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नहाय-खाय से सूर्योपासना का महापर्व शुरू 

Tue, 24 Oct 2017 11:47 PM IST
basti
basti Updated Tue, 24 Oct 2017 11:47 PM IST
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chhath pooja start
छठ पूजा - फोटो : amar ujala
बस्ती। 
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सूर्य अराधना का महापर्व छठ का मंगलवार को नहाय-खाय के साथ श्रीगणेश हुआ। शहर के दक्षिणी छोर को छूकर बहने वाली कुआनो के अमहट तट पर छठ मैया की सैकड़ों बेदियां सजाई गई है। साफ-सफाई के अलावा प्रकाश, फर्स्ट एड जैसे इंतजाम किए जा रहे हैं। प्रशासन की तरफ से जरूरी तमाम इंतजाम किए जा रहे हैं। नदी में गहराई में कोई न पहुंचे, इसे रोकने के लिए बांस-बल्ली की बैरिकेडिंग की गई है।
चार दिवसीय उत्सव के प्रथम दिन मंगलवार को व्रती महिलाओं ने नहाय-खाय से व्रत का शुभारंभ किया। व्रतियों ने नहा-धोकर सात्विक भोजन ग्रहण करके व्रत का संकल्प लिया गया। चार दिन तक चलने वाले इस लोकपर्व में सूर्य को शक्ति प्रदान करने के मुख्य स्रोत उषा और प्रत्यूषा (सूर्य की पत्नियां) की सूर्य के साथ-साथ संयुक्त अराधना की जाती है। प्रात:काल में सूर्य की पहली किरण (उषा) और सायंकाल में सूर्य की अंतिम किरण (प्रत्यूषा) को अर्घ्य देकर व्रती महिलाएं वर मांगती हैं। मन में कामना रखती हैं कि जिस प्रकार से सूर्य के तेज से संसार आलोकित होता है, वैसे ही उनके पुत्र-पति की कीर्ति भी चारों ओर फैले।  
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आगे के तीन दिन के कार्यक्रम
खरना: इसमें व्रती महिलाएं आंशिक उपवास करती हैं। दिन में व्रत रहने के उपरांत शाम को धुले प्रसाद (खरना) करती हैं। किसी पवित्र धुले हुए स्थान पर चूल्हा स्थापित कर अक्षत, धूप, दीप व सिंदूर से पूजा की जाती है। तब प्रसाद के आटे से फुल्के तथा साठी की खीर बनाई जाती है। इसे रसियाव-रोटी भी कहा जाता है। यही रसियाव-रोटी खाने के बाद उनका छठ व्रत शुरू हो जाएगा जो प्रात:कालीन सूर्य को अर्घ्य देने के साथ पूर्ण होगा। रोटियां बनाने के बाद बचे हुए आटे से एक छोटी रोटी बनाकर रखेंगी। जिसे ओठगन कहते हैं। अंतिम दिन इसी रोटी से व्रत तोड़ने की परंपरा है।
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अग्रासन के बाद खरना का विधान 
खरना के पूर्व व्रती महिलाएं हथेली के आकार की बनी हुई तस्तरी में धूप देने के बाद थाली में परोसे हुए संपूर्ण सामान में से थोड़ा-थोड़ा लेकर डालती हैं। इसे अग्नि जिमाना कहते हैं। उसके बाद अग्रासन या गऊग्रास निकाल कर ही व्रती भोजन करती हैं। उनके भोजन के बाद परिवार के बाकी सदस्यों में प्रसाद वितरित होता है। इस प्रसाद का इतना महत्व है कि दूर-दराज के लोग भी इसे पाने के लिए आते हैं।


भिन्न अवसरों के अलग-अलग गीत  
इस लोकपर्व के विभिन्न अवसरों पर प्रसाद बनाते, खरना के समय, अर्घ्य देने जाते, अर्घ्य दान करते समय और घाट से घर लौटते समय के लिए अलग-अलग भक्ति-भाव से परिपूर्ण लोकगीत गाए जाते हैं। भाव प्रधान इन गीतों को सुनकर बरबस ही आध्यात्मिक ऊर्जा का एहसास होता है।  

 
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