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Basti News: गोपाल सिंह को नहीं मिला स्वतंत्रता सेनानी का दर्जा

Thu, 26 Jan 2023 03:37 PM IST
गोरखपुर ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, बस्ती।
संवाद न्यूज एजेंसी, बस्ती। Published by: गोरखपुर ब्यूरो Updated Thu, 26 Jan 2023 03:37 PM IST
सार

जनवरी 1964 में देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू जो भारतीय राष्ट्रीय आर्मी के मुखिया थे, ने भी अपने पत्र के माध्यम से गोपाल सिंह पुत्र गुरेन सिंह को सहायता देने को कहा, मगर तत्कालीन प्रशासन व शासन ने सहायता तो दूर सेनानी के रूप में मान्यता तक नहीं दी। इसका परिवार को मलाल है।

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Gopal Singh did not get the status of freedom fighter
आजाद हिंद फौज के सिपाही गोपाल सिंह की फाइल फोटो। संवाद - फोटो : BASTI

विस्तार

भारत की आजादी में तमाम देश भक्तों ने अपना जीवन समर्पित कर दिया, मगर आजादी के बाद उन्हें कुछ देने को कौन कहे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी तक का दर्जा नहीं मिल सका। देश के इन्हीं रणबांकुरों में गोपाल सिंह का भी नाम शामिल है।
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बहादुरपुर ब्लॉक के भैंसहटी गांव निवासी गोपाल सिंह ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस को अपना आदर्श बनाया और अपनी सारी जमा पूंजी पचास हजार रुपये व जीप आजाद हिंद फौज के नाम कर दी। यही नहीं, वे फौज में शामिल भी हो गए। जब तक देश आजाद नहीं हुआ वे आजाद हिंद फौज के वफादार सिपाही के रूप में अपनी सेवा देते रहे। देश आजाद हुआ तो उनके सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हुआ, इस नाते उन्होंने परिवहन में बतौर चालक नौकरी ज्वाइन की और अंतिम समय तक चालक के रूप में परिवहन निगम को सेवा देते रहे।
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देश की आजादी की लड़ाई के लिए जिन दिनों नेता जी सुुभाष चंद्र बोस आजाद हिंद फौज का गठन कर रहे थे, उस समय गोपाल सिंह सिंगापुर के स्योनान शहर में रहते थे, जो उस समय जापान के कब्जे में था। नेताजी के देश की आजादी की लड़ाई के लिए आजाद हिंद फौज के गठन से गोपाल इतना प्रभावित हुए कि वह उस समय उनके पास मौजूद पचास हजार मुद्रा और अपनी जीप दान करते हुए चालक के रूप में आजाद हिंद फौज से जुड़ गए।
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13 मई 1914 में जन्मे गोपाल सिंह दो भाई थे। उनके बड़े भाई रामकृपाल सिंह, जिनका इस समय भरा-पूरा परिवार है। आजाद हिंद फौज के सिपाही गोपाल ने पहलवानी के कारण शादी नहीं की थी। उनके बड़े भाई के पौत्र इंद्रसेन सिंह ने बताया कि बाबा की मौत 1972 के दिसंबर महीने में हुई थी। उस समय वह सरकारी बस चलाते थे। वह नेताजी के सिखाए अनुशासन का जीवन के अंतिम दिनों तक पालन करते थे। उस समय हमारी उम्र मुश्किल से पंद्रह वर्ष रही होगी लेकिन उनके द्वारा सिखाए गए अनुशासन आज तक काम आ रहे हैं।

इंद्रसेन बताते हैं कि जब सरकार ने नेताजी की मौत की बात प्रसारित कराई तो बाबा ने उनकी मौत से इंकार कर दिया। उस समय नेताजी की मौत की बात करने वालों से वे झगड़ा तक कर लेते थे। दूसरे पौत्र भागवत सिंह ने बताया कि बाबा की ओर से जीप दान के लिए स्योनान शहर में संचालित आजाद हिंद फौज के कार्यालय से उन्हें धन्यवाद प्रमाणपत्र दिया गया था।


जनवरी 1964 में देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू जो भारतीय राष्ट्रीय आर्मी के मुखिया थे, ने भी अपने पत्र के माध्यम से गोपाल सिंह पुत्र गुरेन सिंह को सहायता देने को कहा, मगर तत्कालीन प्रशासन व शासन ने सहायता तो दूर सेनानी के रूप में मान्यता तक नहीं दी। इसका परिवार को मलाल है। परिवार के लोग कहते हैं कि देश की आजादी में कोई भी सेनानी किसी लाभ के लिए नहीं उतरा था, मगर उन्हें सेनानी तक का दर्जा न मिले। यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।
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