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Basti News: दो करोड़ का भवन तैयार, छह साल से एमआरआई जांच के लिए भटक रहे मरीज
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महर्षि वशिष्ठ मेडिकल कॉलेज बस्ती संवाद
- फोटो : samvad
बस्ती। महर्षि वशिष्ठ मेडिकल कॉलेज से संबद्ध ओपेक चिकित्सालय कैली में बनकर तैयार एमआरआई भवन को पिछले छह साल से मशीन आने का इंतजार है। बताते हैं कि इस मशीन को साल 2020 में ही लग जाना था, मगर ऐसा नहीं हुआ। करीब दो करोड़ रुपये से अत्याधुनिक संसाधनों वाला भवन बना हुआ है।
ओपेक चिकित्सालय कैली में पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल में एमआरआई मशीन संचालित करने की योजना बनाई गई है। ईसीआरपी-दो के तहत शासन स्तर से बजट का भी प्रावधान किया गया। यहां से मशीन लगाने के लिए कई बार प्रस्ताव बनाकर भेजा गया, मगर अभी तक मशीन न आने से एमआरआई भवन में यह सुविधा शुरू नहीं हो पाई है। इससे मरीज गोरखपुर या फिर लखनऊ जाने को विवश हो रहे हैं। वहीं, प्राइवेट में एमआरआई जांच कराने पर पांच से आठ हजार रुपये खर्च करने पड़ रहे।
बताया गया कि उत्तर प्रदेश मेडिकल सप्लाई कारपोरेशन को यह जिम्मेदारी दी गई, मगर निविदा करने के बाद मशीन की आपूर्ति आज तक नहीं हो सकी है। इससे भवन भी बदरंग होने लगा है। यदि मशीन आई भी तो फिर से भवन का रंग-रोगन और अन्य मरम्मत का कार्य कराना पड़ेगा।
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पढ़ाई शुरू पर मशीन न आने से जांच सेवा ठप
जिले में साल 2018 में मेडिकल कॉलेज की स्थापना की हरी झंडी मिली थी। निर्माण पूरा होने के बाद साल 2019 से मेडिकल कॉलेज संचालित होने लगा। पढ़ाई शुरू हुई। मेडिकल कॉलेज ने ओपेक चिकित्सालय कैली को ओपीडी तथा अन्य चिकित्सा सेवा के लिए संबद्ध कर लिया है। संबद्धीकरण के बाद तय हुआ कि कैली में जो उपकरण बंद हैं, उन्हें पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के आधार पर संचालित किया जाएगा। इस प्रक्रिया के तहत कैली में डायलसिस सेवा संचालित की जा रही है। इसी तरह कॉलेज प्रशासन ने पीपीपी मोड पर एमआरआई मशीन संचालित करने की योजना बनाई थी, इसके लिए दो करोड़ रुपये का भवन साल 2020 में तैयार कर दिया गया, लेकिन मशीन स्थापित नहीं हो सकी है।
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निजी क्षेत्र में दो एमआरआई सेंटर संचालित
जिले में वैसे तो निजी क्षेत्र में दो एमआरआई सेंटर संचालित हैं। दोनों निजी क्षेत्र के सेंटर हैं, ऐसे में आर्थिक रूप से कमजोर मरीज आसानी से एमआरआई जांच नहीं करवा पाता। वहीं मजबूर मरीज चार हजार से आठ हजार रुपये देकर एमआरआई करवाता है।
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इन बीमारियों में होता है एमआरआई
मेडिकल कॉलेज के मेडिसिन विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. बीएल कन्नौजिया के अनुसार, एमआरआई के प्रतिदिन चार से पांच मरीज मिलते हैं। दिमाग की परेशानियों में, हृदय रोग में, दिमागी बुखार में, मांसपेशियों की बीमारी में, नसों की दिक्कत में, गठिया रोग में, बच्चेदानी के ट्यूमर व कैंसर की स्थिति में एमआरआई कराना होता है। ऐसे रोगियों को बीआरडी या फिर अन्य हॉयर सेंटर रेफर कर दिया जाता है।
कोट
