साहब की पड़े नजर तो संवर जाएगी सूरत

ब्यूरो/अमर उजाला बस्ती Updated Sun, 25 Nov 2018 11:11 PM IST
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खंडहर बना सीतापुर आंख अस्पताल।
खंडहर बना सीतापुर आंख अस्पताल। - फोटो : अमर उजाला

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बस्ती। सीतापुर आंख अस्पताल का अस्तित्व मिटने के कगार पर है। इसका भवन जहां जमींदोज हो रहा है। वहीं बचे हुए इसके अस्तित्व को मिटाने पर भूमाफिया आमादा हैं। इसकी बेशकीमती जमीन पर कब्जा भी तेजी से हो रहा है, यदि इस अस्पताल पर साहब की नजर पड़ जाए तो इसकी सूरत बदल जाएगी।
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वर्ष 1954 में नेत्र रोगियों के उपचार के लिए सीतापुर आंख अस्पताल की नींव रखी गई। इस दौर में गिने-चुने ही अस्पताल होते थे। इस वजह से लोगों को भी खुशी मिली थी। भारी-भरकम रकम उस समय खर्च कर एक बड़ी इमारत बनाई गई थी। दो अक्तूबर 1975 को गांधी जयंती के दिन बस्ती के तत्कालीन जिलाधिकारी चंद्रभूषण धर द्विवेदी ने इस चिकित्सालय का शिलान्यास किया था। महज दो वर्ष बाद 20 फरवरी 1977 को इस अस्पताल के सामान्य कक्ष का उद्घाटन उत्तर प्रदेश सरकार में स्वास्थ्य एवं न्याय मंत्री रहे प्रभुनारायण सिंह ने किया था। अस्पताल को आम लोगों के लिए खोल दिया गया। लगभग तीन दशक तक इस अस्पताल ने लाखों लोगों को अपनी सेवाएं दी, लेकिन वर्ष 2005 के बाद से यह अस्पताल उपेक्षित होता चला गया और आज सिर्फ खंडहर ही बचा है। सीतापुर आंख अस्पताल के सलाहकार डीके शर्मा ने कहा कि इस नेत्र चिकित्सालय को चालू करने का प्रयास किया जा रहा है। जल्द ही यह लोगों को सेवाएं देगा।
डीएम अध्यक्ष व सीडीओ हैं सचिव
इस अस्पताल के संचालन के लिए बस्ती डिस्ट्रिक्ट आई रिलीफ सोसाइटी बनाई गई थी, जिसके अध्यक्ष पदेन डीएम व सचिव सीडीओ हैं, और इस समिति के सदस्य अधिकारियों के अलावा गणमान्य नागरिक भी हैं, हैरानी इस बात की है कि आखिर इस अस्पताल पर क्यों नहीं जिम्मेंदारों की नजर पड़ रही है।

अस्पताल संचालन को मांगा था सहयोग
बस्ती में जिलाधिकारी व सोसाइटी अध्यक्ष रहे हेमंत राय 22 नवंबर 1997 को अपील की थी कि सीतापुर आंख अस्पताल की बस्ती शाखा जनपद का गौरव है। बस्ती के साथ ही अन्य जनपदों के आंख के रोगियों की यहां चिकित्सा सेवा होती आ रही है। यह चिकित्सालय घोर आर्थिक संकट में है। चिकित्सा उपकरण पुराने हो चुके हैं। भवन की स्थित भी ठीक नहीं है। कर्मचारियों के नियमित

गायब हो गए लाखों के उपकरण
अनदेखी के चलते इस अस्पताल में लगे लाखों रुपये के उपकरण गायब हो गए। साथ ही खिड़की, जंगले और दरवाजों तक को नहीं छोड़ा गया। आर्थिक तंगी के चलते इस आंख के अस्पताल में तैनात कई कर्मी ऐसे हैं, जिन्हें कई माह का वेतन तक नहीं दिया जा सका, इनमें ज्यादा तर कर्मचारी सेवनिवृत्त भी हो गए हैं।
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