदियों को व्यवस्थित करने की चुनौती
अमर उजाला ब्यूरो
बस्ती। कारागार की बैरक में बैठकर फिरौती-रंगदारी ही नहीं स्पूफिंग जैसे हाईटेक क्राइम करने वाले बंदी जेल प्रशासन की नींद हराम किए हैं। भाटी जैसे पश्चिम के कुख्यात गैगस्टरों को काबू रखना नाकों चने चबाने जैसा है, बावजूद इसके उधार के अफसरों से जेल की निगहबानी करानी पड़ रही है। मौजूदा समय में एक डिप्टी जेलर को अवकाश देने के लिए देवरिया जेल से भेजे गए। ऐसे में सवाल यह है कि प्रदेश की सबसे संवेदनशील मानी जाने वाली इस जेल की व्यवस्था यदि उधार के भरोसे है तो वहां शांति कायम करने की तरकीब कैसे कामयाब होगी ?
480 बंदियों को रखने की क्षमता वाले कारागार में सदैव ओवरक्राउडिंग रही। अलग संतकबीरनगर जिला बनने के बावजूद वहां के बंदी भी यहीं रखे जाते हैं। इससे कभी भी क्षमता के हिसाब से बंदियों की तादाद नहीं रखी जा सकी। हालांकि, 2012 तक गनीमत रही कि यह संख्या दो गुना यानी हजार के आसपास ही रही। लेकिन हाल के कुछ वर्षों में संख्या 1200 को भी पार कर गई। इसके कारण न केवल बुनियादी जरूरत, बल्कि पेशी, इलाज आदि के लिए भी मुसीबत ही मुसीबत है। जेल अधीक्षक संतलाल यादव का कहना है कि जब तक संतकबीरनगर में बन रही जेल तैयार न हो जाए और वहां के बंदी उसमें शिफ्ट न हों तब तक पुख्ता व्यवस्था मुश्किल है।
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अवकाश देने को देवरिया के डिप्टी जेलर कर रहे ड्यूटी
क्षमता से तीन गुना बंदियों को व्यवस्थित करने की चुनौती
अमर उजाला ब्यूरो
बस्ती। कारागार की बैरक में बैठकर फिरौती-रंगदारी ही नहीं स्पूफिंग जैसे हाईटेक क्राइम करने वाले बंदी जेल प्रशासन की नींद हराम किए हैं। भाटी जैसे पश्चिम के कुख्यात गैगस्टरों को काबू रखना नाकों चने चबाने जैसा है, बावजूद इसके उधार के अफसरों से जेल की निगहबानी करानी पड़ रही है। मौजूदा समय में एक डिप्टी जेलर को अवकाश देने के लिए देवरिया जेल से भेजे गए। ऐसे में सवाल यह है कि प्रदेश की सबसे संवेदनशील मानी जाने वाली इस जेल की व्यवस्था यदि उधार के भरोसे है तो वहां शांति कायम करने की तरकीब कैसे कामयाब होगी ?
480 बंदियों को रखने की क्षमता वाले कारागार में सदैव ओवरक्राउडिंग रही। अलग संतकबीरनगर जिला बनने के बावजूद वहां के बंदी भी यहीं रखे जाते हैं। इससे कभी भी क्षमता के हिसाब से बंदियों की तादाद नहीं रखी जा सकी। हालांकि, 2012 तक गनीमत रही कि यह संख्या दो गुना यानी हजार के आसपास ही रही। लेकिन हाल के कुछ वर्षों में संख्या 1200 को भी पार कर गई। इसके कारण न केवल बुनियादी जरूरत, बल्कि पेशी, इलाज आदि के लिए भी मुसीबत ही मुसीबत है। जेल अधीक्षक संतलाल यादव का कहना है कि जब तक संतकबीरनगर में बन रही जेल तैयार न हो जाए और वहां के बंदी उसमें शिफ्ट न हों तब तक पुख्ता व्यवस्था मुश्किल है।
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