{"_id":"597b34864f1c1b177f8b46b7","slug":"111501246598-basti-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"खास खबर... मेडिकल में देर की तो होगी प्रारंभिक जांच","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
खास खबर... मेडिकल में देर की तो होगी प्रारंभिक जांच
Updated Fri, 28 Jul 2017 06:26 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
बस्ती। मेडिकल कराने में जान बूझकर देर करके सुबूत प्रभावित करने की परंपरा अब नहीं चलेगी। इसे लेकर शासन सख्त है। एनसीआर दर्ज करके चुप बैठने वाले थानेदार की प्रारंभिक जांच होगी। यदि दोषी पाए गए तो थानेदारी छिनेगी ही, डीआईजी स्तर से एप्रूवल भी निरस्त कर दिया जाएगा। डीआईजी का कहना है कि 24 घंटे के भीतर मेडिकल कराने के बाद रिपोर्ट के अनुसार धाराओं को तरमीम (रिपोर्ट के अनुसार परिवर्तन) करना अनिवार्य है।
सूबे में योगी सरकार बनते ही आईपीसी और सीआरपीसी की धाराओं के अंतर्गत संज्ञेय अपराध करने वालों पर लगाम कसी जाने लगी। इस दौरान शासन ने मेडिको-लीगल में गोलमाल करके दबंगों को अनुचित लाभ दिए जाने की रिपोर्ट मिली। अधिकारियों को पहले से ही शिकायतें मिलती रही हैं कि पुलिस जानबूझकर मेडिकल में देर करती है। डीआइजी राकेश कुमार साहू का कहना है कि कई बार रिपोर्ट आने में भी देर होती है लेकिन ऐसे भी तमाम प्रार्थनापत्र आ रहे हैं, जिनमें देर अथवा मेडिकल न कराने की शिकायत है।
आरोपी को अप्रत्यक्ष फायदा
क्रिमिनल मुकदमों के अधिवक्ता नरेंद्र प्रताप के अनुसार मेडिकल व रिपोर्ट के हिसाब से धारा तरमीम न होने से आरोपी को जबरदस्त फायदा होता है। एनसीआर में वह जमानत करा लेता है,जबकि मेडिकल रिपोर्ट के हिसाब से जब तरमीम होती है तो आइपीसी की धारा 325, 324, 326, 307, 308 जैसी संगीन धाराएं बढ़ती हैं। महिला/ किशोरी अथवा अबोध बालिका से संबंधित मामलों में इसकी अहमियत और भी बढ़ जाती है। विवेचक मेडिकल रिपोर्ट के हिसाब से धाराएं तरमीम करने में महीनों लग जाते हैं।
विज्ञापन
अहम है मेडिकल की रिपोर्ट
वरिष्ठ अधिवक्ता अवधेश प्रताप सिंह का कहना है कि आईपीसी-सीआरपीसी सहित अन्य विधान में चोट/घाव के आधार पर धाराएं तय की जाती हैं। मसलन लाठी-डंडे से मारपीट हुई तो घाव कितना गहरा हुआ,इस हिसाब से मुकदमा दर्ज होता है। इसकी अहमियत का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि मामूली हेरफेर से भी मारपीट हत्या के प्रयास में बदल जाती है।
विज्ञापन
सूबे में योगी सरकार बनते ही आईपीसी और सीआरपीसी की धाराओं के अंतर्गत संज्ञेय अपराध करने वालों पर लगाम कसी जाने लगी। इस दौरान शासन ने मेडिको-लीगल में गोलमाल करके दबंगों को अनुचित लाभ दिए जाने की रिपोर्ट मिली। अधिकारियों को पहले से ही शिकायतें मिलती रही हैं कि पुलिस जानबूझकर मेडिकल में देर करती है। डीआइजी राकेश कुमार साहू का कहना है कि कई बार रिपोर्ट आने में भी देर होती है लेकिन ऐसे भी तमाम प्रार्थनापत्र आ रहे हैं, जिनमें देर अथवा मेडिकल न कराने की शिकायत है।
विज्ञापन
आरोपी को अप्रत्यक्ष फायदा
क्रिमिनल मुकदमों के अधिवक्ता नरेंद्र प्रताप के अनुसार मेडिकल व रिपोर्ट के हिसाब से धारा तरमीम न होने से आरोपी को जबरदस्त फायदा होता है। एनसीआर में वह जमानत करा लेता है,जबकि मेडिकल रिपोर्ट के हिसाब से जब तरमीम होती है तो आइपीसी की धारा 325, 324, 326, 307, 308 जैसी संगीन धाराएं बढ़ती हैं। महिला/ किशोरी अथवा अबोध बालिका से संबंधित मामलों में इसकी अहमियत और भी बढ़ जाती है। विवेचक मेडिकल रिपोर्ट के हिसाब से धाराएं तरमीम करने में महीनों लग जाते हैं।
विज्ञापन
अहम है मेडिकल की रिपोर्ट
वरिष्ठ अधिवक्ता अवधेश प्रताप सिंह का कहना है कि आईपीसी-सीआरपीसी सहित अन्य विधान में चोट/घाव के आधार पर धाराएं तय की जाती हैं। मसलन लाठी-डंडे से मारपीट हुई तो घाव कितना गहरा हुआ,इस हिसाब से मुकदमा दर्ज होता है। इसकी अहमियत का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि मामूली हेरफेर से भी मारपीट हत्या के प्रयास में बदल जाती है।