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10 करोड़ खर्च फिर भी नहीं संवर पाया प्रवासी पक्षियों का ठिकाना
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10 करोड़ से भी नहीं संवरा प्रवासी पक्षियों का ठिकाना चंदो ताल
बस्ती। वन विभाग के कप्तानगंज रेंज में 730.85 हेक्टेयर में विस्तृत चंदो ताल प्रवासी पक्षियों का प्रमुख ठिकाना है। नेशनल वेटलैंड कंजर्वेशन प्रोग्राम के तहत चयनित यह चंदो ताल आज भी उपेक्षा का शिकार है। चंदो ताल के प्राकृतिक सौंदर्य को सहेजने और संवारने पर अब तक छिटपुट 10 करोड़ से अधिक की धनराशि खर्च हो चुकी है। लेकिन, प्रवासी पक्षियों के लिए इसे संवारने की योजना कागजों तक ही सिमट कर रह गई है।
शहर से 10 किलोमीटर दूर प्राचीन ताल चंदो ताल बदहाली का शिकार है। वन विभाग ने वर्ष 1997 में दो करोड़ खर्च कर इसे विकसित किया था। ताल से सटे स्थल को शहीद उदय प्रताप सिंह पक्षी विहार के रूप में स्थापित किया गया है। समय के साथ चंदो ताल का स्वरूप सिमटता गया। सिल्ट व जलकुंभी के चलते ताल की गहराई भी कम हो गई है। इस ताल को नेशनल वेटलैंड कंजर्वेशन प्रोग्राम के तहत चयनित कर उत्तर प्रदेश वन निगम ने भी इसके विकास पर दो करोड़ रुपये खर्च किए। इसके बाद भी ताल का समुचित विकास नहीं हो सका। चंदो ताल के अस्तित्व बचाने के लिए छिटपुट प्रयास किए गए। लेकिन, जलकुंभी व सिल्ट जस- की- तस ताल में जमी रही। विदेशी पक्षियों के कलरव से सुशोभित यह चंदो ताल उपेक्षा के चलते अपनी पहचान बनाए रखने के लिए आज भी संघर्ष कर रहा है। चंदो ताल, पक्षी विहार के विकास के लिए पिछले चार साल से प्रस्ताव शासन को भेजा जा रहा है, मगर अब तक उसे वित्तीय स्वीकृति नहीं मिल सकी है।
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ताल की रखवाली के तीन वाच टावर
चंदो ताल में पक्षियों का शिकार करने वालों पर नजर रखने के लिए तीन टावर बनवाए गए हैं। लेकिन इन पर किसी कर्मचारी की तैनाती न होने से शिकारियों के हौसले बुलंद रहते हैं। इस बार देशी-विदेशी पक्षियों की तादाद में काफी कमी दर्ज की गई। स्थानीय लोगों का कहना है कि हर वर्ष यह ताल सर्दी के मौसम में देशी विदेशी पक्षियों की चहचहाहट से गूंज उठता था, लेकिन इस बार ठंडक में विदेशी मेहमानों की संख्या प्रभावित रही।
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कौन सा पक्षी किस देश से आता है
रेड हेड कोचर्ड (लालसर) अफ्रीकी देशों से, पिक शीर्ष बत्तख श्रीलंका व म्यांमार से आते हैं। कूट पक्षी चीन और तिब्बत से आते हैं। रक्त शिखी कोचर्ड म्यांमार व श्रीलंका से और शिखी कोचर्ड श्रीलंका और बांग्लादेश से आते हैं। विजन, विस्लिंग डक श्रीलंका और म्यांमार से आते हैं जबकि मेलर्ड और गैंडाल पक्षी दक्षिण अफ्रीका से आते हैं। वहीं, पेल्किन पक्षी दक्षिण अफ्रीका व रेड क्रेस्टेड पोचर्ड पक्षी दक्षिण पूर्व साइबेरिया से आते हैं।
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पक्षी विहार में स्थापित की गई हैं वाटिकाएं
शहीद उदय प्रताप सिंह पक्षी विहार में विभिन्न वाटिकाएं स्थापित की गई हैं। इनमें नक्षत्र वाटिका, कुरानी वृक्ष वाटिका, तीर्थंकर वाटिका, बुद्ध वाटिका और हरिशंकर वाटिका शामिल हैं। इन वाटिकाओं में बरगद, पीपल, छितवन, साखू, चीड़, प्रियंगु, शिरीष, बहेड़ा, बेल, तेंदू, कदंब, कैथा, आम, अशोक, चंपा, मौलश्री, जंबू, देवदार, बांस, साल, खजूर, अंगूर, जैतून, अंजीर, पीलू, मेहंदी, बेरी, बबूल, पाकड़, आंवला सहित विभिन्न प्रकार के पेड़ पौधे शामिल हैं। वाटिकाओं में लगाए गए तमाम पौधे देखभाल के अभाव में सूख कर नष्ट हो गए हैं। क्यारियों में पौधों की सुरक्षा के लिए लगाए गए पिलर भी टूटे पड़े हैं।
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चंदो ताल पक्षी विहार के विकास और रखरखाव के इंतजाम के लिए कार्ययोजना बनाई गई है। इसके लिए केंद्र सरकार को साढ़े तीन करोड़ रुपये का प्रस्ताव भेजा गया है। कोविड-19 के चलते मामला लंबित हो गया था। मगर, अब नए सिरे से प्रयास शुरू हो गया है। धन मिलते ही कार्ययोजना पर काम शुरू करा दिया जाएगा।
