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30 साल से हाथ को नहीं मिला जनता का साथ
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30 साल से हाथ को नहीं मिला जनता का साथ
1984 की सहानुभूति में जीते थे कांग्रेस के राम अवध
1989 में बोफोर्स तोप का मुद्दा उठने के बाद से कमजोर होती गई पार्टी
अमर उजाला ब्यूरो
बस्ती। आपातकाल के बाद हुए एक मात्र चुनाव को छोड़ दें तो जिले में कांग्रेस का दबदबा वर्ष 1984 तक बना रहा। मगर 1989 में बोफोर्स तोप का मुद्दा सामने आने के बाद हुए चुनाव से यहां की जनता ने हाथ का साथ छोड़ा, तभी से कांग्रेस जिले में हाशिए पर चली गई। पहले चुनाव से लेकर अभी तक छह बार कांग्रेस और पांच बार भाजपा के प्रत्याशी देश की संसद में पहुंचे हैं। अब एक बार फिर कांग्रेस ऐसे चेहरे की तलाश में है, जो पार्टी को संजीवनी दे सके।
वर्ष 1977 का संसदीय चुनाव जिले में टर्निंग प्वाइंट था। पहली बार यहां भारतीय लोकदल के टिकट पर चुनाव मैदान में उतरे शिव नरायन ने कांग्रेस प्रत्याशी को मात दी। इसके बाद 1980 में कल्पनाथ सोनकर व प्रधानमंत्री इंदिरागांधी की हत्या से उपजी सहानुभूति लहर में 1984 में राम अवध कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीते। वर्ष 1989 मे बोफोर्स तोप का मामला सामने आने के बाद नए राजनीतिक समीकरण बने। विश्वनाथ प्रताप सिंह की अगुवाई वाले जनता दल के टिकट पर कल्पनाथ सोनकर दोबारा सांसद चुने गए। मंडल कमीशन के बाद उपजे हालत में वीपी सिंह सरकार हट गई फिर 1991 में राम मंदिर लहर में भाजपा ने खाता खोला। आईपीएस अधिकारी रहे श्यामलाल को जीत हासिल हुई। यहीं से कांग्रेस के पराभव का प्रारंभ हुआ जो आठ चुनावों तक लगातार जारी रहा। वर्ष 1996, 1998 व 1999 में भाजपा के श्रीराम चौहान ने लगातार तीन बार जीत दर्ज कराई जो बस्ती के संसदीय इतिहास में पहली बार हैट्रिक लगाने वाले प्रत्याशी बने। वर्ष 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी मंत्रिमंडल में उपभोक्ता व संसदीय मामलों के राज्य मंत्री भी बने। इन सभी चुनावों में कांग्रेस ने अलग प्रत्याशियों पर दांव आजमाया मगर निर्णायक लड़ाई से बाहर ही रहे। यहां तक कि दस्यु सरगना फूलन देवी के पति उन्मेद सिंह कश्यप को भी कांग्रेस ने मैदान में उतारा लेकिन जनता ने साथ नहीं दिया। वर्ष 2004 के चुनाव में लाल मणि प्रसाद ने भाजपा के श्रीराम चौहान के विजयी रथ को रोक कर पहली बार बसपा का खाता खोला।
उधर, वर्ष 2009 के संसदीय चुनाव में बस्ती लोकसभा क्षेत्र सामान्य श्रेणी में आ गया। इसके बाद भी कांग्रेस का भाग्य नहीं बदला। कांग्रेस प्रत्याशी मुख्य मुकाबले में ही नही आ सका। तब बसपा सरकार में मंत्री रहे राम प्रसाद चौधरी के भतीजे अरविंद चौधरी ने पूर्व मंत्री सपा प्रत्याशी राज किशोर सिंह को हराकर जीत हासिल की। वर्ष 2014 के नरेंद्र मोदी लहर में पार्टी की ऐसी दुर्गति हुई कि कांग्रेस प्रत्याशी की जमानत तक जब्त हो गई। भाजपा के युवा चेहरा हरीश द्विवेदी ने तत्कालीन सपा सरकार के मंत्री राज किशोर सिंह के भाई बृजकिशोर सिंह को नजदीकी मुकाबले में हरा दिया। इस चुनाव में बसपा के उम्मीदवार रहे राम प्रसाद चौधरी तीसरे स्थान पर चले गए।
