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उलमा बोले जुबानी तीन तलाक जायज
ब्यूरो, अमर उजाला बरेली
Updated Fri, 27 May 2016 01:39 AM IST
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जुबानी तीन तलाक के मामले में बरेलवी व देवबंदी दोनों उलमा की एक राय है। उनका कहना है कि पर्सनल लॉ के एतबार से जो संवैधानिक व्यवस्था की गई है उसमें जुबानी तीन तलाक संविधान के खिलाफ नहीं माना जाना चाहिए। जबकि हर्जे खर्चे के मामले में उनका कहना है कि तलाक के बाद पति सिर्फ महर का देनदार है हमेशा हर्जे खर्चे का नहीं।
सशस्त्र सैन्य बल अधिकरण (एएफटी) की लखनऊ क्षेत्रीय बेंच ने मौखिक (जुबानी) तीन तलाक को संविधान के खिलाफ करार दिया है। साथ ही गुजारा भत्ते के मामले में भी कहा है कि संविधान में हर महिला का अधिकार संरक्षित है। इसकी अवहेलना कोई नहीं कर सकता। यहां तक कि पर्सनल लॉ की आड़ में भी उनके अधिकारों का उल्लंघन नहीं किया जा सकता। ट्रिब्यूनल के न्यायिक सदस्य न्यायमूर्ति देवी प्रसाद सिंह और प्रशासनिक सदस्य एयर मार्शल अनिल चोपड़ा की बेंच ने बुधवार को बरेली निवासी सेना में लांस नायक मोहम्मद फरूर उर्फ फारूख खां के मामले में 2012 की अर्जी को खारिज करते हुए यह फैसला दिया। जिसमें फारूख ने अपनी बीबी को तलाक देने की बात कहते हुए उसे भरण पोषण (मेंटीनेंस) देने के आदेश को चुनौती दी थी।
बरेलवी सुन्नी मरकज दरगाह आला हजरत स्थित मदरसा मंजरे इस्लाम के मुफ्ती मोहम्मद सलीम नूरी का कहना है कि शरियत के एतबार से जुबानी तीन बार तलाक कहने पर तलाक हो जाएगा। पति ने अगर तलाक दिया है और वह मान रहा है या फिर कोई गवाही दे दे तो भी तलाक मान लिया जाएगा। हर्जे खर्चे पर उनका कहना है कि तलाक में पति महर देगा और तलाक के बाद इद्दत के समय तक का खर्च पति को ही देना पड़ेगा, मगर हमेशा नहीं।
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इसी तरह देवबंद मरकज से ताल्लुक रखने वाले एवं जमियत उलमा हिंद के जिलाध्यक्ष मुफ्ती मोहम्मद मियां कासमी का कहना है कि हुजूरे पाक की हदीस है कि तीन चीजें ऐसी हैं जिनको इरादे से कहना या मजाक में भी कहने से हो जाती है। इसमें निकाह, तलाक और रजआत (निकाह में लौटना)। हदीस पाक से यह बात मालूम होती है कि तीनों चीजें जुबान से या लिख कर हों हर सूरत में मानी जाएंगी। इसी तरह तलाक जुबान से कहें या लिख कर दें तलाक हो जाएगी। हर्जे खर्चे पर उन्होंने भी शरियत के हवाले से यही कहा कि इद्दत के वक्त तक का खर्च और रहने के लिए घर पति के जिम्मे है।
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सशस्त्र सैन्य बल अधिकरण (एएफटी) की लखनऊ क्षेत्रीय बेंच ने मौखिक (जुबानी) तीन तलाक को संविधान के खिलाफ करार दिया है। साथ ही गुजारा भत्ते के मामले में भी कहा है कि संविधान में हर महिला का अधिकार संरक्षित है। इसकी अवहेलना कोई नहीं कर सकता। यहां तक कि पर्सनल लॉ की आड़ में भी उनके अधिकारों का उल्लंघन नहीं किया जा सकता। ट्रिब्यूनल के न्यायिक सदस्य न्यायमूर्ति देवी प्रसाद सिंह और प्रशासनिक सदस्य एयर मार्शल अनिल चोपड़ा की बेंच ने बुधवार को बरेली निवासी सेना में लांस नायक मोहम्मद फरूर उर्फ फारूख खां के मामले में 2012 की अर्जी को खारिज करते हुए यह फैसला दिया। जिसमें फारूख ने अपनी बीबी को तलाक देने की बात कहते हुए उसे भरण पोषण (मेंटीनेंस) देने के आदेश को चुनौती दी थी।
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बरेलवी सुन्नी मरकज दरगाह आला हजरत स्थित मदरसा मंजरे इस्लाम के मुफ्ती मोहम्मद सलीम नूरी का कहना है कि शरियत के एतबार से जुबानी तीन बार तलाक कहने पर तलाक हो जाएगा। पति ने अगर तलाक दिया है और वह मान रहा है या फिर कोई गवाही दे दे तो भी तलाक मान लिया जाएगा। हर्जे खर्चे पर उनका कहना है कि तलाक में पति महर देगा और तलाक के बाद इद्दत के समय तक का खर्च पति को ही देना पड़ेगा, मगर हमेशा नहीं।
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इसी तरह देवबंद मरकज से ताल्लुक रखने वाले एवं जमियत उलमा हिंद के जिलाध्यक्ष मुफ्ती मोहम्मद मियां कासमी का कहना है कि हुजूरे पाक की हदीस है कि तीन चीजें ऐसी हैं जिनको इरादे से कहना या मजाक में भी कहने से हो जाती है। इसमें निकाह, तलाक और रजआत (निकाह में लौटना)। हदीस पाक से यह बात मालूम होती है कि तीनों चीजें जुबान से या लिख कर हों हर सूरत में मानी जाएंगी। इसी तरह तलाक जुबान से कहें या लिख कर दें तलाक हो जाएगी। हर्जे खर्चे पर उन्होंने भी शरियत के हवाले से यही कहा कि इद्दत के वक्त तक का खर्च और रहने के लिए घर पति के जिम्मे है।