एमआरआई मशीन के लिए भवन बना है। कई बार मशीन के लिए संबंधित को पत्राचार किया गया। हालांकि, अभी तक मशीन नहीं मिल पाई है, चूंकि यह कार्य उत्तर प्रदेश मेडिकल सप्लाई कारपोरेशन कंपनी को करना है। प्रयास जारी है, पत्राचार भी किया गया है। भवन को दुरुस्त रखने के लिए समय-समय पर उसकी मरम्मत भी कराई जाती है।
-डॉ. अनिल कुमार यादव, उप प्रधानाचार्य, मेडिकल कॉलेज, बस्ती।
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ओपेक चिकित्सालय कैली में पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) मॉडल में एमआरआई मशीन संचालित करने की योजना बनाई गई है। ईसीआरपी-दो के तहत शासन स्तर से बजट का भी प्रावधान किया गया। यहां से मशीन लगाने के लिए कई बार प्रस्ताव बनाकर भेजा गया, मगर अभी तक मशीन न आने से एमआरआई भवन में यह सुविधा शुरू नहीं हो पाई है। इससे मरीज गोरखपुर या फिर लखनऊ जाने को विवश हो रहे हैं। वहीं, प्राइवेट में एमआरआई जांच कराने पर पांच से आठ हजार रुपये खर्च करने पड़ रहे।
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बताया गया कि उत्तर प्रदेश मेडिकल सप्लाई कारपोरेशन को यह जिम्मेदारी दी गई, मगर निविदा करने के बाद मशीन की आपूर्ति आज तक नहीं हो सकी है। इससे भवन भी बदरंग होने लगा है। यदि मशीन आई भी तो फिर से भवन का रंग-रोगन और अन्य मरम्मत का कार्य कराना पड़ेगा।
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पढ़ाई शुरू पर मशीन न आने से जांच सेवा ठप
जिले में साल 2018 में मेडिकल कॉलेज की स्थापना की हरी झंडी मिली थी। निर्माण पूरा होने के बाद साल 2019 से मेडिकल कॉलेज संचालित होने लगा। पढ़ाई शुरू हुई। मेडिकल कॉलेज ने ओपेक चिकित्सालय कैली को ओपीडी तथा अन्य चिकित्सा सेवा के लिए संबद्ध कर लिया है। संबद्धीकरण के बाद तय हुआ कि कैली में जो उपकरण बंद हैं, उन्हें पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के आधार पर संचालित किया जाएगा। इस प्रक्रिया के तहत कैली में डायलसिस सेवा संचालित की जा रही है। इसी तरह कॉलेज प्रशासन ने पीपीपी मोड पर एमआरआई मशीन संचालित करने की योजना बनाई थी, इसके लिए दो करोड़ रुपये का भवन साल 2020 में तैयार कर दिया गया, लेकिन मशीन स्थापित नहीं हो सकी है।
निजी क्षेत्र में दो एमआरआई सेंटर संचालित
जिले में वैसे तो निजी क्षेत्र में दो एमआरआई सेंटर संचालित हैं। दोनों निजी क्षेत्र के सेंटर हैं, ऐसे में आर्थिक रूप से कमजोर मरीज आसानी से एमआरआई जांच नहीं करवा पाता। वहीं मजबूर मरीज चार हजार से आठ हजार रुपये देकर एमआरआई करवाता है।
इन बीमारियों में होता है एमआरआई
मेडिकल कॉलेज के मेडिसिन विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. बीएल कन्नौजिया के अनुसार, एमआरआई के प्रतिदिन चार से पांच मरीज मिलते हैं। दिमाग की परेशानियों में, हृदय रोग में, दिमागी बुखार में, मांसपेशियों की बीमारी में, नसों की दिक्कत में, गठिया रोग में, बच्चेदानी के ट्यूमर व कैंसर की स्थिति में एमआरआई कराना होता है। ऐसे रोगियों को बीआरडी या फिर अन्य हॉयर सेंटर रेफर कर दिया जाता है।
कोट
एमआरआई मशीन के लिए भवन बना है। कई बार मशीन के लिए संबंधित को पत्राचार किया गया। हालांकि, अभी तक मशीन नहीं मिल पाई है, चूंकि यह कार्य उत्तर प्रदेश मेडिकल सप्लाई कारपोरेशन कंपनी को करना है। प्रयास जारी है, पत्राचार भी किया गया है। भवन को दुरुस्त रखने के लिए समय-समय पर उसकी मरम्मत भी कराई जाती है।
-डॉ. अनिल कुमार यादव, उप प्रधानाचार्य, मेडिकल कॉलेज, बस्ती।