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पुराने पन्नों से: बरेली में जब-जब आया रिंग रोड का प्रस्ताव, किसानों की जमीन लुटी कौड़ियों के भाव

Wed, 11 Sep 2024 05:06 PM IST
बरेली ब्यूरो अमर उजाला ब्यूरो, बरेली
अमर उजाला ब्यूरो, बरेली Published by: बरेली ब्यूरो Updated Wed, 11 Sep 2024 05:06 PM IST
सार

बरेली में वर्ष 1990 में रिंग रोड का प्रस्ताव आया था, तब अधिकारियों और भूमाफिया के गठजोड़ ने इसमें घपला किया था। कॉलोनाइजर ने प्रस्तावित मार्ग का नक्शा गुपचुप हासिल कर औने-पाने दाम में जमीन खरीदी थी। 

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Whenever the proposal for the ring road came farmers land was sold cheap rates in Bareilly
27 अगस्त 1990 को अमर उजाला ने प्रकाशित की थी यह खबर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

बरेली-पीलीभीत-सितारगंज हाईवे के चौड़ीकरण और रिंग रोड के लिए अधिगृहीत होने वाली जमीन की पहले से खरीद-फरोख्त का खेल नया नहीं है। बरेली में जब-जब रिंग रोड या हाईवे बनाने की बात चली, तब-तब अधिकारियों और भूमाफिया के गठजोड़ ने घोटाला किया। 

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वर्ष 1990 में भी प्रस्तावित रिंग रोड के लिए जमीन अधिग्रहण से पहले उसका गोपनीय नक्शा माफिया को लीक कर दिया गया था। इसके बाद योजना से अनजान किसानों से औने-पौने दामों में माफिया ने जमीन खरीद ली थी। योजना के सार्वजनिक होते ही उस जमीन को कई गुना अधिक दाम पर बेचा गया था।
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27 अगस्त 1990 को प्रकाशित की गई थी खबर 
अमर उजाला ने ‘रिंग रोड के आसपास के गांवों की गोपनीय सूची मालामाल कर रही है’ शीर्षक से 27 अगस्त 1990 को खबर प्रकाशित कर इस खेल को उजागर किया था। अब हाल में जिस तरह बरेली-सितारगंज हाईवे और बरेली की नई प्रस्तावित रिंग रोड के लिए जमीन अधिग्रहण में घोटाला सामने आया है, इससे मिलता-जुलता ही घपला उस समय रिंग रोड निर्माण का प्रस्ताव आने पर हुआ था। 

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केंद्र सरकार की काउंटर सिटी मैग्नेट योजना के तहत बरेली में रिंगरोड प्रस्तावित हुई थी। योजना के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी संभालने वाले बरेली विकास प्राधिकरण ने रिंग रोड के दायरे में आने वाले 192 गांवों की सूची तैयार की थी। इसमें जिला प्रशासन और तब की महानगर पालिका को भी विश्वास में लिया गया था। 

गांवों की सूची के साथ तैयार प्रस्ताव की फाइल गोपनीय थी और तीनों विभागों के उच्चाधिकारियों को ही चयनित गांवों और उनमें पड़ने वाले भूखंडों की जानकारी थी। इसके बावजूद कुछ अधिकारियों की मिलीभगत से भूमाफिया ने रिंग रोड के मार्ग का नक्शा हासिल कर लिया। 

भूमाफिया ने कमाए थे करोड़ों 
पूरी जानकारी जुटाने के बाद माफिया ने मार्ग में पड़ने वाली जमीन बड़े पैमाने पर औने-पौने दाम में खरीदी ली थी। दो दर्जन से अधिक कॉलोनाइजरों ने करोड़ों में यह जमीन खरीदी थी। कुछ जमीनों का किसानों से एग्रीमेंट हो गया था कि रिंग रोड बनने पर जब जमीन के दाम बढेंगे, तब उसे बेचकर करोड़ों कमाए जाएंगे। हालांकि, बाद में यह योजना परवान नहीं चढ़ सकी, लेकिन भूमाफिया ने करोड़ों कमा लिए। 

रूट में बदलाव करके भी हुई कमाई
पुराने जानकार बताते हैं कि काउंटर मैग्नेट सिटी योजना के तहत रिंग रोड न बन पाने के बाद कई बार उसके रूट के प्रस्ताव में बदलाव हुए। हर बार प्राॅपर्टी डीलरों ने लोगों को सब्जबाग दिखाकर ऊंचे दामों पर जमीन की खरीद-फरोख्त की। वर्ष 2003 में बड़ा बाइपास की अधिसूचना जारी हुई थी। हालांकि, वह लगभग दस वर्ष बाद वर्ष 2013 में बनकर तैयार हो सका। 

इसके भी प्रस्ताव से लेकर बनने तक आसपास के इलाकों में जमीन की खरीद-फरोख्त मनमाने ढंग से हुई। हालांकि, इस प्रोजेक्ट के अधिग्रहण में जमीन देने वाले हरिनंदन पटेल अभी तक मुआवजे के लिए भटक रहे हैं। उनके अनुसार वह मुआवजे की दरों से संतुष्ट नहीं हैं। इसीलिए उनका अभी तक विवाद चल रहा है।

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