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1984 की सहानुभूति में जीते थे कांग्रेस के राम अवध
1989 में बोफोर्स तोप का मुद्दा उठने के बाद से कमजोर होती गई पार्टी
अमर उजाला ब्यूरो
बस्ती। आपातकाल के बाद हुए एक मात्र चुनाव को छोड़ दें तो जिले में कांग्रेस का दबदबा वर्ष 1984 तक बना रहा। मगर 1989 में बोफोर्स तोप का मुद्दा सामने आने के बाद हुए चुनाव से यहां की जनता ने हाथ का साथ छोड़ा, तभी से कांग्रेस जिले में हाशिए पर चली गई। पहले चुनाव से लेकर अभी तक छह बार कांग्रेस और पांच बार भाजपा के प्रत्याशी देश की संसद में पहुंचे हैं। अब एक बार फिर कांग्रेस ऐसे चेहरे की तलाश में है, जो पार्टी को संजीवनी दे सके।
वर्ष 1977 का संसदीय चुनाव जिले में टर्निंग प्वाइंट था। पहली बार यहां भारतीय लोकदल के टिकट पर चुनाव मैदान में उतरे शिव नरायन ने कांग्रेस प्रत्याशी को मात दी। इसके बाद 1980 में कल्पनाथ सोनकर व प्रधानमंत्री इंदिरागांधी की हत्या से उपजी सहानुभूति लहर में 1984 में राम अवध कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीते। वर्ष 1989 मे बोफोर्स तोप का मामला सामने आने के बाद नए राजनीतिक समीकरण बने। विश्वनाथ प्रताप सिंह की अगुवाई वाले जनता दल के टिकट पर कल्पनाथ सोनकर दोबारा सांसद चुने गए। मंडल कमीशन के बाद उपजे हालत में वीपी सिंह सरकार हट गई फिर 1991 में राम मंदिर लहर में भाजपा ने खाता खोला। आईपीएस अधिकारी रहे श्यामलाल को जीत हासिल हुई। यहीं से कांग्रेस के पराभव का प्रारंभ हुआ जो आठ चुनावों तक लगातार जारी रहा। वर्ष 1996, 1998 व 1999 में भाजपा के श्रीराम चौहान ने लगातार तीन बार जीत दर्ज कराई जो बस्ती के संसदीय इतिहास में पहली बार हैट्रिक लगाने वाले प्रत्याशी बने। वर्ष 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी मंत्रिमंडल में उपभोक्ता व संसदीय मामलों के राज्य मंत्री भी बने। इन सभी चुनावों में कांग्रेस ने अलग प्रत्याशियों पर दांव आजमाया मगर निर्णायक लड़ाई से बाहर ही रहे। यहां तक कि दस्यु सरगना फूलन देवी के पति उन्मेद सिंह कश्यप को भी कांग्रेस ने मैदान में उतारा लेकिन जनता ने साथ नहीं दिया। वर्ष 2004 के चुनाव में लाल मणि प्रसाद ने भाजपा के श्रीराम चौहान के विजयी रथ को रोक कर पहली बार बसपा का खाता खोला।
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उधर, वर्ष 2009 के संसदीय चुनाव में बस्ती लोकसभा क्षेत्र सामान्य श्रेणी में आ गया। इसके बाद भी कांग्रेस का भाग्य नहीं बदला। कांग्रेस प्रत्याशी मुख्य मुकाबले में ही नही आ सका। तब बसपा सरकार में मंत्री रहे राम प्रसाद चौधरी के भतीजे अरविंद चौधरी ने पूर्व मंत्री सपा प्रत्याशी राज किशोर सिंह को हराकर जीत हासिल की। वर्ष 2014 के नरेंद्र मोदी लहर में पार्टी की ऐसी दुर्गति हुई कि कांग्रेस प्रत्याशी की जमानत तक जब्त हो गई। भाजपा के युवा चेहरा हरीश द्विवेदी ने तत्कालीन सपा सरकार के मंत्री राज किशोर सिंह के भाई बृजकिशोर सिंह को नजदीकी मुकाबले में हरा दिया। इस चुनाव में बसपा के उम्मीदवार रहे राम प्रसाद चौधरी तीसरे स्थान पर चले गए।
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