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वर्ल्ड टाइगर डे आज- बाघ की बढ़ती संख्या स्वस्थ जंगल का संकेत, हमला नहीं-बढ़ाएं जागरूकता
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वर्ल्ड टाइगर डे आज- बाघ की बढ़ती संख्या स्वस्थ जंगल का संकेत, हमला नहीं-बढ़ाएं जागरूकता
- फोटो : अमर उजाला, बरेली
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जंगली जानवर और मानव में बढ़ते संघर्ष पर आक्रोश नहीं समझदारी की जरूरत
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आईएएस संजय कुमार ने साझा किए जंगल के अनुभव से संबंधित अपने विचार
बरेली। यूपी देश का इकलौता ऐसा राज्य है जिसे मानव और वन्यजीवों के संघर्ष को राज्य आपदा घोषित किया गया है। हालांकि बाघों की बढ़ती संख्या जंगलों के बेहतर स्वास्थ्य का संकेतक हैं। लिहाजा बाघों को मारने की नहीं बल्कि इंसानों को जागरूक करने की जरूरत है।
वन्य जीवों पर अध्ययन के साथ जंगलों के भ्रमण के शौकीन आईएएस संजय कुमार ने पर बरेली मंडल में वन्य जीवों और मानव के बीच संघर्ष की बढ़ती घटनाओं पर अमर उजाला से बातचीत में यह दावा किया। बरेली के पूर्व डीएम संजय कुमार ने बताया बाघ का कुनबा उसी जंगल में बढ़ता है, जिसका स्वास्थ्य अच्छा होता है। यानी उनके आहार के लिए पर्याप्त हिरन और चीतल जैसे जानवर होते हैं। यह जानवरों की अच्छी संख्या तभी होती है, जब उनके लिए बेहतर घास और पौधे जंगल में होते हैं। यह पूरा तंत्र जंगल के बेहतर स्वास्थ्य की पहचान है। बाघ दो ही परिस्थिति में जंगल से बाहर आते हैं, पहला जब जंगल के हालात बेहतर न हो या फिर उनका कुनबा बहुत बढ़ गया हो और मजबूत साथी उन्हें मुश्किल पैदा कर रहे हों। उनके बाहर आने पर उनसे टकराव के बजाय बचाव की जरूरत होती है। इसके लिए जंगल से लगे गांवों और स्कूलों में जागरूकता की जरूरत है। लोगों को समझाना होगा कि अगर कोई सिर्फ घायल हुआ है तो समझो कि बाघ का वार चूका नहीं बल्कि वह आपसे टकराना नहीं चाहता।
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बरेली। यूपी देश का इकलौता ऐसा राज्य है जिसे मानव और वन्यजीवों के संघर्ष को राज्य आपदा घोषित किया गया है। हालांकि बाघों की बढ़ती संख्या जंगलों के बेहतर स्वास्थ्य का संकेतक हैं। लिहाजा बाघों को मारने की नहीं बल्कि इंसानों को जागरूक करने की जरूरत है।
वन्य जीवों पर अध्ययन के साथ जंगलों के भ्रमण के शौकीन आईएएस संजय कुमार ने पर बरेली मंडल में वन्य जीवों और मानव के बीच संघर्ष की बढ़ती घटनाओं पर अमर उजाला से बातचीत में यह दावा किया। बरेली के पूर्व डीएम संजय कुमार ने बताया बाघ का कुनबा उसी जंगल में बढ़ता है, जिसका स्वास्थ्य अच्छा होता है। यानी उनके आहार के लिए पर्याप्त हिरन और चीतल जैसे जानवर होते हैं। यह जानवरों की अच्छी संख्या तभी होती है, जब उनके लिए बेहतर घास और पौधे जंगल में होते हैं। यह पूरा तंत्र जंगल के बेहतर स्वास्थ्य की पहचान है। बाघ दो ही परिस्थिति में जंगल से बाहर आते हैं, पहला जब जंगल के हालात बेहतर न हो या फिर उनका कुनबा बहुत बढ़ गया हो और मजबूत साथी उन्हें मुश्किल पैदा कर रहे हों। उनके बाहर आने पर उनसे टकराव के बजाय बचाव की जरूरत होती है। इसके लिए जंगल से लगे गांवों और स्कूलों में जागरूकता की जरूरत है। लोगों को समझाना होगा कि अगर कोई सिर्फ घायल हुआ है तो समझो कि बाघ का वार चूका नहीं बल्कि वह आपसे टकराना नहीं चाहता।
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प्रदेश में हर साल 150-200 घटनाएं
साल भर में पूरे प्रदेश में वन्य जीवों और इंसानों के बीच संघर्ष के 150-200 मामले होते हैं। इनमें 100-125 लोग हताहत भी होते हैं। इस समय पीलीभीत, दुधवा, कतरनिया घाट और किशनपुर रेंज बाघों के लिए अच्छे ठिकाने हैं। संजय कुमार ने बताया कि भविष्य में बलरामपुर में सुहेलदेव, महराजगंज का सुहागी वर्ब और सहारनपुर में शिवालिक रेंज वन प्रभाग को भी बाघ अभयारण्य घोषित किया जा सकता है।
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