नवीन कुमार शाक्य, प्रभागीय निदेशक सामाजिक वानिकी वन प्रभाग, बस्ती
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बस्ती। वन विभाग के कप्तानगंज रेंज में 730.85 हेक्टेयर में विस्तृत चंदो ताल प्रवासी पक्षियों का प्रमुख ठिकाना है। नेशनल वेटलैंड कंजर्वेशन प्रोग्राम के तहत चयनित यह चंदो ताल आज भी उपेक्षा का शिकार है। चंदो ताल के प्राकृतिक सौंदर्य को सहेजने और संवारने पर अब तक छिटपुट 10 करोड़ से अधिक की धनराशि खर्च हो चुकी है। लेकिन, प्रवासी पक्षियों के लिए इसे संवारने की योजना कागजों तक ही सिमट कर रह गई है।
शहर से 10 किलोमीटर दूर प्राचीन ताल चंदो ताल बदहाली का शिकार है। वन विभाग ने वर्ष 1997 में दो करोड़ खर्च कर इसे विकसित किया था। ताल से सटे स्थल को शहीद उदय प्रताप सिंह पक्षी विहार के रूप में स्थापित किया गया है। समय के साथ चंदो ताल का स्वरूप सिमटता गया। सिल्ट व जलकुंभी के चलते ताल की गहराई भी कम हो गई है। इस ताल को नेशनल वेटलैंड कंजर्वेशन प्रोग्राम के तहत चयनित कर उत्तर प्रदेश वन निगम ने भी इसके विकास पर दो करोड़ रुपये खर्च किए। इसके बाद भी ताल का समुचित विकास नहीं हो सका। चंदो ताल के अस्तित्व बचाने के लिए छिटपुट प्रयास किए गए। लेकिन, जलकुंभी व सिल्ट जस- की- तस ताल में जमी रही। विदेशी पक्षियों के कलरव से सुशोभित यह चंदो ताल उपेक्षा के चलते अपनी पहचान बनाए रखने के लिए आज भी संघर्ष कर रहा है। चंदो ताल, पक्षी विहार के विकास के लिए पिछले चार साल से प्रस्ताव शासन को भेजा जा रहा है, मगर अब तक उसे वित्तीय स्वीकृति नहीं मिल सकी है।
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ताल की रखवाली के तीन वाच टावर
चंदो ताल में पक्षियों का शिकार करने वालों पर नजर रखने के लिए तीन टावर बनवाए गए हैं। लेकिन इन पर किसी कर्मचारी की तैनाती न होने से शिकारियों के हौसले बुलंद रहते हैं। इस बार देशी-विदेशी पक्षियों की तादाद में काफी कमी दर्ज की गई। स्थानीय लोगों का कहना है कि हर वर्ष यह ताल सर्दी के मौसम में देशी विदेशी पक्षियों की चहचहाहट से गूंज उठता था, लेकिन इस बार ठंडक में विदेशी मेहमानों की संख्या प्रभावित रही।
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कौन सा पक्षी किस देश से आता है
रेड हेड कोचर्ड (लालसर) अफ्रीकी देशों से, पिक शीर्ष बत्तख श्रीलंका व म्यांमार से आते हैं। कूट पक्षी चीन और तिब्बत से आते हैं। रक्त शिखी कोचर्ड म्यांमार व श्रीलंका से और शिखी कोचर्ड श्रीलंका और बांग्लादेश से आते हैं। विजन, विस्लिंग डक श्रीलंका और म्यांमार से आते हैं जबकि मेलर्ड और गैंडाल पक्षी दक्षिण अफ्रीका से आते हैं। वहीं, पेल्किन पक्षी दक्षिण अफ्रीका व रेड क्रेस्टेड पोचर्ड पक्षी दक्षिण पूर्व साइबेरिया से आते हैं।
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पक्षी विहार में स्थापित की गई हैं वाटिकाएं
शहीद उदय प्रताप सिंह पक्षी विहार में विभिन्न वाटिकाएं स्थापित की गई हैं। इनमें नक्षत्र वाटिका, कुरानी वृक्ष वाटिका, तीर्थंकर वाटिका, बुद्ध वाटिका और हरिशंकर वाटिका शामिल हैं। इन वाटिकाओं में बरगद, पीपल, छितवन, साखू, चीड़, प्रियंगु, शिरीष, बहेड़ा, बेल, तेंदू, कदंब, कैथा, आम, अशोक, चंपा, मौलश्री, जंबू, देवदार, बांस, साल, खजूर, अंगूर, जैतून, अंजीर, पीलू, मेहंदी, बेरी, बबूल, पाकड़, आंवला सहित विभिन्न प्रकार के पेड़ पौधे शामिल हैं। वाटिकाओं में लगाए गए तमाम पौधे देखभाल के अभाव में सूख कर नष्ट हो गए हैं। क्यारियों में पौधों की सुरक्षा के लिए लगाए गए पिलर भी टूटे पड़े हैं।
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चंदो ताल पक्षी विहार के विकास और रखरखाव के इंतजाम के लिए कार्ययोजना बनाई गई है। इसके लिए केंद्र सरकार को साढ़े तीन करोड़ रुपये का प्रस्ताव भेजा गया है। कोविड-19 के चलते मामला लंबित हो गया था। मगर, अब नए सिरे से प्रयास शुरू हो गया है। धन मिलते ही कार्ययोजना पर काम शुरू करा दिया जाएगा।
नवीन कुमार शाक्य, प्रभागीय निदेशक सामाजिक वानिकी वन प्रभाग, बस्ती