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Bareilly News: हमने गजल से धोखा नहीं किया, हमने हुकूमतों के कसीदे नहीं पढ़े
Mon, 19 Feb 2024 02:39 AM IST
बरेली ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, बरेली
संवाद न्यूज एजेंसी, बरेली
Updated Mon, 19 Feb 2024 02:39 AM IST
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सेंथल। कुल हिंद मुशायरे में शायरों ने अपने कलाम पढ़कर समा बांध दिया। देर रात तक लोग अपने पसंदीदा शायरों को सुनने के लिए डटे रहे। शायरों ने समाज में हो रहे बदलाव और सियासी हालात पर शेर पढ़े। इस दौरान शाहीन रजा जैदी की रचित चार पुस्तकों का विमोचन भी किया गया।
इदारा-ए-बोस्ताने कलम की ओर से हकीम सैयद अहमद असगर जैदी के जन्मदिन पर कुल हिंद मुशायरा कराया गया। हिलाल जैदी ने शमा रोशन कर शुभारंभ किया। शायर वारिस वारसी ने पढ़ा, जी न उठूं मैं कहीं हाथ हटा सीने से, ऐ मेरी जान मुझे चैन से मर जाने दे। अना देहलवी ने पढ़ा- पुराने लोग हर दिन नए कानून लिखते हैं, कहीं जाने पे पाबंदी है कहीं जाना जरूरी है।
बिलाल सहारनपुरी ने ''हमने गजल के साथ में धोखा नहीं किया हमने हुकमतों के कसीदे नहीं पढ़े, इस साल भी वह फीस अदा कर नहीं सका इस साल भी गरीब के बच्चे नहीं पढ़े'' सुनाया। अदील जाफरी ने ''कितनी तारीकियों के काम आया वह दिया, जो जला अकेला था जब तलक उर्दू जबा न आई थी'' पढ़ा। राना तबस्सुम ने पढ़ा- मौसम था जब बहार का हम भी थे बेशऊर, हम बाशऊर क्या हुए मौसम बदल गया।
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जामिया मिल्लिया दिल्ली के उर्दू विभाग के प्रो. अहमद महफूज अनगढ़ संभली, मुईन शादाब, हफीज मुबारकपूरी, असद मीनाई, अनिल पांडेय जाफर सेंथली, शुजाअत हुसैन, तलममुज हैदर, बख्तावर हुसैन आदि ने कलाम पढ़े। संचालन हिलाल बदायूंनी ने किया। सदारत शकील शम्सी ने की। आयोजक अश्जे रजा जैदी, इराक रजा जैदी ने सभी का आभार जताया।
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इदारा-ए-बोस्ताने कलम की ओर से हकीम सैयद अहमद असगर जैदी के जन्मदिन पर कुल हिंद मुशायरा कराया गया। हिलाल जैदी ने शमा रोशन कर शुभारंभ किया। शायर वारिस वारसी ने पढ़ा, जी न उठूं मैं कहीं हाथ हटा सीने से, ऐ मेरी जान मुझे चैन से मर जाने दे। अना देहलवी ने पढ़ा- पुराने लोग हर दिन नए कानून लिखते हैं, कहीं जाने पे पाबंदी है कहीं जाना जरूरी है।
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बिलाल सहारनपुरी ने ''हमने गजल के साथ में धोखा नहीं किया हमने हुकमतों के कसीदे नहीं पढ़े, इस साल भी वह फीस अदा कर नहीं सका इस साल भी गरीब के बच्चे नहीं पढ़े'' सुनाया। अदील जाफरी ने ''कितनी तारीकियों के काम आया वह दिया, जो जला अकेला था जब तलक उर्दू जबा न आई थी'' पढ़ा। राना तबस्सुम ने पढ़ा- मौसम था जब बहार का हम भी थे बेशऊर, हम बाशऊर क्या हुए मौसम बदल गया।
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जामिया मिल्लिया दिल्ली के उर्दू विभाग के प्रो. अहमद महफूज अनगढ़ संभली, मुईन शादाब, हफीज मुबारकपूरी, असद मीनाई, अनिल पांडेय जाफर सेंथली, शुजाअत हुसैन, तलममुज हैदर, बख्तावर हुसैन आदि ने कलाम पढ़े। संचालन हिलाल बदायूंनी ने किया। सदारत शकील शम्सी ने की। आयोजक अश्जे रजा जैदी, इराक रजा जैदी ने सभी का आभार जताया।